महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ | हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् जिनकी कान्ति उदय होते सहस्र सूर्यों के समान है, जो निर्मला हैं, अग्नि-सूर्य-चन्द्र जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका मुस्कान-युक्त मुख-कमल मोतियों से जटित स्वर्ण-कुण्डलों से शोभायमान है, जो चार कर-कमलों में चक्र, पद्म, वर ओर अभय धारण किए हैं, दोनों पयोधर पीन ओर उत्तुंग हैं, ऐसी भय-हारिणी पीत-वस्त्रा भगवती का मैं ध्यान करता हूँ । इस प्रकार ध्यान कर महा-देवी का यथा-शक्ति पूजन कर दश दिक्-पालों और वृषभ की पूजा करे (४४- ४५) । जिस मन्त्र से जगन्मयी भगवती की आराधना करनी चाहिए, उसे बताता हूँ (४६) । माया (ह्रीं), लक्ष्मी (श्रीं) ओर षष्ठ स्वर से युक्त हकार में चन्द्र-विन्दु जोड़कर (हूँ) उच्चारण करे तथा अन्त में वह्नि-जाया (स्वाहा) जोड़े अर्थात् 'ह्रीं श्रीं हूँ स्वाहा' (४७) । पूर्वं की भाँति देवी को स्थापित कर सब देवों के लिए शर्करा-मिश्रित दधि-युक्त माष-भक्त की बलि दे (४८) । इस बलि को ईशान-कोण में रखकर वरुण-बीज (वं) से उसे शुद्ध करे । फिर गन्ध-पुष्प से उसकी पूजा कर निम्न मन्त्र से उसे उत्सर्ग करे— सर्वे देवाः सिद्ध-गणा गन्धर्बोरग-राक्षसाः । पिशाचो मातरो यक्षा भूताश्च पितरस्तथा ॥ ऋषयो येऽन्य-देवाश्च बलिं गृह्णन्तु संयताः । परिवार्य महा-देवं तिष्ठन्तु गिरिजामपि ॥ अर्थात् सभी देव, सिद्ध-गण, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच, मातृ-गण, यक्ष, भूत, पितृ-गण, ऋषि और अन्य देव-गण संयत होकर बलि ग्रहण करें तथा ये सब महा-देव और महा-देवी गिरिजा के चारों ओर विराजें (४६-५१) । तब महा-देवी के उक्त मन्त्र 'ह्रीं श्रीं हूँ स्वाहा' का यथा-शक्ति जप करे। फिर उत्तम गीत-वाद्यादि द्वारा मङ्गल-कार्य करे (५२) । इस प्रकार अधिवास कर अगले दिन नित्य-क्रिया कर यथा-विधि सङ्कल्प कर पंच-देवों की पूजा करे (५३) । फिर मातृका-पूजा, वसुधारा और वृद्धि-श्राद्ध कर भक्तिपूर्वक महेश्वर की और नन्दी आदि द्वार-पालों की पूजा करे (५४) । १. नन्दी, २. महा-बल, ३. कोश-वदन ओर ४ गण-नायक—ये शिव के द्वार-पाल हैं। ये सभी अस्त्र-शस्त्र-धारी हैं (५५) । तब वेदी-रूपा तारिणी और शिव-लिङ्ग को लाकर सर्वतोभद्र- मण्डल में या उत्तम आसन पर स्थापित करे (५६) । फिर 'ह्रीं ॐ ह्रीं त्र्यम्बकं यजामहे' मन्त्र का पाठ करते हुए अष्ट-कलश के जल से महा-देव को स्नान कर षोडशोपचार-पूजा करे (५७) । तब 'ह्रीं श्रीं हूँ स्वाहा' मन्त्र से वेदी का स्थापन कर उस पर लिङ्ग को स्थापित कर पूजा करे । फिर हाथ जोड़कर मङ्गल-मय शङ्कर की प्रार्थना करे (५८)— आगच्छ भगवन् ! शम्भो ! सर्व-देव-नमस्कृत ! पिनाक-पाणे ! सर्वेश ! महा-देव ! नमोऽस्तु ते ॥ आगच्छ मन्दिरे देव ! भक्तानुग्रह-कारक ! भगवत्या सहाऽऽगच्छ कृपां कुरु नमो नमः ॥ मातर्देवि ! महा-माये ! सर्व-कल्याण-कारिणि ! प्रसीद शम्भुना सार्धं नमस्तेऽस्तु हर-प्रिये ॥ आयाहि वरदे देवि ! भवनेऽस्मिन् वर-प्रदे ! प्रीता भव महेशानि ! सर्व-सम्पत्-करो भव ॥ उत्तिष्ठ देव-देवेशि ! स्वैः स्वैः परिकरैः सह । सुखं निवसतं गेहे प्रोयेतां भक्त-वत्सलौ ॥ अर्थात् हे भगवन् शम्भो ! हे सब देवों से नमस्कृत ! हे पिनाक-पाणे ! हे सर्वेश ! हे महा-देव ! आओ, तुम्हें नमस्कार । हे देव ! तुम मन्दिर में आओ । हे भक्तों पर कृपा करनेवाले ! कृपया भगवती के साथ आओ । तुम्हें बारम्बार नमस्कार । हे महा-माये ! हे सर्व-कल्याण-कारिणि ! हे हर-प्रिये ! हे मातः ! हे देवि ! महेश्वर