महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र विधवा हो जाय, तो पिता उसका पुनर्विवाह करे। शैव धर्म में ऐसी ही विधि है (६७)। विवाह के बाद बारह पक्ष अर्थात् छः मास में या स्वामी की मृत्यु के एक वर्ष बाद जो स्त्री परिपुष्ट सन्तान को जन्म दे, वह उस स्वामी की पत्नी नहीं और वह पुत्र भी उसका पुत्र नहीं (६८) । गर्भाधान से पाँचवें महीने के बीच में जो स्त्री जानकर गर्भपात करे, उस स्त्री को और जो व्यक्ति उस गर्भपात का उपाय करे, उसको राजा तीव्र ताड़न द्वारा पीड़ित करे (६६)। पाँचवें मास के बाद जो स्त्री गर्भपात करे, उसे और जो व्यक्ति उसका उपाय करे, उसे हत्या-जन्य पाप होता है (७०) जो क्रूर-कर्मा मनुष्य जानकर नर-हत्या करे, उसे राजा अवश्य मृत्यु-दण्ड दे (७१)। प्रमाद या भ्रम-वश अनजान में मनुष्य-हत्या करनेवाले व्यक्ति को राजा अर्थ-दण्ड एवं कठिन ताड़ना द्वारा शुद्ध करे (७२)। जो स्वयं या अन्य द्वारा वध का उपाय करे, उस पापी को भी अज्ञानपूर्वक हत्या करनेवाले के समान ही दण्ड विहित है (७३)। हे परमेश्वरि ! परस्पर युद्ध करते समय एक को दूसरा मार डाले या आततायी मनुष्य को मारनेवाला पाप-भागी नहीं होता (७४) । पाप करने की इच्छावाला व्यक्ति अन्य का अङ्गच्छेद करे, तो राजा उसका भी अङ्गच्छेदन करे और अन्य पर प्रहार करे, तो उस पर भी प्रहार करे (७५)। जो पापी ब्राह्मण या गुरु के प्रति प्रहार के लिए डण्डा आदि उठाए, उसे राजा क्रमशः उसकी धन-सम्पत्ति जप्त करके या हस्त-दाहन द्वारा विशुद्ध करे (७६) । शस्त्र द्वारा घायल व्यक्ति की छः मास तक मृत्यु हो जाने पर प्रहार-कर्ता दण्डनीय होता है किन्तु मृत्यु-दण्ड का भागी नहीं होता (७७) । राज्य-विद्रोही, राज्य-हरण का इच्छुक, गुप्त रूप से राज-शत्रुओं का हित चाहनेवाला, राजा-सहित सैन्य का भेद लेनेवाला, राजा से युद्ध करने का इच्छुक, शस्त्र धारण कर प्रजा और पथिकों को पीड़ित करने- वाला—इन सबका विनाश करने से राजा पाप-भागी नहीं होता (७८-७६)। जो व्यक्ति स्वामी की अनिवार्य आज्ञा से नर-हत्या करता है, उसके स्थान पर स्वामी ही मृत्यु-दण्ड का भागी है—हत्या करनेवाला बध्य नहीं है (८०) । असावधान पुरुष के अस्त्र या पशु द्वारा किसी की मृत्यु होने पर अर्थ-दण्ड या शारीरिक दण्ड द्वारा उसकी शुद्धि होती है (८१)। राजा की आज्ञा न माननेवाला, राजा के सामने विवाद करनेवाला, कुल-धर्म की निन्दा करनेवाला—राजा इन सभी गर्हित व्यक्तियों को दण्डित करे (८२)। पथिकों का धन हरण करने- वाले, क्रूर, ठग, भेदिया और लोगों में झगड़ा बढ़ानेवाले दुष्टों को राजा देश से निकाल दे (८३)। जो शुल्क लेकर कन्या या पुत्र का दान करें या जो जानकर नपुंसक को कन्या दें, उन पापियों को राजा देश से निकाल दे (८४)। मिथ्यापवाद द्वारा अन्य का अनिष्ट करने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों को धर्मज्ञ राजा अपवाद के अनुरूप दण्डित करे (८५)। जो व्यक्ति जिस परिमाण में अनिष्ट करे, उतना ही उस पर अर्थदण्ड कर अनिष्ट- भागी व्यक्ति को राजा धन प्रदान करे (८६)। मणि-मुक्ता या सुवर्णादि धातु के मूल्य का विचार कर चोर के हाथ या दोनों बाहु कटवा दे (८७) । बलपूर्वक भैंस, घोड़ा, गाय आदि पशु, रत्नादि या शिशु-सन्तान के अप- हरण करनेवालों के लिए भी चोर के ही समान दण्ड विहित है (८८)। अन्न या कम मूल्य के द्रव्य के चोर को राजा एक पक्ष या सप्ताह कण-भोजन कराकर शोधित करे (८६) । हे सुर-पूजिते ! विश्वास-घातक या कृतघ्न की निवृत्ति यज्ञ, व्रत, तपस्या या दान आदि किसी प्रायश्चित्त द्वारा नहीं होती (६०)। जो लोग कूट-साक्षी हैं अर्थात् मध्यस्थ होकर जो पक्षपात करते हैं, राजा उन्हें तीव्र दण्ड द्वारा शासित करे और देश से बाहर निकाल दे (६१) । छः, चार या तीन लोगों को साक्षी का प्रमाण है। अभाव में एक व्यक्ति को साक्षी मान्य है, जो प्रसिद्ध और धार्मिक हो (६२)। हे प्रिये ! देश, काल और विषय-विशेष में जो परस्पर-विरुद्ध वाक्य बोलें, उन साक्षियों की बात अग्राह्य है (६३) । अन्धे और बहरे लोगों