भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 139 में से

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६६ । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जन को देखकर खड़ा नहीं होता, वह एक दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१६८) । अच्छी तरह से स्पष्ट अर्थ- वाले इस शिव-प्रणीत शास्त्र का जो लोग कूट अर्थ करेंगे, वे पतित होकर अधोगति को प्राप्त करेंगे (१६६) । हे देवि ! तुमसे जो कहा है, वह सार का भी सार है और उत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट धर्म है, पवित्र करनेवाला है, कल्याणकारी है और इह-लोक तथा परलोक में परमार्थ देनेवाला है (१७०) । बारह्वाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन श्री सदाशिव ने कहा—हे आद्ये ! मैं तुम्हें पुनः सनातन व्यवहार बताता हूँ । इस व्यवहार की रक्षा करने से राजा स्वच्छन्द होकर प्रजा का पालन कर सकता है (१) । राजा के नियम को न मानने से मनुष्य धन-लोलुप होकर गुरुजनों, स्वजनों और बन्धु-बान्धवों के साथ झगड़ा करने लगेंगे (२) । हे देवि ! धन के लिए एक दूसरे पर चोट करेंगे और हिंसा, धन चुराने की इच्छा के कारण पापी होंगे (३) । अतः मनुष्य के कल्याण के लिये मैं धर्म-सम्मत राज-नियम बनाता हूँ। इन नियमों के मानने से मनुष्यों का कभी अमंगल न होगा (४) । राजा पापों के निवारण के लिए जिस प्रकार पापियों के दण्ड का विधान करे, उसी प्रकार मनुष्यों के सम्बन्ध-भेद के अनुसार दाय (संपत्ति) का भी विभाजन करे (५) । विवाह और जन्म के भेद से संबंध दो प्रकार के होते हैं, जिनमें से जन्माधीन संबंध अत्यन्त बली होता है (६) । हे शिवे ! धन के अधिकार के विषय में ऊर्ध्व- तन संबंध की अपेक्षा अधस्तन संबंध श्रेष्ठ है । इसी प्रकार अधः-ऊर्ध्व-क्रम से स्त्री-जाति की अपेक्षा पुरुष-जाति ही श्रेष्ठ है (७) । इनके बीच अधिकतर निकट संबंध के क्रम से दाय (संपत्ति) का अधिकारी होता है । पण्डित लोग इसी विधि के अनुसार यथा-क्रम धन का विभाग करते हैं (८) । मृत व्यक्ति के यदि पुत्र, पौत्र, कन्या, पिता और पत्नी आदि जीवित हैं, तो पुत्र ही धन का अधिकारी होगा, अन्य कोई नहीं (६) । जहाँ सन्तान बहुत हैं, वहाँ सभी पुत्र समान अंश प्राप्त करेंगे, किन्तु वंशानुक्रम से 'ज्येष्ठ पुत्र' ही राज्याधिकारी होगा (१०) । यदि पैतृक ऋण है, तो पैतृक धन में से ही उसे चुकाना होगा क्योंकि ऋण के रहते पैतृक धन का विभाग करना उचित नहीं है (११) । यदि ऋण के रहते पुत्रों में पैतृक धन बँट गया हो, तो राजा उनसे वह धन लेकर पैतृक ऋण को चुकाये (१२) जिस प्रकार पाप करने से अपने को ही नरक में जाना होता है, उसी प्रकार अपने ऋण से अपने को ही बँधना पड़ता है, दूसरा कोई नहीं बँधता (१३) । स्थावर या अस्थावर जो कुछ सामान्य धन हो, उसमें से अधिकारियों को उनके विभाग के अनुसार अपना-अपना अंश मिलता है (१४) । अधिकारियों में सहमति होने से विभाजन सिद्ध होता है, यदि उनमें सहमति न हो, तो राजा पक्षपात-हीन दृष्टि से अंश बाँट दे (१५) । जिस स्थावर या अस्थावर को बाँटा न जा सके, राजा उसका मूल्य या उप-स्वामित्व अधिकारियों में विभाजित कर दे (१६) । धन के बँट जाने पर भी यदि कोई व्यक्ति किसी धन में अपना अंश प्रमाणित करे, तो राजा उस धन को पुनः बाँट कर अंश न पानेवाले व्यक्ति को उसका भाग दिला दे (१७) । हे शिवे ! सभी अधिकारियों की संमति से धन बँट जाने के बाद उस विभाजन के संबंध में विवाद करनेवाला व्यक्ति राजा द्वारा दण्डनीय होगा (१८) । मृत व्यक्ति के पौत्र, पत्नी और पिता यदि विद्यमान हैं, तो पौत्र ही अधस्तनत्व-रूप से गौरव पाकर धन

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