महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
चौदहवाँ उल्लास : शिव-लिङ्ग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । १९९ के साथ तुम प्रसन्न होओ। तुम्हें नमस्कार। हे वरदे ! हे देवि ! इस भवन में आओ। हे वर-दायिनि ! प्रसन्न होओ। हे महेश्वरि ! मुझे सब सम्पत्तियाँ दो। हे देव, हे देवेशि ! अपने-अपने परिवार के साथ उठो। तुम दोनों भक्त-वत्सल इस गृह में सुख से निवास करो और प्रसन्न होओ (५९-६३) इस प्रकार महेश्वर और महेश्वरी की प्रार्थना कर मङ्गल-ध्वनि करते हुए तीन बार गृह की प्रदक्षिणा कर उन्हें गृह के भीतर प्रवेश कराए (६४)। फिर मूल-मन्त्र को जपते हुए निम्न मन्त्र से पाषाण-खनित गर्त्त में या ईंट से बने गर्त के मध्य में लिङ्ग के नीचे का तीन भाग रोपित करे (६५)- यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत् पृथ्वी च सागराः। तावदत्र महा-देव! स्थिरो भव नमोऽस्तु ते।। अर्थात् जब तक चन्द्र और सूर्य हैं, जब तक पृथ्वी और सागर हैं, तब तक हे महा-देव ! तुम इस स्थान में स्थिर होकर रहो, तुम्हें नमस्कार (६६)। इस मन्त्र द्वारा सदाशिव को दृढ़ रूप से स्थापित कर मूल-मन्त्र को जपते हुए उत्तरीमुख गोरी-पट्ट को उनके ऊपर से प्रवेश कराए (६७) और यह मन्त्र पढ़े- स्थिरा भव जगद्धात्रि ! सृष्टि - स्थित्यन्त - कारिणि ! यावद् दिवा - निशा - नाथौ तावदत्र स्थिरा भव।। अर्थात् हे सृष्टि-स्थिति-संहार-कारिणि ! हे जगद्धात्रि ! स्थिर होओ। जब तक सूर्य और चन्द्र हैं, तब तक इस स्थान में स्थिर होकर रहो (६८)। इस प्रकार यन्त्र को सुदृढ़ कर शिव-लिङ्ग को स्पर्श कर निम्न मन्त्रों का पाठ करे (६९)- व्याघ्रा भूताः पिशाचाश्च गन्धर्वाः सिद्ध - चारणाः। यक्षा नागाश्च वेतालाः लोक - पाला महर्षयः।। मातरो गण - नाथाश्च विष्णुर्ब्रह्मा वृहस्पतिः। यस्य सिंहासने युक्ता भूचराः खेचरास्तथा।। आवाहयामि तं देवं त्र्यक्षमीशानमव्ययम् । आगच्छ भगवन्नत्र ब्रह्म - निर्मित - यन्त्रके।। ध्रुवाय भव सर्वेषां शुभाय च सुखाय च। अर्थात् व्याघ्र, भूत, पिशाच, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, यक्ष, नाग, वेताल, लोक-पाल, महर्षि, माताएँ, गण- पति, विष्णु, ब्रह्मा, वृहस्पति, भूचर और खेचर जिनके सिंहासन से युक्त हैं, उन अव्यय, त्रिनेत्र ईंशान का मैं आवाहन करता हूँ। हे भगवन् ! इस ब्रह्म-निर्मित यन्त्र में आइए और सभी प्राणियों को सुख तथा मङ्गलकारी हों (७०-७। अब देव-प्रतिष्ठा में बताई विधि से शिव को स्नान कराए (७३)। हे प्रिये ! पूर्ववत् ध्यान कर मानसोपचारों से पूजा करे। फिर विशेषार्घ्य-स्थापन कर गण-देवताओं की पूजा कर पुनः ध्यान कर लिंग पर पुष्प चढ़ाए (७४)। पाश ( आं ) और अंकुश ( क्रों ) से पुटित माया ( ह्रीं ) का उच्चारण कर 'य' से 'स' तक के सात अक्षरों को अनुस्वार-युक्त कर उनका पाठ कर अन्त में 'हौं हंसः' मन्त्रोच्चार कर उक्त लिंग में प्राण-प्रतिष्ठा करे। फिर चन्दन, अगुरु और काश्मीर (कुंकुम) से गिरिजा-पति के अंगों को चर्चित कर पूर्वोक्त विधि से षोडशोपचारों से पूजा करे। तब पहले बताई विधि से जात-कर्म, नामकरण आदि संस्कार कर वेदी पर देवी महेश्वरी की पूजा करने के बाद उस पर देव-देव अष्ट-मूर्ति की पूजा करे (७५-७६)। यथा- १ शर्वाय क्षिति नूर्तये नमः, २ भवाय जल-मूर्तये नमः, ३ रुद्राय अग्नि-मूर्तये नमः, ४ उग्राय वायु- मूर्तये नमः, ५ भीमाय आकाश-मूर्तये नमः, ६ पशु-पतये यजमान-मूर्तये नमः, ७ महा-देवाय सोम-मूर्तये नमः, ८ ईशानाय सूर्य-मूर्तये नमः।
१२० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र यही अष्ट-मूर्तियां हैं (७७-७६) । आदि में 'प्रणव' और अन्त में 'नमः' लगाकर प्रत्येक मूर्ति का आवाहन कर पूर्व से ईशान कोण तक क्रमशः उक्त आठ मूर्तियों की पूजा करे (८०) । फिर इन्द्रादि दश दिक्-पालों और ब्राह्मी आदि आठ मातृकाओं की पूजा कर वृष, वितान, गृह आदि सभी महेश्वर के प्रति उत्सर्ग करे (८१) । तब हाथ जोड़कर भक्ति-पूर्वक पार्वती-पति महादेव से प्रार्थना करे (८२)— गृहेऽस्मिन् करुणा-सिन्धो ! स्थापितोऽसि मया प्रभो ! प्रसीद भगवन् शम्भो ! सर्व-कारण-कारण ॥ यावत् स-सागरा पृथ्वो यावत् शशि-दिवाकरौ । तावदस्मिन् गृहे तिष्ठ नमस्ते परमेश्वर ॥ गृहेऽस्मिन् यस्य कस्यापि जीवस्य मरणं भवेत् । न तत्-पापैः प्रलिप्येऽहं प्रसादात् तव धूर्जटे ॥ अर्थात् हे दया-सागर ! मैंने तुम्हें इस गृह में स्थापित किया है । हे प्रभो ! तुम सभी कारणों के कारण हो । हे भगवन् शम्भो ! प्रसन्न होओ । हे परमेश्वर ! जब तक सागरों सहित पृथ्वी है, जब तक सूर्य-चन्द्र हैं, तब तक तुम इस गृह में रहो । तुम्हें नमस्कार । हे धूर्जटे ! इस गृह में जिस किसी जीव की मृत्यु हो, तुम्हारो कृपा से मैं उसके पाप में लिप्त न होऊँ (८३-८५) । अब प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे और घर जाये । अगले दिन प्रातः वहीं आकर चन्द्र-शेखर को स्नान कराये (८६) । पहले शुद्ध पंचामृत से, फिर सुगन्धित जल से भरे एक सौ कलश द्वारा स्नान कराये (८७) । तब यथा-शक्ति पूजा कर प्रार्थना करे (८८)— विधि-हीनं क्रिया-हीनं भक्ति-हीनं यदर्चितम् । सम्पूर्णमस्तु तत् सर्वं त्वत्-प्रसादादुमा-पते ॥ यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत् पृथ्वी च सागराः । तावन्मे कीर्तिरतुला लोके तिष्ठतु सर्वदा ॥ नमस्त्र्यक्षाय रुद्राय पिनाक-वर-धारिणे । विष्णु-ब्रह्मेन्द्र-सूर्याद्यैरर्चिताय नमो नमः ॥ अर्थात् हे उमा-पते ! इस पूजा में जो कुछ विधि-हीन, क्रिया-हीन, भक्ति-हीन हुआ हो, वह सब तुम्हारी कृपा से पूर्ण हो और जब तक सूर्य तथा चन्द्र हैं, पृथ्वो और सागर हैं, तब तक इस संसार में मेरा अनुपम यश बना रहे । श्रेष्ठ पिनाक-धारी, त्रिनेत्र रुद्र को नमस्कार । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्यादि द्वारा पूजित महेश्वर को बारंबार नमस्कार (८६-६१) । अब दक्षिणा देकर कौलिकों और ब्राह्मणों को भोजन कराए । फिर दरिद्रों को भक्ष्य, पेय द्रव्यों और वस्त्रों से सन्तुष्ट करे (६२) । तब प्रतिदिन यथा-शक्ति महेश्वर की पूजा करे किन्तु स्थावर शिवलिंग को कभी स्थान से न हटाये (६३) । हे परमेश्वरि ! मैंने समस्त आगमों से उद्धृत कर संक्षेप में अचल शिव-लिंग की प्रतिष्ठा की यह विधि तुम्हें बताई है (६४) । भगवती ने जिज्ञासा की—हे विभो ! यदि अकस्मात् किसी दिन देवता की पूजा न हो सके, तो भक्त लोग क्या करें (६५) ? किस दोष से देव-मूर्ति अपूज्य और त्याज्य हो जाती है, इसे भी मुझे बताइए (६६) । श्री सदाशिव ने कहा—यदि किसी दिन पूजा न हो सके, तो अगले दिन उस देव-मूर्ति की दुगुनी पूजा करे । दो दिन पूजा न हो सके, तो चौगुनी और तीन दिन पूजा न होने पर आठ-गुनी पूजा करे (६७) । यदि छः महीने तक पूजा न हो, तो आठ कलश जल से देव-मूर्ति को स्नान कराकर पूजा करे (६८) । यदि छः मास से अधिक समय तक पूजा न हो, तो पूर्वोक्त संस्कार-विधि के अनुसार देव-मूर्ति को पुनः सुसंस्कृत कर पूजा करे (६६) । जो देव-मूर्ति टूटी हो, छिद्रवाली हो, कुष्ट-रोगी द्वारा छू गई हो या अंग-हीन हो, उसे जल में विसर्जित कर दे । जो मूर्ति दूषित हो भूमि पर गिर पड़ी हो, उसकी पूजा न करे (१००) । अंगहीन, टूटी, छिद्रवाली मूर्ति
चौदहवाँ उल्लास : शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । १२१ का विसर्जन जल में करे किन्तु स्पर्शादि दोषों से दूषित मूर्ति का पुनः संस्कार कर पूजा कर सकते हैं (१०१) । जो महा-पीठ और अनादि लिंग हैं, उनमें अस्पृश्य-स्पर्शादि दोष नहीं होते, अतः सुख-प्राप्ति के लिए उनमें सदा अपने अभीष्ट देवता की पूजा करे (१०२) । हे महा-माये ! कर्म के अनुसार जीवित रहनेवाले मनुष्यों के कल्याण के लिए तुमने जो-जो पूछा, मैंने वह सब बताया है (१०३) । मनुष्य लोग बिना कर्म किए एक क्षण भी नहीं रह सकते । वे इच्छा न होते हुए भी लाचार होकर कर्म-रूपी वायु से आकृष्ट होते हैं (१०४) । कर्मों से ही वे सुख पाते हैं, दुःख भोगते हैं, जन्म पाते हैं, मृत्यु को प्राप्त होते हैं और कर्मों के वश में रहकर ही जीवित रहते हैं (१०५) । इसीलिए मैंने अल्पज्ञ व्यक्तियों की प्रवृत्ति के लिए और दुष्प्रवृत्ति को निवृत्ति के लिए साधन-सहित बहुत से कर्म बताए हैं अर्थात् जो अनेक जन्मों में बहुत से कर्म करके तत्त्व-ज्ञानी हुए हैं, उनके लिए नहीं, अपितु जो संसारी अविद्यादि से पूर्ण हैं, उन्हीं के लिए उक्त कर्म निर्दिष्ट किए हैं (१०६) । कर्म दो प्रकार के हैं—१ शुभ, २ अशुभ। अशुभ कर्म करने से प्राणी लोग बड़ी यातना भोगते हैं (१०७) हे देवि ! जो लोग फल के लोभ में शुभ कर्म करते हैं, वे भी इन कर्मों की जंजीर में बँधकर इस लोक और परलोक में आते-जाते रहते हैं (१०८) । शुभ या अशुभ कर्मों का क्षय न होने पर, सौ कल्पों तक भी मनुष्य की मुक्ति नहीं होती (१०६) । जिस प्रकार लोहे या सोने की जंजीर से बन्धन होता है, उसी प्रकार जीव अशुभ या शुभ कर्म से बँधता है (११०) । जब तक ज्ञान नहीं होता, तब तक निरन्तर कर्मानुष्ठान करके या अनेक प्रकार के कष्ट उठाकर भी मोक्ष को नहीं पा सकते (१११) । ज्ञानी, निर्मलात्मा