महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ उल्लास : शिव-लिङ्ग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । १९९ के साथ तुम प्रसन्न होओ। तुम्हें नमस्कार। हे वरदे ! हे देवि ! इस भवन में आओ। हे वर-दायिनि ! प्रसन्न होओ। हे महेश्वरि ! मुझे सब सम्पत्तियाँ दो। हे देव, हे देवेशि ! अपने-अपने परिवार के साथ उठो। तुम दोनों भक्त-वत्सल इस गृह में सुख से निवास करो और प्रसन्न होओ (५९-६३) इस प्रकार महेश्वर और महेश्वरी की प्रार्थना कर मङ्गल-ध्वनि करते हुए तीन बार गृह की प्रदक्षिणा कर उन्हें गृह के भीतर प्रवेश कराए (६४)। फिर मूल-मन्त्र को जपते हुए निम्न मन्त्र से पाषाण-खनित गर्त्त में या ईंट से बने गर्त के मध्य में लिङ्ग के नीचे का तीन भाग रोपित करे (६५)- यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत् पृथ्वी च सागराः। तावदत्र महा-देव! स्थिरो भव नमोऽस्तु ते।। अर्थात् जब तक चन्द्र और सूर्य हैं, जब तक पृथ्वी और सागर हैं, तब तक हे महा-देव ! तुम इस स्थान में स्थिर होकर रहो, तुम्हें नमस्कार (६६)। इस मन्त्र द्वारा सदाशिव को दृढ़ रूप से स्थापित कर मूल-मन्त्र को जपते हुए उत्तरीमुख गोरी-पट्ट को उनके ऊपर से प्रवेश कराए (६७) और यह मन्त्र पढ़े- स्थिरा भव जगद्धात्रि ! सृष्टि - स्थित्यन्त - कारिणि ! यावद् दिवा - निशा - नाथौ तावदत्र स्थिरा भव।। अर्थात् हे सृष्टि-स्थिति-संहार-कारिणि ! हे जगद्धात्रि ! स्थिर होओ। जब तक सूर्य और चन्द्र हैं, तब तक इस स्थान में स्थिर होकर रहो (६८)। इस प्रकार यन्त्र को सुदृढ़ कर शिव-लिङ्ग को स्पर्श कर निम्न मन्त्रों का पाठ करे (६९)- व्याघ्रा भूताः पिशाचाश्च गन्धर्वाः सिद्ध - चारणाः। यक्षा नागाश्च वेतालाः लोक - पाला महर्षयः।। मातरो गण - नाथाश्च विष्णुर्ब्रह्मा वृहस्पतिः। यस्य सिंहासने युक्ता भूचराः खेचरास्तथा।। आवाहयामि तं देवं त्र्यक्षमीशानमव्ययम् । आगच्छ भगवन्नत्र ब्रह्म - निर्मित - यन्त्रके।। ध्रुवाय भव सर्वेषां शुभाय च सुखाय च। अर्थात् व्याघ्र, भूत, पिशाच, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, यक्ष, नाग, वेताल, लोक-पाल, महर्षि, माताएँ, गण- पति, विष्णु, ब्रह्मा, वृहस्पति, भूचर और खेचर जिनके सिंहासन से युक्त हैं, उन अव्यय, त्रिनेत्र ईंशान का मैं आवाहन करता हूँ। हे भगवन् ! इस ब्रह्म-निर्मित यन्त्र में आइए और सभी प्राणियों को सुख तथा मङ्गलकारी हों (७०-७। अब देव-प्रतिष्ठा में बताई विधि से शिव को स्नान कराए (७३)। हे प्रिये ! पूर्ववत् ध्यान कर मानसोपचारों से पूजा करे। फिर विशेषार्घ्य-स्थापन कर गण-देवताओं की पूजा कर पुनः ध्यान कर लिंग पर पुष्प चढ़ाए (७४)। पाश ( आं ) और अंकुश ( क्रों ) से पुटित माया ( ह्रीं ) का उच्चारण कर 'य' से 'स' तक के सात अक्षरों को अनुस्वार-युक्त कर उनका पाठ कर अन्त में 'हौं हंसः' मन्त्रोच्चार कर उक्त लिंग में प्राण-प्रतिष्ठा करे। फिर चन्दन, अगुरु और काश्मीर (कुंकुम) से गिरिजा-पति के अंगों को चर्चित कर पूर्वोक्त विधि से षोडशोपचारों से पूजा करे। तब पहले बताई विधि से जात-कर्म, नामकरण आदि संस्कार कर वेदी पर देवी महेश्वरी की पूजा करने के बाद उस पर देव-देव अष्ट-मूर्ति की पूजा करे (७५-७६)। यथा- १ शर्वाय क्षिति नूर्तये नमः, २ भवाय जल-मूर्तये नमः, ३ रुद्राय अग्नि-मूर्तये नमः, ४ उग्राय वायु- मूर्तये नमः, ५ भीमाय आकाश-मूर्तये नमः, ६ पशु-पतये यजमान-मूर्तये नमः, ७ महा-देवाय सोम-मूर्तये नमः, ८ ईशानाय सूर्य-मूर्तये नमः।