महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२२ । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पत्थर, धातु या काष्ठादि की मूर्ति को ईश्वर माननेवाले तप करते हुए कष्ट ही उठाते हैं; तप से ज्ञान होने पर ही वे मुक्ति प्राप्त करते हैं (११९) । मनुष्य लोग आहार-संयम कर चाहे कष्ट उठायें या यथेष्ट आहार कर मोटे-ताजे बनें, यदि ब्रह्म-ज्ञान से रहित रहते हैं, तो उनका निस्तार किसी प्रकार नहीं होता (१२०) । जो केवल वायु पीकर या पत्ते खाकर या कण भक्षण कर या जल मात्र पीकर व्रत करते हैं, वे यदि उससे मोक्ष पा जायें, तो सर्प, पशु-पक्षी, जल-जन्तु—ये सभी मोक्ष के अधिकारी हो जायें । तात्पर्य यह है कि केवल आहार के नियम-रूपी सत्कर्म के करने से मोक्ष नहीं मिलता, अपितु विविध व्रतों, अनेक उपवासों एवं अनेक जन्मों की आराधना से चित्त की शुद्धि होने पर जब तत्त्व-ज्ञान होता है, तब मोक्ष मिलता है (१२१) । ब्रह्म ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है—यही भाव उत्तम है । ध्यान का भाव मध्यम है । स्तव और जप का भाव अधम है और बाह्य पूजा अधम से भी अधम है । तात्पर्य यह है कि पहले बाह्य-पूजा, फिर मानसिक पूजा और स्तुति, तब ध्यान—क्रमशः इन सबको करता हुआ साधक ब्रह्म-सद्भाव अर्थात् तत्त्व-ज्ञान-रूपी श्रेष्ठ स्थिति को प्राप्त करता है (१२२) । जीव और आत्मा के ऐक्य को ही 'योग' कहते हैं तथा सेवक और ईश्वर के ऐक्य को ही 'पूजा' कहते हैं । सब कुछ ब्रह्म ही है—'सर्वं ब्रह्म', ऐसा ज्ञान जिसे होता है, उसके लिए योग और पूजा कुछ नहीं है (१२३) । जिसके हृदय में परम ज्ञान--ब्रह्म-ज्ञान विराजमान है, उसके लिए जप, यज्ञादि तप, नियम, व्रतादि किसी की आवश्यकता नहीं है (१२४) । जो सर्वत सत्य-स्वरूप, विज्ञान-स्वरूप, आनन्द-स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म को साक्षात् कर लेता है, वह स्वभावतः ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है, उसके लिए पूजा और ध्यान-धारणा कुछ नहीं है (१२५) । 'सर्वं ब्रह्म'—सब कुछ ब्रह्म है, ऐसा जाननेवाले को पाप, पुण्य, स्वर्ग, पुनर्जन्म, ध्येय और ध्याता कुछ भी महत्व नहीं रखते (१२६) । यह आत्मा सदा ही मुक्त है, वह किसी भी वस्तु से लिप्त नहीं होती । उसका बन्धन क्या है, जिससे मुक्ति पाने की इच्छा दुर्बुद्धि लोग करते हैं (१२७) ? यह जगत् ब्रह्म की माया द्वारा विरचित है । देवता भी इसे नहीं समझ सकते । इस जगत् में परम ब्रह्म प्रविष्ट न होकर भी प्रविष्ट-जैसा स्वयं विराजमान रहता है (१२८) । जिस प्रकार सभी वस्तुओं के भीतर और बाहर आकाश है, उसी प्रकार सत्-स्वरूप और साक्षी- स्वरूप आत्मा सर्वत स्वरूप से प्रकाशमान रहता है (१२९) । आत्मा का न जन्म है, न बाल्यावस्था है, न युवा- वस्था—न वृद्धावस्था है; वह सदैव एक-रूप, चिन्मय और विकार-रहित है (१३०) । जन्म, यौवन और वृद्धा- वस्था देह को ही होती है, आत्मा की नहीं । माया से बुद्धि के ढंके होने से लोग यह देखकर भी नहीं देखते (१३१) । जैसे अनेक शरावों (पात्रों) में स्थित जल में अनेक सूर्य दिखाई देते हैं, वैसे ही माया के प्रभाव से अनेक शरीरों में अनेक आत्मायें दिखाई देती हैं (१३२) । जैसे जल के हिलने से उसमें प्रतिबिम्बित चन्द्र का हिलना प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति की बुद्धि चंचल होने से आत्मा को भी चंचल समझ बैठते हैं (१३३) । जैसे घट के टूटने पर भी घटस्थ आकाश पहले ही जैसा रहता है, वैसे ही देह के नष्ट होने पर भी आत्मा सदा सम-भाव में विराजमान रहती है (१३४) हे देवि ! यही ब्रह्म-ज्ञान मोक्ष का परम कारण है । जो इसे जानता है, वह इसी लोक में जीवन्मुक्त होकर रहता है, इसमें सन्देह नहीं (१३५) । मनुष्य कर्म द्वारा मुक्त नहीं होता, सन्तान उत्पन्न करके मुक्त नहीं होता, धन द्वारा भी मुक्त नहीं होता अपितु अपने द्वारा अपने को जानकर ही वह मुक्त होता है (१३६) । सभी जीवों को आत्मा ही परम प्रिय है, आत्मा से अधिक प्रिय कोई अन्य वस्तु नहीं है । हे शिवे ! इस लोक में अन्य व्यक्ति आत्म-सम्बन्ध के कारण ही प्रिय होता है (१३७) । ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीन माया द्वारा ही प्रतीत होते हैं । इन तीनों के तत्त्व का विचार करने पर एकमात्र आत्मा ही शेष रहती है (१३८) । चिन्मय आत्मा ही ज्ञान है, चिन्मय आत्मा ही ज्ञेय वस्तु है और स्वयं आत्मा ही ज्ञाता है । जो इसे जानता है, वही आत्म-वित् है (१३९) । यह मैंने तुमसे साक्षात् मोक्ष के कारण-स्वरूप ज्ञान का