पण्डितों के तत्त्व-विचार या निष्काम-कर्मानुष्ठान द्वारा ही ज्ञान प्राप्त होता है (११२) । ब्रह्मा से लेकर एक तिनके तक सारा जगत् माया द्वारा कल्पित है और मिथ्या है; केवल एक 'परम ब्रह्म' ही सत्य है, यह ज्ञात होने पर सुख मिलता है (११३) । जो 'मेरा नाम अमुक है, मैं गौर-वर्ण हूँ' इत्यादि मिथ्या ज्ञान का छोड़कर अविद्या-शून्य हो जाता है अर्थात् नित्य, निश्चल ब्रह्म के तत्त्व का निरूपण करता है, वह कर्म के बन्धन से मुक्त होता है (११४) । जप, होम या सौ-सौ उपवास करने से भी मुक्ति नहीं मिलती किन्तु 'ब्रह्मैवाहं' अर्थात् 'ब्रह्म ही मैं हूँ'—इस प्रकार का ज्ञान होने से देही मुक्त हो जाता है (११५) । आत्मा साक्षी है अर्थात् शुभाशुभ का द्रष्टा विभु है—सर्व-व्यापक, पूर्ण, अद्वितीय, परात्पर है और देह से सम्बद्ध होते हुए भी देह-धर्म से अलिप्त है, यह जानने से प्राणी मुक्ति का अधिकारी होता है (११६) । जो व्यक्ति नाम-रूपादि कल्पना को बाल्य-क्रीडा के समान छोड़कर ब्रह्म-निष्ठ होता है, वह मुक्ति पाता है, इसमें सन्देह नहीं (११७) । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार बचपन के बीतने पर बाल्य-काल के खेलों को व्यक्ति छोड़ देता है, उसी प्रकार साधना के प्रारम्भिक काल में ब्रह्म के रूप अर्थात् दश-भुजादि एवं नाम अर्थात् काली, दुर्गादि, परिच्छद अर्थात् रक्त-वस्त्रादि की कल्पना और तदनुसार १ बाह्य पूजा, २ मानस पूजा और स्तुति, ३ ध्यान—इन सभी क्रीड़ाओं को क्रमशः करते हुए साधना में प्रवीण होने पर इन सभी कर्मों को छोड़ दे । तब ब्रह्म-परायण होकर मुक्ति को प्राप्त करे किन्तु जिस प्रकार बाल्य-काल में बालोचित क्रीड़ाओं को छोड़कर बड़ों के समान कार्य करने की चेष्टा करना उचित नहीं है, उसी प्रकार साधना की प्रारंभिक अवस्था में नाम-रूपादि की कल्पना छोड़कर ब्रह्म-परायण होने की चेष्टा करना कल्याणकारी नहीं है । अतः जैसे आयु के अनुसार कर्म करने चाहिए, वैसे ही साधना के कम या अधिक अभ्यास के अनुसार ही कर्म विहित हैं । मनः-कल्पित मूर्ति अर्थात् मन-ही-मन निर्मित अशास्त्रीय मूर्ति यदि मनुष्यों को मोक्ष-दायिनी हो, तो मनुष्य स्वप्न में प्राप्त राज्य द्वारा ही वास्तविक राजा बन जाते । आद्या आदि की शास्त्रोक्त मूर्ति मोक्ष-दायिनी होती है, ऐसा पहले बताया है । अतः यहाँ तात्पर्य यह है कि मनमानी मूर्ति मोक्षदा नहीं होती (११८) । मिट्टी, शा०—१६
१२२ । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पत्थर, धातु या काष्ठादि की मूर्ति को ईश्वर माननेवाले तप करते हुए कष्ट ही उठाते हैं; तप से ज्ञान होने पर ही वे मुक्ति प्राप्त करते हैं (११९) । मनुष्य लोग आहार-संयम कर चाहे कष्ट उठायें या यथेष्ट आहार कर मोटे-ताजे बनें, यदि ब्रह्म-ज्ञान से रहित रहते हैं, तो उनका निस्तार किसी प्रकार नहीं होता (१२०) । जो केवल वायु पीकर या पत्ते खाकर या कण भक्षण कर या जल मात्र पीकर व्रत करते हैं, वे यदि उससे मोक्ष पा जायें, तो सर्प, पशु-पक्षी, जल-जन्तु—ये सभी मोक्ष के अधिकारी हो जायें । तात्पर्य यह है कि केवल आहार के नियम-रूपी सत्कर्म के करने से मोक्ष नहीं मिलता, अपितु विविध व्रतों, अनेक उपवासों एवं अनेक जन्मों की आराधना से चित्त की शुद्धि होने पर जब तत्त्व-ज्ञान होता है, तब मोक्ष मिलता है (१२१) । ब्रह्म ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है—यही भाव उत्तम है । ध्यान का भाव मध्यम है । स्तव और जप का भाव अधम है और बाह्य पूजा अधम से भी अधम है । तात्पर्य यह है कि पहले बाह्य-पूजा, फिर मानसिक पूजा और स्तुति, तब ध्यान—क्रमशः इन सबको करता हुआ साधक ब्रह्म-सद्भाव अर्थात् तत्त्व-ज्ञान-रूपी श्रेष्ठ स्थिति को प्राप्त करता है (१२२) । जीव और आत्मा के ऐक्य को ही 'योग' कहते हैं तथा सेवक और ईश्वर के ऐक्य को ही 'पूजा' कहते हैं । सब कुछ ब्रह्म ही है—'सर्वं ब्रह्म', ऐसा ज्ञान जिसे होता है, उसके लिए योग और पूजा कुछ नहीं है (१२३) । जिसके हृदय में परम ज्ञान--ब्रह्म-ज्ञान विराजमान है, उसके लिए जप, यज्ञादि तप, नियम, व्रतादि किसी की आवश्यकता नहीं है (१२४) । जो सर्वत सत्य-स्वरूप, विज्ञान-स्वरूप, आनन्द-स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म को साक्षात् कर लेता है, वह स्वभावतः ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है, उसके लिए पूजा और ध्यान-धारणा कुछ नहीं है (१२५) । 