महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र यही अष्ट-मूर्तियां हैं (७७-७६) । आदि में 'प्रणव' और अन्त में 'नमः' लगाकर प्रत्येक मूर्ति का आवाहन कर पूर्व से ईशान कोण तक क्रमशः उक्त आठ मूर्तियों की पूजा करे (८०) । फिर इन्द्रादि दश दिक्-पालों और ब्राह्मी आदि आठ मातृकाओं की पूजा कर वृष, वितान, गृह आदि सभी महेश्वर के प्रति उत्सर्ग करे (८१) । तब हाथ जोड़कर भक्ति-पूर्वक पार्वती-पति महादेव से प्रार्थना करे (८२)— गृहेऽस्मिन् करुणा-सिन्धो ! स्थापितोऽसि मया प्रभो ! प्रसीद भगवन् शम्भो ! सर्व-कारण-कारण ॥ यावत् स-सागरा पृथ्वो यावत् शशि-दिवाकरौ । तावदस्मिन् गृहे तिष्ठ नमस्ते परमेश्वर ॥ गृहेऽस्मिन् यस्य कस्यापि जीवस्य मरणं भवेत् । न तत्-पापैः प्रलिप्येऽहं प्रसादात् तव धूर्जटे ॥ अर्थात् हे दया-सागर ! मैंने तुम्हें इस गृह में स्थापित किया है । हे प्रभो ! तुम सभी कारणों के कारण हो । हे भगवन् शम्भो ! प्रसन्न होओ । हे परमेश्वर ! जब तक सागरों सहित पृथ्वी है, जब तक सूर्य-चन्द्र हैं, तब तक तुम इस गृह में रहो । तुम्हें नमस्कार । हे धूर्जटे ! इस गृह में जिस किसी जीव की मृत्यु हो, तुम्हारो कृपा से मैं उसके पाप में लिप्त न होऊँ (८३-८५) । अब प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे और घर जाये । अगले दिन प्रातः वहीं आकर चन्द्र-शेखर को स्नान कराये (८६) । पहले शुद्ध पंचामृत से, फिर सुगन्धित जल से भरे एक सौ कलश द्वारा स्नान कराये (८७) । तब यथा-शक्ति पूजा कर प्रार्थना करे (८८)— विधि-हीनं क्रिया-हीनं भक्ति-हीनं यदर्चितम् । सम्पूर्णमस्तु तत् सर्वं त्वत्-प्रसादादुमा-पते ॥ यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत् पृथ्वी च सागराः । तावन्मे कीर्तिरतुला लोके तिष्ठतु सर्वदा ॥ नमस्त्र्यक्षाय रुद्राय पिनाक-वर-धारिणे । विष्णु-ब्रह्मेन्द्र-सूर्याद्यैरर्चिताय नमो नमः ॥ अर्थात् हे उमा-पते ! इस पूजा में जो कुछ विधि-हीन, क्रिया-हीन, भक्ति-हीन हुआ हो, वह सब तुम्हारी कृपा से पूर्ण हो और जब तक सूर्य तथा चन्द्र हैं, पृथ्वो और सागर हैं, तब तक इस संसार में मेरा अनुपम यश बना रहे । श्रेष्ठ पिनाक-धारी, त्रिनेत्र रुद्र को नमस्कार । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्यादि द्वारा पूजित महेश्वर को बारंबार नमस्कार (८६-६१) । अब दक्षिणा देकर कौलिकों और ब्राह्मणों को भोजन कराए । फिर दरिद्रों को भक्ष्य, पेय द्रव्यों और वस्त्रों से सन्तुष्ट करे (६२) । तब प्रतिदिन यथा-शक्ति महेश्वर की पूजा करे किन्तु स्थावर शिवलिंग को कभी स्थान से न हटाये (६३) । हे परमेश्वरि ! मैंने समस्त आगमों से उद्धृत कर संक्षेप में अचल शिव-लिंग की प्रतिष्ठा की यह विधि तुम्हें बताई है (६४) । भगवती ने जिज्ञासा की—हे विभो ! यदि अकस्मात् किसी दिन देवता की पूजा न हो सके, तो भक्त लोग क्या करें (६५) ? किस दोष से देव-मूर्ति अपूज्य और त्याज्य हो जाती है, इसे भी मुझे बताइए (६६) । श्री सदाशिव ने कहा—यदि किसी दिन पूजा न हो सके, तो अगले दिन उस देव-मूर्ति की दुगुनी पूजा करे । दो दिन पूजा न हो सके, तो चौगुनी और तीन दिन पूजा न होने पर आठ-गुनी पूजा करे (६७) । यदि छः महीने तक पूजा न हो, तो आठ कलश जल से देव-मूर्ति को स्नान कराकर पूजा करे (६८) । यदि छः मास से अधिक समय तक पूजा न हो, तो पूर्वोक्त संस्कार-विधि के अनुसार देव-मूर्ति को पुनः सुसंस्कृत कर पूजा करे (६६) । जो देव-मूर्ति टूटी हो, छिद्रवाली हो, कुष्ट-रोगी द्वारा छू गई हो या अंग-हीन हो, उसे जल में विसर्जित कर दे । जो मूर्ति दूषित हो भूमि पर गिर पड़ी हो, उसकी पूजा न करे (१००) । अंगहीन, टूटी, छिद्रवाली मूर्ति