महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कारणों का कारण है। इस मन्त्र का साधन करने से साधक स्वयं मृत्युञ्जय होता है (१६४)। हे महेश्वरि ! इस 'त्रि-पद मन्त्र' के दो-दो पदों या एक-एक पद का जप करने से साधक सिद्ध हो सकता है (१६५) । जो शैवावधूत-संस्कार से संस्कृत है, उसके लिए, अन्य कोई काम्य कर्म नहीं है, अतः वह दैव-कर्म, आर्य कर्म या पितृ-कर्म करने का अधिकारी नहीं है (१६६) । चतुर्विध अवधूतों में से चौथा अर्थात् 'पूर्ण ब्रह्मावधूत' को 'हंस' कहते हैं। अन्य त्रिविध अवधूत योग और भोग करते हैं किन्तु चारों ही प्रकार के अवधूत मुक्त होते हैं तथा शिव-तुल्य हैं (१६७)। 'हंस' अर्थात् 'पूर्ण ब्रह्मावधूत' स्त्री-संसर्ग या धातु-परिग्रह नहीं कर सकता; वह विधि-निषेध से रहित होकर प्रारब्ध भोग करनेवाला बनकर विहार करता है (१६८) । यह तुरीय (चतुर्थ) 'परमहंस' अपने जाति-चिह्न-शिखा, सूत्र, तिलक आदि को छोड़ देता है। वह गृहस्थ के कर्म भी नहीं करता। वह सङ्कल्प-रहित और उद्यम-हीन होकर पृथ्वो पर विचरण करता है (१६६) । वह सदा आत्म-भावना में ही सन्तुष्ट रहता है। वह शोक और मोह से अभिभूत नहीं होता। उसका कोई निश्चित रहने का स्थान नहीं होता। वह तितिक्षा-युक्त, शङ्का-हीन और निरुपद्रव रहता है (१७०) । वह किसी को लक्ष्य या पेय द्रव्य अर्पित नहीं करता । उसे ध्यान-धारणा नहीं करना है। वह मुक्त, विरक्त, निर्द्वन्द्व, हंसाचार-परायण और यति होता है (१७१) । हे देवि, यह मैंने तुमसे चतुर्विध कुल-योगी के लक्षणों का विशेष वर्णन किया है। ये सभी साधु हैं और मेरे ही स्वरूप हैं (१७२) । मनुष्य लोग यदि इन 'कुल-योगी' का दर्शन करें, इन्हें स्पर्श करें या इनसे बात करें या इन्हें सन्तुष्ट करें, तो उन्हें सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलेगा (१७३) । हे प्रिये ! पृथिवी पर जितने तीर्थ और पुण्य-क्षेत्र हैं, वे सभी 'कुल-संन्यासी' के देह में सदा विद्यमान रहते हैं (१७४) । जो लोग 'कुल-साधुओं' का अर्चन 'कुल- द्रव्य' द्वारा करते हैं, वे धन्य हैं, कृतार्थ हैं, पवित्र हैं, उन्हें सब यज्ञों का फल प्राप्त होता है (१७५) । 'कुल- योगियों' के छूने से अपवित्र व्यक्ति भी पवित्र होता है, अस्पृश्य व्यक्ति भी स्पृश्य होता है, अभक्ष्य वस्तु भी भक्ष्य हो जाती है (१७६) । जिस 'कुल-योगी' के स्पर्श से किरात, पापी, क्रूर, पुलिन्द, यवन, खल लोग भी पवित्र हो जाते हैं, उसे छोड़कर अन्य किसकी पूजा करनी चाहिए ? जो लोग 'कुल-योगियों' और 'कौल' लोगों की पूजा एक बार भी 'कुल-तत्त्व' एवं 'कुल-द्रव्यों' से भक्ति-पूर्वक करता है, वह स्वयं भी पृथ्वी में पूज्य हो जाता है (१७७-७८) । हे कमलानने ! 'कौल-धर्म' से श्रेष्ठ धर्म अन्य कोई नहीं है क्योंकि अन्त्यज व्यक्ति भी इस धर्म का आश्रय लेकर पवित्र होकर 'कौल'-पद को प्राप्त करता है (१७६) । हे प्रिये ! जिस प्रकार सभी प्राणियों के पद-चिह्न हाथी के पद-चिह्न में समा जाते हैं, उसी प्रकार सभी धर्म 'कुल-धर्म' में विलीन हो जाते हैं (१८०) । हे प्रिये ! स्वयं तीर्थ-स्वरूप 'कौल'-गण पवित्रतम हैं, इसमें क्या आश्चर्य । वे अपने सम्पर्क से म्लेच्छ, श्वपच और पापियों को भी पवित्र बना देते हैं (१८१) । जैसे गङ्गा में गिरा अन्य जल भी गङ्गा-जल में बदल जाता है, वैसे ही 'कुलाचार' में प्रविष्ट सभी जातियों के लोग 'कौल' बन जाते हैं (१८२) । जैसे समुद्र में गया जल अलग नहीं होता, वैसे ही 'कुल'-सागर में मग्न व्यक्ति उससे अलग नहीं होता (१८३) । इस भू-मण्डल में ब्राह्मण से अन्त्यज तक जितने दो पैर वाले प्राणी हैं, वे सभी 'कुलाचार' के अधिकारी हैं (१८४) । जो 'कुल-धर्म' में बुलाए जाने पर नहीं आता, वह सब धर्मों से भ्रष्ट होकर अधम गति को पाता है (१८५) । जो कोई मनुष्य 'कौला- चार'-हेतु प्रार्थना करते हैं, उन्हें यदि कोई 'कौल' भो ठगे, तो वह रौरव नरक में जाता है (१८६) । यदि कोई 'कौल' व्यक्ति किसी 'कौल'-धर्मावलम्बी बनने हेतु प्रार्थना करनेवाले को स्त्री, नीच, चण्डाल या यवन जानकर उसकी अवज्ञा कर उसे 'कौल' नहीं बनाता, तो वह 'कौलों' में अधम माना जाता है और अन्त में उसकी अधोगति होती है (१८७) । एक सौ अभिषेकों से, सौ पुरश्चरणों के करने से जो पुण्य होता है, उससे कोटि गुना अधिक