'सर्वं ब्रह्म'—सब कुछ ब्रह्म है, ऐसा जाननेवाले को पाप, पुण्य, स्वर्ग, पुनर्जन्म, ध्येय और ध्याता कुछ भी महत्व नहीं रखते (१२६) । यह आत्मा सदा ही मुक्त है, वह किसी भी वस्तु से लिप्त नहीं होती । उसका बन्धन क्या है, जिससे मुक्ति पाने की इच्छा दुर्बुद्धि लोग करते हैं (१२७) ? यह जगत् ब्रह्म की माया द्वारा विरचित है । देवता भी इसे नहीं समझ सकते । इस जगत् में परम ब्रह्म प्रविष्ट न होकर भी प्रविष्ट-जैसा स्वयं विराजमान रहता है (१२८) । जिस प्रकार सभी वस्तुओं के भीतर और बाहर आकाश है, उसी प्रकार सत्-स्वरूप और साक्षी- स्वरूप आत्मा सर्वत स्वरूप से प्रकाशमान रहता है (१२९) । आत्मा का न जन्म है, न बाल्यावस्था है, न युवा- वस्था—न वृद्धावस्था है; वह सदैव एक-रूप, चिन्मय और विकार-रहित है (१३०) । जन्म, यौवन और वृद्धा- वस्था देह को ही होती है, आत्मा की नहीं । माया से बुद्धि के ढंके होने से लोग यह देखकर भी नहीं देखते (१३१) । जैसे अनेक शरावों (पात्रों) में स्थित जल में अनेक सूर्य दिखाई देते हैं, वैसे ही माया के प्रभाव से अनेक शरीरों में अनेक आत्मायें दिखाई देती हैं (१३२) । जैसे जल के हिलने से उसमें प्रतिबिम्बित चन्द्र का हिलना प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति की बुद्धि चंचल होने से आत्मा को भी चंचल समझ बैठते हैं (१३३) । जैसे घट के टूटने पर भी घटस्थ आकाश पहले ही जैसा रहता है, वैसे ही देह के नष्ट होने पर भी आत्मा सदा सम-भाव में विराजमान रहती है (१३४) हे देवि ! यही ब्रह्म-ज्ञान मोक्ष का परम कारण है । जो इसे जानता है, वह इसी लोक में जीवन्मुक्त होकर रहता है, इसमें सन्देह नहीं (१३५) । मनुष्य कर्म द्वारा मुक्त नहीं होता, सन्तान उत्पन्न करके मुक्त नहीं होता, धन द्वारा भी मुक्त नहीं होता अपितु अपने द्वारा अपने को जानकर ही वह मुक्त होता है (१३६) । सभी जीवों को आत्मा ही परम प्रिय है, आत्मा से अधिक प्रिय कोई अन्य वस्तु नहीं है । हे शिवे ! इस लोक में अन्य व्यक्ति आत्म-सम्बन्ध के कारण ही प्रिय होता है (१३७) । ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीन माया द्वारा ही प्रतीत होते हैं । इन तीनों के तत्त्व का विचार करने पर एकमात्र आत्मा ही शेष रहती है (१३८) । चिन्मय आत्मा ही ज्ञान है, चिन्मय आत्मा ही ज्ञेय वस्तु है और स्वयं आत्मा ही ज्ञाता है । जो इसे जानता है, वही आत्म-वित् है (१३९) । यह मैंने तुमसे साक्षात् मोक्ष के कारण-स्वरूप ज्ञान का
चौदहवाँ उल्लास : शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण | १२३ उपदेश किया है। यह चतुर्विध अवधूतों का परम धन है (१४०) । श्री भगवती ने कहा—आपने पहले गृहस्थ और भिक्षुक—इन दो आश्रमों की बात कही है। अब कहते हैं कि अवधूत आश्रम चतुर्विध है। इससे मुझे आश्चर्य है कि यह क्या है ? हे प्रभो ! चार प्रकार के अवधूतों के लक्षण विशेष रूप से बताइए, मैं उन्हें सुनकर उनका तत्त्व जानना चाहती हूँ (१४१-४२) । श्री सदाशिव ने कहा—हे प्रिये ! जो सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जाति-वर्ग ब्रह्म-मन्त्र के उपासक हैं, वे गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी 'यति' कहे जाते हैं। हे कुलाचिते ! जो मनुष्य पूर्णाभिषेक की विधि से संस्कृत होते हैं, वे 'शैवावधूत' हैं और सभी के पूज्य हैं (१४३-४४) । ब्राह्मावधूत और शैवावधूत अपने आश्रम और आचार का पालन करते हुए मेरे बताए मार्ग पर चलकर सभी कर्मों को करते हैं। ब्राह्मावधूत ब्रह्मार्पित द्रव्य के सिवा कोई भी निषिद्ध अन्न और जल-ग्रहण नहीं करते (१४५-४६) । हे वरानने ! ब्राह्मावधूत कौलों और अभिषिक्त कौलों के आचार तथा धर्म का कथन पहले हो चुका है। स्नान, सन्ध्या, भोजन, पान, दान, स्त्री-रक्षा —इन सभी कर्मों का अनुष्ठान शैवावधूत और ब्राह्मावधूत आगम के अनुसार करते हैं (१४७-४८) उक्त शैवाव- धूत और ब्राह्मावधूत दो प्रकार के हैं—१ पूर्ण, २ अपूर्ण । हे प्रिये ! पूर्ण शैवावधूत और ब्राह्मावधूत का नाम है 'परमहंस' । अपूर्ण शैवावधूत और ब्राह्मावधूत को 'परिव्राट्' कहते हैं (१४६) । जो मनुष्य अवधूत-संस्कार से संस्कृत होते हैं, वे यदि ज्ञान-विषय में दुर्बल हैं अर्थात् यदि उनमें पूर्ण अद्वैत भाव उत्पन्न नहीं होता, तो वे लोकालय में रहकर आत्म-शोधन करें और जिस प्रकार 'एकमेवाद्वितीयं'—यह ज्ञान उत्पन्न हो, उस प्रकार करें (१५०) । वे अपने जाति-चिह्न शिखा-सूत्रादि की रक्षा करें। वे कौल के समान सभी कर्मों का अनुष्ठान करें, निरन्तर ब्रह्म-निष्ठ होकर ज्ञान-साधन करें (१५१) । वे सदा वीत-राग होकर 'ॐ तत् सत्' इस मन्त्र का उच्चा- रण करते हुए 'सोऽहमस्मि' इस प्रकार चिन्तन कर अपने उपयोगी कर्मों का अनुष्ठान करें (१५२) । वे पद्म-पत्र पर स्थित जल के समान अनासक्त-हृदय होकर सभी कर्मों का अनुष्ठान कर तत्त्व-ज्ञान के विचार द्वारा अपना उद्धार करने को—मोक्ष पाने को यत्न-शील हों (१५३) । गृहस्थ हों या उदासीन हों, 'ॐ तत् सत्' इसी मन्त्र द्वारा जो जिस कार्य का अनुष्ठान करेगा, उसी से उसका वह कर्म अभीष्ट फल-दायक होगा (१५४) । जप, होम, प्रतिष्ठा, संस्कार आदि सभी कर्म 'ॐ तत् सत्' मन्त्र द्वारा सम्पन्न होने से ही पूरे होते हैं, इसमें सन्देह नहीं (१५५) । अन्य बहुत से मन्त्रों या बहुत से साधनों की क्या आवश्यकता ? 