महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन । ३६७ का अधिकारी होगा (१९)। पुत्र-हीन मृत व्यक्ति के पिता के भाई और पितामह यदि विद्यमान हैं, तो जन्म के अनुसार निकटता होने के कारण पिता ही उसके धन के अधिकारी होंगे (२०)। हे प्रिये ! कन्या के अति सन्नि- कृष्ट होने पर भी मृत व्यक्ति की कन्या यदि विद्यमान है, तो पौत्र धन का अधिकारी होगा क्योंकि स्त्री की अपेक्षा पुरुष ही मुख्य है (२१)। मृत पुत्र को सोपान मानकर धन पितामह से पौत्र को जाता है। संसार में प्रसिद्ध है कि स्वयं पिता ही पुत्र-स्वरूप होता है (२२)। विवाह-सम्बन्ध में ब्राह्म-विधि से विवाहिता पत्नी ही श्रेष्ठ है। पति की अर्द्धाङ्ग-स्वरूपा वह ब्राह्मी पत्नी ही पुत्र-हीन पति के धन की अधिकारिणी होती है (२३)। पति-पुत्र-हीना नारी पति के धन को पाकर भी उसे दान या विक्रय नहीं कर सकती, केवल स्त्री-धन को ही वह दान या विक्रय कर सकती है (२४)। पितृ-कुल या श्वसुर-कुल से दिया गया या अपने द्वारा कमाया धन 'स्त्री-धन' कहा गया है (२५)। उक्त नारी की मृत्यु होने पर पति के प्राप्त धन की स्थिति पूर्ववत् हो जायगी अर्थात् पति के निकटवर्ती व्यक्ति को वह धन मिलेगा (२६)। स्वामी की मृत्यु होने पर स्त्री स्व-धर्म के अनुसार पति के बन्धुओं के अधीन या उनके अभाव में पिता के बन्धुओं के अधीन रहकर धन की अधिकारिणी होगी (२७)। जिस स्त्री के प्रति व्यभिचार की शंका है, वह पति के धन को नहीं पाएगी; जो व्यक्ति उसके पति के धन का अधिकारी होगा, उससे वह जीविका मात्र पाएगी (२८)। हे शुचि-स्मिते ! यदि स्वर्गीय व्यक्ति के अनेक पत्नियां हैं, तो उन सबको पति का धन बराबर बाँटकर मिलेगा (२६)। स्वामी के धन की अधिकारिणी पत्नी की मृत्यु होने और पति की कन्या के विद्यमान होने पर वह धन पुनः पति का होकर दुहितृ-गामी होगा (३०)। इसी प्रकार कन्या के रहने पर पुत्र-वधू को मिला धन उसकी मृत्यु होने पर पुनः स्वामी को जाकर श्वसुर के अधीन होकर उस कन्या को मिलेगा (३१)। हे शिवे ! इसी प्रकार पितामह के विद्यमान होने पर यदि धन माता को मिला है, तो माता की मृत्यु होने पर वह धन माता के पति अर्थात् पितामह के पुत्र का धन होकर पितामह को मिलेगा (३२) मृत व्यक्ति का ऊर्ध्व- गत धन जैसे पिता को मिलता है, वैसे ही पति-हीना माता को भी मिलता है (३३)। जननी के रहते विमाता धन की अधिकारिणी नहीं होती। जननी की मृत्यु होने पर पुत्र का आश्रय कर पिता द्वारा विमाता भी धन- भागिनी होती है (३४)। अधस्तन अधिकारी का अभाव हो, तो धन अधोगामी नहीं होता, परन्तु वही धन जिस क्रम से वैसा होता, उसी क्रम से वह ऊर्ध्वगामी होगा (३५)। अतः चाचा के रहने पर बहन को मिला धन भी कन्या-पुत्र-हीना उस बहन की मृत्यु होने पर, बहन के पति के रहने पर भी, लौट कर चाचा को ही मिलेगा (३६)। धन ऊर्ध्व से अधोगामी होकर पहले पुरुष को मिलता है। अतः सहोदरा बहन के रहने पर भी सौतेला भाई धन का अधिकारी होता है (३७)। सहोदरा बहन और सौतेले भाई की सन्तान के रहने पर सौतेले भाई को प्राप्त धन को सौतेले भाई की सन्तान ही पाएगी (३८)। हे शिवे ! मृत व्यक्ति के धन को सहोदर और सौतेले भाई दोनों बराबर बाँट लें क्योंकि यह धन मृत व्यक्ति के पितृ-धन के समक्ष है (३६)। कन्या जीवित है, तो उसका पुत्र धनाधिकारी नहीं होगा। जहाँ जो धनाधिकार का बाधक है, वहाँ उसकी मृत्यु के बाद दूसरे का धन मिलेगा। यहाँ कन्या दौहित्र के धनाधिकार में बाधक है, अतः कन्या की मृत्यु के बाद दौहित्र को अधिकार मिलेगा (४०)। अविवाहिता बहन का विवाह सामान्य पैतृक धन से करने पर पुत्र न होने पर कन्या के पितृ-धन को बाँटकर ले (४१) सन्तति-हीना मृत स्त्री का स्त्री-धन स्वामी को मिलता है। स्त्री-धन से भिन्न अन्य धन जिसे उत्तराधिकार-सूत्र से प्राप्य है, उसी को मिलेगा (४२)। उत्तराधिकार के संबंध से जो सम्पत्ति नारी को मिलती है, उससे वह अपना भरण-पोषण और पुण्य कर्म कर सकती है किन्तु उसे दान या विक्रय नहीं कर सकती १३