महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ उल्लास : शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । १२१ का विसर्जन जल में करे किन्तु स्पर्शादि दोषों से दूषित मूर्ति का पुनः संस्कार कर पूजा कर सकते हैं (१०१) । जो महा-पीठ और अनादि लिंग हैं, उनमें अस्पृश्य-स्पर्शादि दोष नहीं होते, अतः सुख-प्राप्ति के लिए उनमें सदा अपने अभीष्ट देवता की पूजा करे (१०२) । हे महा-माये ! कर्म के अनुसार जीवित रहनेवाले मनुष्यों के कल्याण के लिए तुमने जो-जो पूछा, मैंने वह सब बताया है (१०३) । मनुष्य लोग बिना कर्म किए एक क्षण भी नहीं रह सकते । वे इच्छा न होते हुए भी लाचार होकर कर्म-रूपी वायु से आकृष्ट होते हैं (१०४) । कर्मों से ही वे सुख पाते हैं, दुःख भोगते हैं, जन्म पाते हैं, मृत्यु को प्राप्त होते हैं और कर्मों के वश में रहकर ही जीवित रहते हैं (१०५) । इसीलिए मैंने अल्पज्ञ व्यक्तियों की प्रवृत्ति के लिए और दुष्प्रवृत्ति को निवृत्ति के लिए साधन-सहित बहुत से कर्म बताए हैं अर्थात् जो अनेक जन्मों में बहुत से कर्म करके तत्त्व-ज्ञानी हुए हैं, उनके लिए नहीं, अपितु जो संसारी अविद्यादि से पूर्ण हैं, उन्हीं के लिए उक्त कर्म निर्दिष्ट किए हैं (१०६) । कर्म दो प्रकार के हैं—१ शुभ, २ अशुभ। अशुभ कर्म करने से प्राणी लोग बड़ी यातना भोगते हैं (१०७) हे देवि ! जो लोग फल के लोभ में शुभ कर्म करते हैं, वे भी इन कर्मों की जंजीर में बँधकर इस लोक और परलोक में आते-जाते रहते हैं (१०८) । शुभ या अशुभ कर्मों का क्षय न होने पर, सौ कल्पों तक भी मनुष्य की मुक्ति नहीं होती (१०६) । जिस प्रकार लोहे या सोने की जंजीर से बन्धन होता है, उसी प्रकार जीव अशुभ या शुभ कर्म से बँधता है (११०) । जब तक ज्ञान नहीं होता, तब तक निरन्तर कर्मानुष्ठान करके या अनेक प्रकार के कष्ट उठाकर भी मोक्ष को नहीं पा सकते (१११) । ज्ञानी, निर्मलात्मा पण्डितों के तत्त्व-विचार या निष्काम-कर्मानुष्ठान द्वारा ही ज्ञान प्राप्त होता है (११२) । ब्रह्मा से लेकर एक तिनके तक सारा जगत् माया द्वारा कल्पित है और मिथ्या है; केवल एक 'परम ब्रह्म' ही सत्य है, यह ज्ञात होने पर सुख मिलता है (११३) । जो 'मेरा नाम अमुक है, मैं गौर-वर्ण हूँ' इत्यादि मिथ्या ज्ञान का छोड़कर अविद्या-शून्य हो जाता है अर्थात् नित्य, निश्चल ब्रह्म के तत्त्व का निरूपण करता है, वह कर्म के बन्धन से मुक्त होता है (११४) । जप, होम या सौ-सौ उपवास करने से भी मुक्ति नहीं मिलती किन्तु 'ब्रह्मैवाहं' अर्थात् 'ब्रह्म ही मैं हूँ'—इस प्रकार का ज्ञान होने से देही मुक्त हो जाता है (११५) । आत्मा साक्षी है अर्थात् शुभाशुभ का द्रष्टा विभु है—सर्व-व्यापक, पूर्ण, अद्वितीय, परात्पर है और देह से सम्बद्ध होते हुए भी देह-धर्म से अलिप्त है, यह जानने से प्राणी मुक्ति का अधिकारी होता है (११६) । जो व्यक्ति नाम-रूपादि कल्पना को बाल्य-क्रीडा के समान छोड़कर ब्रह्म-निष्ठ होता है, वह मुक्ति पाता है, इसमें सन्देह नहीं (११७) । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार बचपन के बीतने पर बाल्य-काल के खेलों को व्यक्ति छोड़ देता है, उसी प्रकार साधना के प्रारम्भिक काल में ब्रह्म के रूप अर्थात् दश-भुजादि एवं नाम अर्थात् काली, दुर्गादि, परिच्छद अर्थात् रक्त-वस्त्रादि की कल्पना और तदनुसार १ बाह्य पूजा, २ मानस पूजा और स्तुति, ३ ध्यान—इन सभी क्रीड़ाओं को क्रमशः करते हुए साधना में प्रवीण होने पर इन सभी कर्मों को छोड़ दे । तब ब्रह्म-परायण होकर मुक्ति को प्राप्त करे किन्तु जिस प्रकार बाल्य-काल में बालोचित क्रीड़ाओं को छोड़कर बड़ों के समान कार्य करने की चेष्टा करना उचित नहीं है, उसी प्रकार साधना की प्रारंभिक अवस्था में नाम-रूपादि की कल्पना छोड़कर ब्रह्म-परायण होने की चेष्टा करना कल्याणकारी नहीं है । अतः जैसे आयु के अनुसार कर्म करने चाहिए, वैसे ही साधना के कम या अधिक अभ्यास के अनुसार ही कर्म विहित हैं । मनः-कल्पित मूर्ति अर्थात् मन-ही-मन निर्मित अशास्त्रीय मूर्ति यदि मनुष्यों को मोक्ष-दायिनी हो, तो मनुष्य स्वप्न में प्राप्त राज्य द्वारा ही वास्तविक राजा बन जाते । आद्या आदि की शास्त्रोक्त मूर्ति मोक्ष-दायिनी होती है, ऐसा पहले बताया है । अतः यहाँ तात्पर्य यह है कि मनमानी मूर्ति मोक्षदा नहीं होती (११८) । मिट्टी, शा०—१६