'ॐ तत् सत्'—इसी ब्रह्म-मन्त्र द्वारा सभी कर्मों को सम्पन्न करे (१५६) । यह मन्त्र सुख- साधक है, इसमें कोई अधिकता नहीं है, फिर भी यह पूरा फल देनेवाला है। हे अम्बिके ! इस महा-मन्त्र के सिवा अन्य उपाय नहीं है (१५७) । जो गृह के द्वार पर या शरीर पर 'ॐ तत् सत्' इस मन्त्र को लिखकर धारण करता है, उसका गृह महा-तीर्थ के समान और शरीर पुण्य-मय होता है (१५८) । हे देवि ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, 'ॐ तत् सत्' यह मन्त्र निगम, आगम और सभी तन्त्रों में सार का सार है (१५६) । सब मन्त्रों से श्रेष्ठ यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के तालु, मस्तक और ब्रह्म-रन्ध्र को भेद कर प्रादुर्भूत हुआ है (१६०) । यदि इस मन्त्र से चर्व्य, चोष्य, भक्ष्य, लेह्य—इन चतुर्विध अन्नों का या अन्य वस्तु का शोधन किया जाय, तो फिर किसी अन्य वैदिक या तान्त्रिक मन्त्र से उसे शुद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती (१६१) । जो सर्वत सत्-स्वरूप ब्रह्म को प्रत्यक्ष करता है, जो 'ॐ तत् सत्' इस महा-मन्त्र का जप करता है, जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और जो स्वेच्छाचारी है, वही पृथ्वी पर श्रेष्ठ कौल है (१६२) । 'ॐ तत् सत्' मन्त्र का जप करने से मनुष्य 'सिद्ध' होता है, इसके अर्थ का चिन्तन करने से 'मुक्त' होता है और जो अर्थ-चिन्तन के साथ इस मन्त्र का जप करता है, वह मानव-शरीर-धारी होते हुए भी साक्षात् ब्रह्म के समान होता है (१६३) । यह 'त्रि-पद महा-मन्त्र' सब
१२४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कारणों का कारण है। इस मन्त्र का साधन करने से साधक स्वयं मृत्युञ्जय होता है (१६४)। हे महेश्वरि ! इस 'त्रि-पद मन्त्र' के दो-दो पदों या एक-एक पद का जप करने से साधक सिद्ध हो सकता है (१६५) । जो शैवावधूत-संस्कार से संस्कृत है, उसके लिए, अन्य कोई काम्य कर्म नहीं है, अतः वह दैव-कर्म, आर्य कर्म या पितृ-कर्म करने का अधिकारी नहीं है (१६६) । चतुर्विध अवधूतों में से चौथा अर्थात् 'पूर्ण ब्रह्मावधूत' को 'हंस' कहते हैं। अन्य त्रिविध अवधूत योग और भोग करते हैं किन्तु चारों ही प्रकार के अवधूत मुक्त होते हैं तथा शिव-तुल्य हैं (१६७)। 'हंस' अर्थात् 'पूर्ण ब्रह्मावधूत' स्त्री-संसर्ग या धातु-परिग्रह नहीं कर सकता; वह विधि-निषेध से रहित होकर प्रारब्ध भोग करनेवाला बनकर विहार करता है (१६८) । यह तुरीय (चतुर्थ) 'परमहंस' अपने जाति-चिह्न-शिखा, सूत्र, तिलक आदि को छोड़ देता है। वह गृहस्थ के कर्म भी नहीं करता। वह सङ्कल्प-रहित और उद्यम-हीन होकर पृथ्वो पर विचरण करता है (१६६) । वह सदा आत्म-भावना में ही सन्तुष्ट रहता है। वह शोक और मोह से अभिभूत नहीं होता। उसका कोई निश्चित रहने का स्थान नहीं होता। वह तितिक्षा-युक्त, शङ्का-हीन और निरुपद्रव रहता है (१७०) । वह किसी को लक्ष्य या पेय द्रव्य अर्पित नहीं करता । उसे ध्यान-धारणा नहीं करना है। वह मुक्त, विरक्त, निर्द्वन्द्व, हंसाचार-परायण और यति होता है (१७१) । हे देवि, यह मैंने तुमसे चतुर्विध कुल-योगी के लक्षणों का विशेष वर्णन किया है। ये सभी साधु हैं और मेरे ही स्वरूप हैं (१७२) । मनुष्य लोग यदि इन 'कुल-योगी' का दर्शन करें, इन्हें स्पर्श करें या इनसे बात करें या इन्हें सन्तुष्ट करें, तो उन्हें सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलेगा (१७३) । हे प्रिये ! पृथिवी पर जितने तीर्थ और पुण्य-क्षेत्र हैं, वे सभी 'कुल-संन्यासी' के देह में सदा विद्यमान रहते हैं (१७४) । जो लोग 'कुल-साधुओं' का अर्चन 'कुल- द्रव्य' द्वारा करते हैं, वे धन्य हैं, कृतार्थ हैं, पवित्र हैं, उन्हें सब यज्ञों का फल प्राप्त होता है (१७५) । 