महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र से हीन हो, राजा उसका धन छीनकर उसे दण्डित करे (११६) । हे कुलेश्वरि ! सौ बार अभिषिक्त कौल यदि अति-पान करे, तो उसे कुल-धर्म-बहिष्कृत और पशु ही माना जाता है (१२०) । 'मद्य' शोधित हो या अशोधित, जो व्यक्ति उसे अति पान करता है, वह कौल-गण द्वारा त्याज्य और राजा द्वारा दण्डनीय है (१२१) । यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य मत्त होकर ब्राह्म-धर्म की विधि के अनुसार परिणीता पत्नी को 'मद्य'-पान कराए, तो उस भार्या के सहित पाँच दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होतो है (१२२)। असंस्कृत 'सुरा' पीनेवाला तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है। यदि कोई व्यक्ति अशोधित 'मांस' खाता है, तो उसे दो दिन उपवास करना होगा (१२३) । यदि कोई व्यक्ति असंस्कृत 'मत्स्य' और 'मुद्रा' खाता है, तो उसे एक दिन उपवास करना चाहिए। यदि कोई विधि का उल्लंघन कर पञ्चम तत्त्व की सेवा करे, तो वह व्यक्ति राज-दण्ड द्वारा शुद्ध होता है (१२४) । हे शिवे ! यदि कोई व्यक्ति जानकर मनुष्य या गाय का मांस खाता है, तो वह एक पक्ष उपवास द्वारा शुद्ध होता है, यही उसका प्रायश्चित्त है (१२५) । जो मनुष्याकृति वाले पशु या मांस खानेवाले जीव का मांस खाता है, वह तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१२६) । जो म्लेच्छ, यवन, चाण्डाल या कुलाचार-विरोधी पशु का अन्न खाता है, उसको शुद्धि एक पक्ष के उपवास से होती है (१२७) । हे कुलेश्वरि ! जो अनजान में पूर्वोक्त व्यक्तियों का जूठा खा लेता है, वह एक पक्ष के उपवास से और जो जानकर खाता है, वह एक मास के उपवास से शुद्ध होता है (१२८) । जो व्यक्ति एक बार अनुलोम जाति अर्थात् क्रमशः नीच जाति का अन्न खाता है—यथा ब्राह्मण क्षत्रिय का अन्न खाए, क्षत्रिय वैश्य का अन्न खाए इत्यादि तो वह तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१२६) । यदि पशु, चाण्डाल या म्लेच्छ का अन्न 'चक्र' में अर्पित हो या 'वीर' व्यक्ति के हाथ द्वारा दिया जाय, तो उसे खाने में कोई पाप-भागी नहीं होता (१३०) । अन्नाभाव, दुर्भिक्ष, विपत्-काल या प्राण-संकट के समय निषिद्ध भोजन करके प्राण-रक्षा करनेवाला पाप-भागी नहीं होता (१३१) । हाथी की पीठ पर, अनेक लोगों द्वारा वहनीय प्रस्तर या काष्ठासन पर और दूषित पदार्थ का यदि लक्ष्य न हो तो भक्ष्य- दोष नहीं होता (१३२) । हे प्रिये ! जिन पशुओं का मांस अभक्ष्य है, जो पशु रोगी हैं, उन्हें देवता के लिए न मारे, मारने से पाप होता है (१३३) । जानकर गो-हत्या हो, तो 'कृच्छ्र-व्रत' करे। अनजान में गो-हत्या हो जाय, तो आधा 'कृच्छ्र-व्रत' करे (१३४) । जब तक इस व्रत को न कर ले, तब तक क्षौर-कर्म, नाखून काटना, वस्त्र धोना आदि न करे (१३५) । एक मास उपवास में बिताकर, एक मास कण खाकर व एक मास भिक्षान्न खाकर बिताना ही 'कृच्छ्र-व्रत' है (१३६) । व्रत पूरा होने पर कौलों को जातिवालों को और बन्धु-बान्धवों को भोजन कराने से जान कर की गई गो-हत्या के पाप से मुक्ति मिलती है (१३७) । हे शिवे ! ठीक से पालन न करने से हुई गो-हत्या का पाप आठ दिन के उपवास से दूर होता है किन्तु क्षत्रिय छः दिन, वैश्य चार दिन, शूद्र दो दिन, उपवास कर इस पाप से छूट जाता है (१३८) । इच्छा करके हाथी, ऊँट, भैंसे और घोड़े की हत्या करनेवाला पापी मनुष्य तीन दिन के उप- वास से शुद्ध होता है (१३६) । हिरण, भेंड़, बकरे और बिल्ली की हत्या करने पर एक दिन का उपवास करे । मोर, तोते या हंस की हत्या करने पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास करे (१४०) । अस्थि-युक्त जीव की हत्या करने पर एक रात्रि निरामिष भोजन करे। अस्थि-हीन जीव की हत्या करने पर दुःख करने से ही शुद्धि होती है (१४१) । हे देवि ! शिकार करते समय पशु, मछली या अण्डज जीव की हत्या करने से राजा पापी नहीं होता क्योंकि यह उसका नित्य-धर्म है (१४२) हे भद्रे ! देवता के लिए जो कर्म हैं, उन्हें छोड़कर अन्य सभी कर्मों में हिंसा वर्जित है। वैध हिंसा करने से मनुष्य पाप से लिप्त नहीं होता है (१४३) । सङ्कल्पित व्रत पूरा न कर सके, देव-निर्माल्य को लांघ जाय, अशौच-काल में देव-प्रतिमा को छू ले, तो