भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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चौदहवाँ उल्लास : शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण | १२३ उपदेश किया है। यह चतुर्विध अवधूतों का परम धन है (१४०) । श्री भगवती ने कहा—आपने पहले गृहस्थ और भिक्षुक—इन दो आश्रमों की बात कही है। अब कहते हैं कि अवधूत आश्रम चतुर्विध है। इससे मुझे आश्चर्य है कि यह क्या है ? हे प्रभो ! चार प्रकार के अवधूतों के लक्षण विशेष रूप से बताइए, मैं उन्हें सुनकर उनका तत्त्व जानना चाहती हूँ (१४१-४२) । श्री सदाशिव ने कहा—हे प्रिये ! जो सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जाति-वर्ग ब्रह्म-मन्त्र के उपासक हैं, वे गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी 'यति' कहे जाते हैं। हे कुलाचिते ! जो मनुष्य पूर्णाभिषेक की विधि से संस्कृत होते हैं, वे 'शैवावधूत' हैं और सभी के पूज्य हैं (१४३-४४) । ब्राह्मावधूत और शैवावधूत अपने आश्रम और आचार का पालन करते हुए मेरे बताए मार्ग पर चलकर सभी कर्मों को करते हैं। ब्राह्मावधूत ब्रह्मार्पित द्रव्य के सिवा कोई भी निषिद्ध अन्न और जल-ग्रहण नहीं करते (१४५-४६) । हे वरानने ! ब्राह्मावधूत कौलों और अभिषिक्त कौलों के आचार तथा धर्म का कथन पहले हो चुका है। स्नान, सन्ध्या, भोजन, पान, दान, स्त्री-रक्षा —इन सभी कर्मों का अनुष्ठान शैवावधूत और ब्राह्मावधूत आगम के अनुसार करते हैं (१४७-४८) उक्त शैवाव- धूत और ब्राह्मावधूत दो प्रकार के हैं—१ पूर्ण, २ अपूर्ण । हे प्रिये ! पूर्ण शैवावधूत और ब्राह्मावधूत का नाम है 'परमहंस' । अपूर्ण शैवावधूत और ब्राह्मावधूत को 'परिव्राट्' कहते हैं (१४६) । जो मनुष्य अवधूत-संस्कार से संस्कृत होते हैं, वे यदि ज्ञान-विषय में दुर्बल हैं अर्थात् यदि उनमें पूर्ण अद्वैत भाव उत्पन्न नहीं होता, तो वे लोकालय में रहकर आत्म-शोधन करें और जिस प्रकार 'एकमेवाद्वितीयं'—यह ज्ञान उत्पन्न हो, उस प्रकार करें (१५०) । वे अपने जाति-चिह्न शिखा-सूत्रादि की रक्षा करें। वे कौल के समान सभी कर्मों का अनुष्ठान करें, निरन्तर ब्रह्म-निष्ठ होकर ज्ञान-साधन करें (१५१) । वे सदा वीत-राग होकर 'ॐ तत् सत्' इस मन्त्र का उच्चा- रण करते हुए 'सोऽहमस्मि' इस प्रकार चिन्तन कर अपने उपयोगी कर्मों का अनुष्ठान करें (१५२) । वे पद्म-पत्र पर स्थित जल के समान अनासक्त-हृदय होकर सभी कर्मों का अनुष्ठान कर तत्त्व-ज्ञान के विचार द्वारा अपना उद्धार करने को—मोक्ष पाने को यत्न-शील हों (१५३) । गृहस्थ हों या उदासीन हों, 'ॐ तत् सत्' इसी मन्त्र द्वारा जो जिस कार्य का अनुष्ठान करेगा, उसी से उसका वह कर्म अभीष्ट फल-दायक होगा (१५४) । जप, होम, प्रतिष्ठा, संस्कार आदि सभी कर्म 'ॐ तत् सत्' मन्त्र द्वारा सम्पन्न होने से ही पूरे होते हैं, इसमें सन्देह नहीं (१५५) । अन्य बहुत से मन्त्रों या बहुत से साधनों की क्या आवश्यकता ? 'ॐ तत् सत्'—इसी ब्रह्म-मन्त्र द्वारा सभी कर्मों को सम्पन्न करे (१५६) । यह मन्त्र सुख- साधक है, इसमें कोई अधिकता नहीं है, फिर भी यह पूरा फल देनेवाला है। हे अम्बिके ! इस महा-मन्त्र के सिवा अन्य उपाय नहीं है (१५७) । जो गृह के द्वार पर या शरीर पर 'ॐ तत् सत्' इस मन्त्र को लिखकर धारण करता है, उसका गृह महा-तीर्थ के समान और शरीर पुण्य-मय होता है (१५८) । हे देवि ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, 'ॐ तत् सत्' यह मन्त्र निगम, आगम और सभी तन्त्रों में सार का सार है (१५६) । सब मन्त्रों से श्रेष्ठ यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के तालु, मस्तक और ब्रह्म-रन्ध्र को भेद कर प्रादुर्भूत हुआ है (१६०) । यदि इस मन्त्र से चर्व्य, चोष्य, भक्ष्य, लेह्य—इन चतुर्विध अन्नों का या अन्य वस्तु का शोधन किया जाय, तो फिर किसी अन्य वैदिक या तान्त्रिक मन्त्र से उसे शुद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती (१६१) । जो सर्वत सत्-स्वरूप ब्रह्म को प्रत्यक्ष करता है, जो 'ॐ तत् सत्' इस महा-मन्त्र का जप करता है, जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और जो स्वेच्छाचारी है, वही पृथ्वी पर श्रेष्ठ कौल है (१६२) । 'ॐ तत् सत्' मन्त्र का जप करने से मनुष्य 'सिद्ध' होता है, इसके अर्थ का चिन्तन करने से 'मुक्त' होता है और जो अर्थ-चिन्तन के साथ इस मन्त्र का जप करता है, वह मानव-शरीर-धारी होते हुए भी साक्षात् ब्रह्म के समान होता है (१६३) । यह 'त्रि-पद महा-मन्त्र' सब