'कुल- योगियों' के छूने से अपवित्र व्यक्ति भी पवित्र होता है, अस्पृश्य व्यक्ति भी स्पृश्य होता है, अभक्ष्य वस्तु भी भक्ष्य हो जाती है (१७६) । जिस 'कुल-योगी' के स्पर्श से किरात, पापी, क्रूर, पुलिन्द, यवन, खल लोग भी पवित्र हो जाते हैं, उसे छोड़कर अन्य किसकी पूजा करनी चाहिए ? जो लोग 'कुल-योगियों' और 'कौल' लोगों की पूजा एक बार भी 'कुल-तत्त्व' एवं 'कुल-द्रव्यों' से भक्ति-पूर्वक करता है, वह स्वयं भी पृथ्वी में पूज्य हो जाता है (१७७-७८) । हे कमलानने ! 'कौल-धर्म' से श्रेष्ठ धर्म अन्य कोई नहीं है क्योंकि अन्त्यज व्यक्ति भी इस धर्म का आश्रय लेकर पवित्र होकर 'कौल'-पद को प्राप्त करता है (१७६) । हे प्रिये ! जिस प्रकार सभी प्राणियों के पद-चिह्न हाथी के पद-चिह्न में समा जाते हैं, उसी प्रकार सभी धर्म 'कुल-धर्म' में विलीन हो जाते हैं (१८०) । हे प्रिये ! स्वयं तीर्थ-स्वरूप 'कौल'-गण पवित्रतम हैं, इसमें क्या आश्चर्य । वे अपने सम्पर्क से म्लेच्छ, श्वपच और पापियों को भी पवित्र बना देते हैं (१८१) । जैसे गङ्गा में गिरा अन्य जल भी गङ्गा-जल में बदल जाता है, वैसे ही 'कुलाचार' में प्रविष्ट सभी जातियों के लोग 'कौल' बन जाते हैं (१८२) । जैसे समुद्र में गया जल अलग नहीं होता, वैसे ही 'कुल'-सागर में मग्न व्यक्ति उससे अलग नहीं होता (१८३) । इस भू-मण्डल में ब्राह्मण से अन्त्यज तक जितने दो पैर वाले प्राणी हैं, वे सभी 'कुलाचार' के अधिकारी हैं (१८४) । जो 'कुल-धर्म' में बुलाए जाने पर नहीं आता, वह सब धर्मों से भ्रष्ट होकर अधम गति को पाता है (१८५) । जो कोई मनुष्य 'कौला- चार'-हेतु प्रार्थना करते हैं, उन्हें यदि कोई 'कौल' भो ठगे, तो वह रौरव नरक में जाता है (१८६) । यदि कोई 'कौल' व्यक्ति किसी 'कौल'-धर्मावलम्बी बनने हेतु प्रार्थना करनेवाले को स्त्री, नीच, चण्डाल या यवन जानकर उसकी अवज्ञा कर उसे 'कौल' नहीं बनाता, तो वह 'कौलों' में अधम माना जाता है और अन्त में उसकी अधोगति होती है (१८७) । एक सौ अभिषेकों से, सौ पुरश्चरणों के करने से जो पुण्य होता है, उससे कोटि गुना अधिक
चौदहवां उल्लास : शिव-लिंग-स्थापन एवं चतुर्विध अवधूतों का विवरण । १२५ पुण्य एक व्यक्ति को 'कौल' बनाने से मिलता है (१८८) । भू-मण्डल में जो-जो वर्ण हैं और जितने धर्मावलम्बी लोग हैं, उनमें से जो 'कौल' होते हैं, वे ही पाश-मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करते हैं (१८६) । शिवोक्त धर्माव- लम्बी 'कौल'-गण साक्षात् शिव-स्वरूप और तीर्थ-स्वरूप हैं। स्नेह, श्रद्धा और प्रेम द्वारा वे एक दूसरे का पूजन और सम्मान करते हैं (१६०) । मैं अधिक क्या कहूँ, तुमसे सत्य कहता हूँ कि इस संसार-सागर को पार करने के लिए 'कुल-धर्म' ही सेतु के समान है । उसके सिवा संसार-सागर से पार करानेवाला अन्य कोई उपाय नहीं है । 'कुल-धर्म' के सेवन से सभी संशय कट जाते हैं, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और कर्म-समूह जल जाते हैं (१६१- ६२) । जो सत्य-व्रती और ब्रह्म-निष्ठ हैं, वे कृपा-वश मनुष्यों को बुलाकर 'कुलाचार' से पवित्र करते हैं । वे ही सब महात्मा श्रेष्ठ 'कौलिक' माने जाते हैं (१६३) । हे देवि ! यह मैंने तुम्हें लोक-पावन, सर्व-धर्म-निर्णायक 'महा-निर्वाण-तन्त्र' का पूर्वार्द्ध सुनाया है (१८४) । जो इसे ध्यान से सुनता है या मनुष्यों को सुनाता है, वह सभी पापों से छूटकर अन्त में 'मोक्ष'-पद को पाता है (१८६५) । सभी आगमों और तन्त्रों में परात्पर व सारात्सार इस तन्त्र-राज को जानकर मनुष्य सब शास्त्रों का ज्ञाता होता है (१८६) । जिसे यह 'महा-निर्वाण-तन्त्र' ज्ञात है, उसे तीर्थ-भ्रमण, यज्ञ, जप, साधना करने की आवश्यकता नहीं । वह केवल 'महा-निर्वाण-तन्त्र' के ज्ञान द्वारा कर्मों के पाश से मुक्ति पा जाता है (१९७) । हे कालिके ! जो इस 'मह -निर्वाण-तन्त्र' को जानता है, वह सब शास्त्रों का ज्ञाता है, वही समस्त धर्मज्ञ लोगों के बीच श्रेष्ठ है; वही साधु, ज्ञानी और ब्रह्मज्ञ है (१९८) । वेद, पुराण, स्मृति, संहिता आदि और अन्यान्य बहुत तन्त्रों के जानने की क्या आवश्यकता ? केवल इसी 'महा-निर्वाण-तन्त्र' के ज्ञात होने से वह सर्वज्ञ हो जाता है (१८६) । जो सारे साधन और उत्तम ज्ञान अत्यन्त गोपनीय थे, उन्हें मैंने तुम्हारे प्रश्नों के अनुसार इस 'महा-निर्वाण-तन्त्र' में सुन्दर रूप से प्रकाशित कर दिया है (२००) । हे सुव्रते ! तुम जैसे ब्रह्म- शक्ति हो व मेरे लिए प्राणों से भी अधिक हो, इसी प्रकार इस 'महा-निर्वाण-तंत्र' को भी प्राणों से अधिक जाने (२०१) । जैसे सभी पर्वतों में हिमालय, नक्षत्रों में चन्द्र, तेजवाले पदार्थों में