महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६३ की बात प्रमाण होती है। मूक (गंगे) और हकलानेवाले का सिर हिलाना स्वीकृति तथा प्रमाण के लिए उनकी लिपि ग्रहण करे (६४) सभी स्थानों में सभी के लिए लिपि ही प्रशस्त प्रमाण है, विशेष कर व्यवहार के स्थान में क्योंकि बहुत समय तक यह नष्ट नहीं होती (६५)। जो व्यक्ति अपने लिए या दूसरे के लिए जाली लिपि करते हैं, उन्हें कूट-साक्षी का दण्ड दूना करके दे (६६) । भ्रम और प्रमाद-रहित व्यक्ति अपने विषय में मात्र एक बार स्वीकार करे, तो बहु साक्षियों के होने पर भी, प्रमाण है (६७)। हे पार्वति ! जिस प्रकार सत्य का आश्रय लेकर सभी पुण्य रहते हैं, उसी प्रकार एकमात्र मिथ्या का आश्रय लेकर सभी पाप रहते हैं (६८) । अतः जो व्यक्ति सत्य-हीन है, वह सब पापों का आश्रय है। ऐसे पापात्मा का ताड़न और दमन करने से राजा पाप का भागी नहीं होता (६६) । 'मैं जो कहूँगा, वह सत्य है,' इस प्रकार संकल्प कर कौल गुरु, ब्राह्मण, गङ्गा-जल, देव-मूर्ति, कुल-शास्त्र, कुलामृत, देव-निर्माल्य—इन सबको स्पर्श कर जो कहा जाता है, उसका नाम 'शपथ' है। यह 'शपथ' लेकर जो मिथ्या बोलता है, वह एक कल्प तक नरक में रहता है (१००-१०१)। जो कार्य पाप-जनक नहीं है, उसका त्याग या ग्रहण, जो 'शपथ' के साथ स्वीकृत हो, वह अवश्य कर्तव्य है (१०२)। स्वीकृत बात का जानकर उल्लंघन करने से एक पक्ष निराहार द्वारा शुद्धि होती है। भ्रम-वश उल्लंघन हो, तो बारह दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होती है (१०३) यदि कुल-धर्म का पालन सत्य विधि से न करे, तो वह मोक्ष और मंगल-दायक नहीं होता, उस कौल-व्यक्ति के लिए केवल पाप-जनक ही होता है (१०४) । 'सुरा' द्रव-मयी तारा है अर्थात् द्रव-पदार्थ के रूप में परिणता 'तारा' है। अतः जीवों के लिए मोक्षदा, भोग और मुक्ति की कारण तथा रोग व विपत्ति की नाशिनी है (१०५) । हे प्रिये ! 'सुरा' सभी पापों को भस्म करती है; 'सुरा' द्वारा जगत् पवित्र है, 'सुरा' सब प्रकार की सिद्धि देती है और 'सुरा' ज्ञान, बुद्धि व विद्या को बढ़ाती है (१०६)। हे आद्ये ! मुक्त, मुमुक्षु, सिद्ध गण, साधक-जन, राजा और देव लोग अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए इसी 'सुरा' का सदा सेवन करते हैं (१०७) । जो शास्त्र में निर्दिष्ट नियम का और सावधान- चित्त से 'सुरा' पान करते हैं, वे पृथिवी पर मर्त्य होकर भी अमर्त्य (अर्थात् देव-समान) होते हैं (१०८)। पञ्च- तत्त्वों में से प्रत्येक तत्त्व विधि-पूर्वक सेवन करने से मनुष्य शिव-स्वरूप होता है और पाँचों तत्त्वों का सेवन करने का क्या फल होता है, उसे मैं नहीं जानता अर्थात् ज्ञान से परे फल होता है (१०६) । यदि विधि को छोड़कर कोई इस वारुणी देवी का पान करता है, तो वह पान करनेवाले की बुद्धि, आयु, यश, धन-सब कुछ नष्ट कर देती है (११०)। जो प्रमत्त चित्त से अत्यधिक 'सुरा' सेवन करता है, उसका धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-साधक ज्ञान नष्ट हो जाता है (१११)। अति 'मद्य' पीनेवाला कार्याकार्य-विचार-हीन, विभ्रान्त-बुद्धि मनुष्य पग-पग पर अपना और दूसरे का अनिष्ट करता है (११२)। अतः 'मद्य' या मादक वस्तु में अत्यन्त आसक्त व्यक्तियों को राजा या चक्रेश्वर शारीरिक दण्ड या अर्थ-दण्ड द्वारा शुद्ध करे (११३) । 'सुरा' अधिक मात्रा में पी हो या थोड़ी ही मात्रा में, वह 'सुरा'-भेद से, व्यक्ति-भेद से, देश-भेद से और काल-भेद से बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है (११४) । अतः लड़खड़ाती वाणी, काँपते हाथों, डगमगाते पैरों और अस्थिर दृष्टि द्वारा अतिरिक्त पान का निर्णय करे क्योंकि 'सुरा' के परिमाण से अति-पान को नहीं जान सकते (११५) । राजा अवशेन्द्रिय, मद से व्याकुल चित्तवाले और देवता व गुरु की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले, भय-प्रद, सभी प्रकार के अनर्थ को तैयार, शिव-घाती पापी की जीभ जलवा दे, उसका धन छीन ले और उसे ताड़ना दे (११६-१७)। जिसके पैर, वचन और हाथ विचलित हों; जो भ्रमित, उन्मत्त, उद्धत हो, उस उग्र व्यक्ति को राजा दण्ड देकर उसका धन छीन ले (११८) । जो व्यक्ति मत्त होकर अश्लील वाक्य बोले, लज्जा और भय