भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६५ गायत्री का जप करे (१४४)। माता, पिता और ब्रह्म-दाता—ये महा-गुरु हैं। जो इनकी निन्दा करता है या इन्हें कठोर बात कहता है, वह पाँच दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१४५)। जो इसी प्रकार किसी अन्य गुरु, कौल या ब्राह्मण की निन्दा करता है या कटु बात करता है, वह ढाई दिन के उपवास से पाप-मुक्त होता है (१४६)। धनार्थी मनुष्य सभी देशों में जा सकते हैं किन्तु जिस देश या शास्त्र में कौलाचार निषिद्ध हो, उस देश और शास्त्र को छोड़ दे (१४७)। जिस देश में कौलाचार निषिद्ध है, उसमें इच्छानुसार जाने से कुल-धर्म से गिरना पड़ता है और तब पुनः पूर्णाभिषेक द्वारा ही वह शुद्ध हो पाता है (१४८)। सूर्योदय से आठ पहर तक निराहार रहना ही 'उपवास' है। प्रायश्चित्त में यही विहित है (१४६)। प्राण-धारण के लिए एक अञ्जलि जल पीने या हवा खाने से 'उपवास' से भ्रष्ट नहीं होता (१५०)। वृद्धावस्था या शारीरिक पीड़ा से 'उपवास' में असमर्थ हो, तो प्रत्येक 'उपवास' के अनुकल्प में बारह ब्राह्मणों को भोजन कराए (१५१)। दूसरे की निन्दा, अपनी प्रशंसा या दुःखदायी अनुचित बात कहने या अवैध कार्य करने पर केवल परिताप से शुद्धि होती है (१५२)। इनके सिवा जान या अनजान में किए सभी पाप गायत्री देवी की उपासना और कौल भोजन द्वारा नष्ट होते हैं (१५३)। पुरुषों के लिए जो साधारण नियम विहित हैं, वही स्त्रियों और नपुंसक लोगों के प्रति भी प्रयोग करे किन्तु स्त्रियों के सम्बन्ध में यह विशेष बात है कि उनके पति ही महा-गुरु हैं (१५४)। महा-व्याधि से ग्रस्त चिर- रोगी लोग स्वर्ण-दान से पवित्र होकर देव और पितृ-कर्म में अधिकारी होते हैं (१५५)। अपमृत्यु या विद्युदग्नि से दूषित घर को 'भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा, स्वः स्वाहा'—इन शत-संख्यक व्याहृतियों द्वारा होम कर शुद्ध करे (१५६)। बावली, कुएँ, तालाब आदि में अस्थि-युक्त शव दिखने पर उस शव को बाहर निकालकर उन्हें शुद्ध करे (१५७)। उनके शोधन की विधि यह है कि इक्कीस घड़े विशुद्ध जल को पूर्णाभिषेक-मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर उस जल को उक्त बावली आदि में छोड़ दे (१५८)। यदि उक्त बावली आदि में जल थोड़ा ही हो और वह शव की दुर्गन्ध से दूषित हो गया हो, तो कीचड़ सहित वह सारा जल बाहर करने के बाद उक्त विधि से मन्त्रित जल उसमें छोड़े (१५६)। उक्त जलाशय में यदि हाथी बराबर बहुत जल हो, तो एक सौ घड़े जल उससे बाहर निकालकर पूर्वोक्त अभिषेक मन्त्रों से पवित्र इक्कीस घड़े जल को उसमें छोड़कर उसे शुद्ध करें (१६०)। शव से छुआ जलाशय यदि इस विधि से शोधित न हो, तो उसका जल न पिए और वैसे जलाशय की प्रतिष्ठा भी न करे (१६१)। उसके जल में स्नान या उसके द्वारा किया गया कोई भी कर्म वृथा होता है। यदि स्नान या कोई कर्म कर ले, तो एक दिन निराहार रहकर पञ्चामृत पीने से शुद्धि होती है (१६२)। जो धनी होकर याचना करता है, वीर होकर युद्ध से मुख मोड़ता है, जो कुल-धर्म को दोष लगाता है, जो कुल-स्त्री होकर सुरा-पान करती है, जो मित्र से द्रोह करता है, जो पण्डित होकर स्वयं पापाचार करता है—ऐसे पापी व्यक्ति को जो देख ले, वह सूर्य का दर्शन कर विष्णु का स्मरण करे और पहने हुए वस्त्रों सहित स्नान करे, तो उन्हें देखने से हुए पाप से मुक्त होगा (१६३-६४)। जो द्विजाति होकर गधे, मुर्गे या सुअर का बेचता है या किसी अन्य नीच कर्म को करता है, वह तीन दिन के व्रतानुष्ठान से शुद्ध होता है (१६५)। हे अम्बिके ! तीन दिन व्रत की विधि यह है कि एक दिन निराहार, एक दिन कण-भोजन और एक दिन जल-पान करे (१६६)। बन्द द्वार वाले घर में यदि कोई बिना बुलाए प्रवेश करता है या जो बात बताने से मना की गई है, उसे कोई कह दे, तो पाँच दिन आहार छोड़ना पड़ता है (१६७)। जो अहंकार-युक्त होकर आनेवाले गुरु-