सूर्य श्रेष्ठ है, वैसे ही तन्त्रों में यह तन्त्रराज श्रेष्ठ है (२०२) । यह तन्त्र सर्व-धर्म-मय और ब्रह्म-ज्ञान का एकमात्र साधक है, जो इस साधन को करता या कराता है, वह ब्रह्म-ज्ञानी होता (२०३) । हे देवेशि ! सभी तन्त्रों की अपेक्षा श्रेष्ठतम यह तन्त्र जिसके घर में रहता है, उसके वंश में कभी कोई 'पशु' नहीं होता (२०४) । जो अज्ञान से अन्धा, मूर्ख, क्रम- साधन के विषय में जड़ है, वह भी यदि इस तन्त्र को सुनता है, तो वह कर्म-पाश से छूट जाता है (२०५) । हे परमेश्वरि ! इस महा-तन्त्र का पाठ, श्रवण, पूजन या वन्दन मनुष्य के लिए कैवल्य-दायक है (२०६) । एक-एक आख्यान से युक्त अनेक तन्त्र कहे हैं और सब धर्मों से युक्त तन्त्र मेरे द्वारा कहे गये हैं किन्तु इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ अन्य कोई तन्त्र नहीं है (२०७) । इस 'महा-निर्वाण-तंत्र' के उत्तरार्ध में 'पाताल-चक्र' और 'ज्योतिष्चक्र' से समन्वित 'भू-चक्र' दिया है। जिसे वह उत्तरार्द्ध ज्ञात है, वह सर्वज्ञ होता है, इसमें सन्देह नहीं (२०८)। जो मनुष्य परार्द्ध-सहित इस तन्त्र को जानता है, वह त्रि-काल-वार्त्ता और त्रैलोक्य-वृत्तान्त का वर्णन करने में समर्थ होता है (२०६) । अनेक प्रकार के तन्त्र हैं, बहुत प्रकार के शास्त्र भी हैं, परन्तु कोई भी शास्त्र या तन्त्र इस 'महा-निर्वाण-तंत्र' के सोलह अंशों में से एक अंश के भी समकक्ष नहीं है (२१०) । मैं इस तन्त्र के माहात्म्य का वर्णन क्या करूँ, इस महा-तन्त्र का ज्ञान होने से 'ब्रह्म-निर्वाण' प्राप्त होता है (२११) ।
परिशिष्ट महा-निर्वाण तन्त्र के तीन अनूठे उद्धरण वङ्ग प्रदेश के मेहार-पीठ (जिला टिपरा, बांग्लादेश) के दश-महाविद्या-सिद्ध श्री सर्वानन्द-नाथ १६वीं शती में प्रसिद्ध तांत्रिक सिद्ध महापुरुष हो गए हैं। आपकी कृति 'सर्वोल्लास-तन्त्र' एक संग्रहणीय साधकोपयोगी संग्रह-ग्रन्थ है। इसमें 'महा-निर्वाण-तंत्र' के तीन उद्धरण मिलते हैं, जो प्रचलित संस्करणों में उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें यहाँ पहले-पहल उद्धृत किया जा रहा है— (१) 'सर्वोल्लास तन्त्र' के छठे उल्लास (लय-प्रकरणं) में— श्रीशिव उव. - महा-काली परात्मा च चणकाकार-रूपिणी । मायाच्छादितात्मानं तन्मध्ये सम-भावतः ॥ महा-रुद्रः स एवात्मा महा-विष्णुः स एव हि । महा-ब्रह्मा स एवात्मा नाम-मात्र-विभेदकः ॥ एक-मूर्तिस्त्रि-नामानि ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । नाना-भाव-मनो यस्य तस्य मुक्तिर्न विद्यते ॥ ब्रह्माण्डास्तत्र जायन्ते लक्ष लक्षं सुलोचने ! तत्र ब्रह्मा तत्र विष्णुस्तत्र रुद्रः प्रविन्धसेत् ॥ केचिद् वदन्ति स ब्रह्मा केचिद् विष्णुः प्रकथ्यते । केचिद् वदन्ति रुद्रः स एको देवो निरंजनः ॥ आद्या-शक्ति-युतो देवश्चणकाकार-रूपकः । आनन्द-घन-संयुक्तः प्रभुः प्रकृति-रूप-धृक् ॥ निर्गुणस्यालयः साक्षान्महा-काल्यालयः प्रिये ! तत्रैव वर्तते नित्यश्चणकाकार-रूपकः ।' तस्य रूप-परं नित्यं परानन्द-परात्परं । नित्यानन्द-करा देवि ! कालिका दक्षिणे स्थिता ॥ आद्या-शक्तिर्महा-माया देव-निर्माण-कारिणी । जायते च क्षितौ वृक्षो यथा पृथ्व्यां प्रलीयते ॥ तोयात् तु बुद्बुदं जातं यथा तोये प्रलीयतें । जलदे तड़िदुत्पत्तिर्यथा मेघे प्रलीयमते ॥ तथा ब्रह्मादयो देवाः कालिकायां प्रजायते । प्रलय-काले तु पुनस्तस्यां प्रलीयते ॥ शक्ति-ज्ञानं विना देवि ! मुक्तिर्हास्याय कल्प्यते । एकांशेन भवेद् ब्रह्मा एकांशेन जनार्दनः ॥ एकांशेन भवेच्छम्भुः कालिकायाः सुलोचने ! अपरा सा महा-काली नद्यादीनां समुद्र-वत् ॥ गोष्पदे च यथा तोयं ब्रह्माद्या देवतास्तथा । गोष्पदे किं विजानीयात् समुद्रस्य जलं शिवे ॥ तेन ब्रह्मा न जानाति विष्णुः किं वेत्ति शङ्करः । सृष्टि-कर्त्या यदा काल्या पाल्यन्ते च सुरादयः ॥ तदा प्रलय-काले तु पुनस्तस्यां प्रलीयते । अतो निर्वाणदा काली पुरुषस्य च शर्मदा ॥ चणकाकार-रूपेण प्रकाशं च मनोमयं । यथा सूर्यो जगद् भाति ज्ञेयं च चणकं तथा ॥ [ १२६ ]
