भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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६८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र (४३) । चाचा और पिता की विमाता विद्यमान हों, तो धन पितामह-गामी होकर बाद में चाचा द्वारा चाची को ही मिलता है (४४) । पितामह, चाचा और भाई जीवित हों, तो अधस्तन पुरुष की प्रधानता होने से भाई ही धन का अधिकारी होगा (४५) । चाचा की अपेक्षा भाई और पितामह दोनों ही समान रूप से सन्निकृष्ट हैं, ऐसे स्थल पर मृत व्यक्ति का धन पितृधन होकर भाई को मिलेगा (४६) । मृत व्यक्ति के दौहित्र और पिता विद्यमान हों, तो दौहित्र ही धनाधिकारी होगा क्योंकि धन स्वभावतः अधोगामी होता है (४७) । हे कालिके ! स्वर्गीय व्यक्ति के पिता व माता विद्यमान हों, तो पुरुष की मुख्यता होने से पिता ही धनाधिकारी होगा (४८) । मृत व्यक्ति के मातुल के जीवित होने पर भी पितृ-संबंध की गुरुता होने से पितृ-सपिंड व्यक्ति ही धन पाएगा (४६) । हे शिवे ! धन यदि अधोगामी न हो सकेगा, तो वह ऊर्ध्वतन पुरुष को मिलेगा। पुरुष की प्रधानता होने से पहले धन पितृ-कुल को मिलेगा। इसी कारण से मातुल के सन्निकृष्ट होने से वह धनभागी नहीं है (५०) । हे पार्वति ! मृत-पितृक पौत्र पितामह के धन से पिता के प्राप्य अंश को पाएगा (५१) । पौत्री यदि भ्रातृ-हीना, पितृ-मातृ- विहीना और स्व-धर्मिणी है, तो पितामह के धन में पितृव्य के साथ बराबर भाग पाएगी (५२) । हे देवि ! पौत्रों को पितामही और पितृ-भगिनी यदि जीवित हों, तो पितृ-गत धन में पौत्री ही अधिकारिणी होगी अर्थात् धनी की कन्या, माता, बहन के बीच कन्या ही उत्तराधिकारिणी है (५३) । अधोगामी धन में अधस्तन पुरुष की ही प्रधानता है और ऊर्ध्वगामी धन में ऊर्ध्वतन पुरुष की (५४) । हे प्रिये ! इसी से पुत्र-वधू, पौत्री या कन्या के जीवित होने पर मृत व्यक्ति का धन उसके पिता नहीं ले सकते (५५) । यदि मृत व्यक्ति के पितृ-कुल में कोई उत्तराधिकारी नहीं है, तो पूर्वोक्त विधि के अनुसार वह धन मातामह-कुल को मिलेगा (५६) । मातामह-कुल को प्राप्त धन मामा, मामा के पुत्र आदि के द्वारा पहले अधस्तन, उसके अभाव में ऊर्ध्वतन एवं पुरुष को और उसके अभाव में नारी को मिलेगा (५७) । ब्राह्म विवाह से विवाहिता पत्नी की सन्तान के होने पर और पितृ-सपिण्ड के रहने पर शैव विवाह से विवाहिता स्त्री की सन्तान मृत व्यक्ति के धन को नहीं पाएगी (५८) । हे भद्रे ! शैव विवाह से विवाहिता पत्नी और उसके पुत्र धनाधिकारी से मृत व्यक्ति की सम्पत्ति के अनुसार भोजन-वस्त्र पा सकेंगे (५६) । हे प्रिये ! शैव विवाह से विवाहिता पत्नी का पालन शैव पति ही करता है, यदि वह व्यभिचारिणी न हो। यह शैवी पत्नी पिता-माता आदि के धन की अधिकारिणी नहीं है (६०) । पिता क्रोध या लोभ से सत्कुलोत्पन्ना कन्या को यदि शैव विवाह में देता है, तो वह लोक-समाज में निन्दित होता है (६१) । शैवी पत्नी और उसका वंश न होने पर शिव-शासन से क्रमशः अर्थात् पूर्व-पूर्वाभाव में समानोदक, आचार्य और राजा मृत व्यक्ति के धन को पाएँगे (६२) । हे प्रिये ! पिण्ड-दाता से सातवें पुरुष तक 'सपिण्ड' और आठवें से दसवें पुरुष तक 'समानोदक' कहलाते हैं। फिर केवल 'गोत्रज' कहलाते हैं (६३) । जो धन एक बार बाँटकर बाद में स्वेच्छा से मिश्रित कर लिया गया हो, उसे बिना बँटा मानकर पुनः बाँटा जायगा (६४) । बँटे हुए या न बँटे हुए धन में जिसका जितना अंश निर्दिष्ट है, उस व्यक्ति के मरने पर उसके उत्तराधिकारी उसी के अनुसार अंश प्राप्त करेंगे (६५) । जो जिसके धन का अधिकारी है, वह उसे अपने जीवन भर पिण्डदान करेगा, शैव पत्नी के पुत्र को छोड़कर (६६) । इस लोक में जन्म-संबंध के कारण जिस प्रकार 'अशौच' विहित है, उसी प्रकार उत्तराधिकारी को भी तीन रात्रि का अशौच विहित है (६७) । पूर्णाशौच या खंडाशौच निर्दिष्ट अशौच-काल के बीच में सुनने पर अशौच-काल के जो कुछ दिन शेष हों, द्विजादि आदि सभी वर्ण उन्हीं कुछ दिनों में शुद्ध होंगे (६८) । अशौच-काल के बीत जाने पर खंडाशौच सुनने पर अशौच नहीं होता किन्तु पूर्णाशौच सुनने पर तीन दिन का अशौच होगा, यदि एक वर्ष से अधिक न हो गया हो (६६) । एक वर्ष