महा-निर्वाण तन्त्र के तीन अनूठे उद्धरण । १२७ एका शक्तिद्विधा भूत्वा मध्ये पुरुष-भाषितं । पुनः प्रलीन-कालेऽपि द्विधैकं पुंस-गोपितं ॥ नित्यानित्य-द्विधैकात्मा द्विधा भावाश्रिताः पुमान् । नित्यानित्यं यदैकात्मा तदैकं ब्रह्म-विग्रहं ॥ (२) 'सर्वोल्लास तन्त्र' के ५८वें उल्लास (हंस-बीज-माहात्म्यं) में— श्रीदेव्युवाच-- देवेश ! प्राण-नाथेश ! त्रिगुण ! त्रिगुणात्मक ! अधुना हंस-बीजस्य माहात्म्यं कथय प्रिय ॥ श्रीशिव उवाच— हंस-बीजस्य माहात्म्यं गदितुं नैव शक्यते । तव स्नेहेन बद्धोऽहं किञ्चिद्-भावं प्रकाशितं ॥ देवालयं भवेद् देहं हंसेन मनुना शिवे ! हंस-बीजं समाश्रित्य देही देहे सदा स्थितः ॥ हकारः शङ्करश्चैव सकारः शक्तिरीरितः । शिव-शक्त्यात्मकं मन्त्रमजपेति प्रकीर्त्तितं ॥ षट्-शतानि दिवा-रात्रौ सहस्राण्येक-विंशतिः । अजपा नाम गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥ श्रीपार्वत्युवाच— शिव-शक्त्यात्मकं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । प्रजपेत् केन मूलं च सोऽहं केन विचिन्तयेत् ॥ श्रीशिव उवाच— कुम्भकं स्याद् 'हं'-कारेण 'सः'-कारेणापि रेचनं । कुम्भकेऽपि जपेन्मन्त्रं प्रत्येके प्रत्येकाक्षरं ॥ (३) 'सर्वोल्लास तन्त्र' के ५६वें उल्लास (ध्यान-त्रयस्य माहात्म्यं) में— श्रीशिव उवाच— स्व-देहे पूजयेद् देवं नान्य-देहे कदाचन । स्व-गेहे पायसं त्यक्त्वा भिक्षामटति दुर्मतिः ॥ स्थूल-ध्यानान्महा-देवस्तेजो-ध्यानाद्वि शङ्करी । सूक्ष्म-ध्यानाद् भवेन्मुक्तिराङ्कारं तत्र संभवं ॥ भिन्न-देहं शिवं शक्ति तेजोध्यानमभेदकं । शिव-शक्त्यात्मकं सूक्ष्मं ॐ तत् सद् व्यापितं जगत् ॥ विन्दु-त्रयं नाद-युग्मं विन्दु-युग्मं च नादकं । विन्दुमेकं नाद-युग्मं ॐकारं ब्रह्म-बोधकं ॥ कुण्डलिन्यंकुशाकारा विन्दु-रूपः सदाशिवः । अङ्क-मात्रं महादेवि ! शिव-शक्ति-प्रबोधकं ॥ विन्दु-द्वयं विना देवि ! किञ्चिन्मात्रं न जायते । वामे च परमा शक्तिर्दक्षिणे परमः शिवः ॥ शिव-शक्त्यात्मकं ब्रह्मवाचातीतं सुनिर्मलं । तकारं शङ्करं ज्ञेयं तकारं पुंस्त्व-विग्रहं ॥ ब्रह्म-बोध-मयं देवि ! तत् शब्दं शक्ति-गोपितं । विन्दु-युग्मं नादमेकं तकारं ब्रह्म-बोधकं ॥ तत्-शब्दं परमेशानि ! ॐकारस्यापि बोधकं । बिना स्वरेण देवेशि ! व्यञ्जनं नैव तिष्ठति ॥
१२८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तद्-वर्णं सकलं बोधं भाव-रूपं प्रकाशितं । सकारः शङ्करी ज्ञेया तकारो नाद-रूपकः ॥ शक्ति-ब्रह्म-मयं ज्ञानं सत् शब्दं भाव-बोधकं । व्यञ्जनं पुरुषं ज्ञेयं स्वरं ज्ञेयं च शङ्करीं ॥ शिव-शक्त्यात्मकं ब्रह्म सत्-शब्देनापि भाषितं । सकारं च तकारं च पुरुषं परमेश्वरि ॥ शक्ति-ज्ञानं मध्य-लुप्तं अकारं शब्द-बोधकं । पञ्च-नादं सप्त-विन्दुमेकाङ्कं परमेश्वरि ॥ एतैर्युक्तं सकारं हि त्रि-वकारं प्रकाशितं । सत्वं रजस्तमश्चैव त्रि-वकारेण भाषितं ॥ पञ्च-नादं पञ्च-तत्त्वं विन्दु-स्वर्गं विभूषितं । त्रिगुणाक्तं त्रिकोणं च प्रति-कोणं त्रयान्वितं ॥ काण-मात्रे विन्दु-मात्रं मध्ये नादं महेश्वरि ! सर्व-वर्ण-क्रममिदमङ्कं ज्ञेयं शिवोपरि ॥ विन्दु-द्वयं विना भद्रे अङ्क-मात्रं न जायते । नाद-विन्द्वङ्क-युक्त-वर्णं ब्रह्म-ज्ञानस्य कारणं ॥ तत्-शब्दं ज्ञेयं सत्-शब्दं सर्व-भाव-प्रकाशितं । तत्-सत् ज्ञेयं ब्रह्म-वोजं ॐकारेऽभूत् प्रकाशितं ॥ ॐकाराद् जायते सर्वं ॐकारे च प्रतीयते । सृष्टि-वोजं हि ॐकारं लय-वोजं त्रिलोचने ॥ हंस-वीजात् समुद्भूतं भावं भावातीतं ध्रुवं । दक्षिणानां च वामानां सिद्धान्तानां महेश्वरि ॥ हंसः सोऽहं च नाहं च भेदाभेदात्मनात्मकं । कौलानां चैव दिव्यानां भावातीतं हि केवलं ॥ प्रथम उद्धरण में आद्या-शक्ति 'महा-काली' के विराट् स्वरूप का भव्य वर्णन किया गया है। द्वितीय उद्धरण में 'हंस-बीज' की महिमा बताई है कि 'हकार' शिव-स्वरूप है और 'सकार' शक्ति-स्वरूप । इस प्रकार यह 'शिव-शक्त्यात्मक बीज-मन्त्र' है, जिसे जीव निरन्तर श्वास-निश्वास के साथ 'अजपा-रूप' से जपता रहता है। तृतीय उद्धरण में १. स्थूल-ध्यान, २. तेजो-ध्यान ओर ३. सूक्ष्म-ध्यान—इन तोन प्रकार के ध्यानों का वर्णन करते हुए 'ॐतत् सत्' मन्त्र का अर्थ समझाया गया है।
वन्दे गुरोर्मण्डलम् हे शिवे! तुम साक्षात् परम ब्रह्म की परमा प्रकृति अर्थात् शक्ति हो। यह सारा जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है। हे भद्रे! महत् तत्त्व से परमाणु तक और स्थूल-सूक्ष्म सारा स्थावर- जङ्गम-स्वरूप जगत् तुम्हारे ही द्वारा उत्पन्न हुआ है। सारा जगत् तुम्हारे अधीन है। तुम सबकी आद्या अर्थात् आदि-भूता हो। सारी विद्याएँ और हम सब तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं। सारे जगत् के सभी विषयों को तुम जानती हो। तुम्हें कोई नहीं जान सकता। तुम काली हो, तुम तारिणी हो, तुम दुर्गा हो, तुम षोडशी हो, तुम भुवनेश्वरी हो, तुम धूमावती हो, तुम बगला हो, तुम भैरवी हो, तुम छिन्न- मस्ता हो। महा-निर्वाण तन्त्र प्रकाशक : परा-वाणी आध्यात्मिक शोध-संस्थान श्रीचण्डी-धाम, अलोपी-देवी मार्ग, प्रयाग-२११००६