महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन । ६१ ही दण्ड है (३६) । जो पापी प्रतिलोम अर्थात् उच्च-जातीय पर-स्त्री के साथ कुक्रिया करे, उसका सर्वस्व-हरण कर उसे तीन मास तक कण-भोजन का दण्ड दे (४०)। इस दुष्कर्म में इच्छा रखनेवाली सभी स्त्रियों के लिए भी ऐसा ही दण्ड है। यदि पत्नी पर अन्य बलात्कार करे, तो स्वामी उस पत्नी का त्याग करे किन्तु उसका पालन-पोषण उसे करना होगा (४१) ब्राह्मी या शैवी भार्या यदि इच्छा या अनिच्छा से एक बार पर-पुरुष-गता हो, तो उसका त्याग सर्वथा उचित है (४२)। हे देवेशि ! वाराङ्गना (वेश्या) या गो आदि पशु-योनि से गमन करनेवाले की शुद्धि तीन रात्रि कण-भोजन से होती है (४३) । जो पापी स्त्रियों के गुह्य में गमन करते हैं, उन्हें राजा मृत्यु-दण्ड दे (४४)। यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से चाण्डाल-कन्या भी गमन करे, तो उसे मृत्यु-दण्ड दे (४५)। जो कन्याएँ ब्राह्म या शैव विवाह द्वारा परिणीता हैं, वे ही भार्यायें हैं। उनसे भिन्न स्त्रियाँ पर-स्त्रियाँ हैं (४६)। जो व्यक्ति सकाम होकर पर-स्त्री का दर्शन करे, वह एक दिन उपवास कर शुद्ध होता है। जो व्यक्ति सकाम होकर पर-स्त्री से एकान्त में बातें करता है, वह दो दिन उपवास करके और जो पर-स्त्री को छूता है, वह चार दिन उपवास करके तथा जो पर-स्त्री का आलिङ्गन करता है, वह आठ दिन उपवास कर शुद्ध हो सकता है (४७) । जो कुलाङ्गना सकामा होकर पर-पुरुष के साथ यह सब करती है, वह भी उक्त अनुसार अपने को शुद्ध कर सकती है (४८) । स्त्रियों को कुत्सित बात कहने, उनके गुप्त स्थान को देखने, उन्हें देखकर हँसने पर दो दिन के उपवास द्वारा शुद्धि होती है (४६) । जो व्यक्ति अपने को नङ्गा दिखाता है और जो दूसरे को नंगा करता है, वह तीन रात्रि तक आहार छोड़ने से शुद्ध होता है (५०) । यदि पति अपनी पत्नी के पर-पुरुष- संसर्ग को प्रमाणित कर दे, तो राजा उस व्यभिचारिणी स्त्री और उसके उप-पति को शास्त्रानुसार दण्ड दे (५१)। यदि स्वामी पत्नी के उप-पति-संसर्ग को प्रमाणित करने में असमर्थ हो, तो उस स्त्री का परित्याग कर उसका भरण-पोषण करता रहे, यदि वह स्त्री पति के आदेश में रहे (५२)। स्वामी पत्नी को उप-पति से रत देखकर यदि तुरन्त स्त्री-सहित उपपति को मार डाले, तो राजा उसे कोई दण्ड न दे (५३) । जहाँ जाने या जिससे बात करने को पति ने मना किया है, वहाँ यदि कुल-स्त्री जाती है या बात करती है, तो वह पति द्वारा त्याज्या है (५४) । स्वामी की मृत्यु होने पर पति के बन्धुओं के पास या उनके अभाव में पितृ-कुल के अधीन रह कर अपने धर्म का पालन करनेवाली स्त्री पति की सारी सम्पत्ति पाती है (५५)। विधवा दो बार भोजन, परान्न-भोजन, मैथुन, आमिष-भोजन, भूषण, पलंग पर सोना, रक्त वस्त्र पहनना छोड़ दे (५६) । वैधव्य धर्म स्वीकार कर सुगन्धि-द्रव्य शरीर में न लगाए, ग्राम्य आलाप छोड़ दे, सदा देव-पूजा में लगी रहकर समय बिताए (५७) । जिस बालक के पिता, माता या पितामह नहीं हैं, उसके पालन के लिए मातृ-कुल के मातृ-बन्धु प्रशस्त हैं (५८) । नानी, नाना, मामा, ममेरे भाई और नाना के भाई—ये सब मातृ-बन्धु हैं (५६) । आजी, बाबा, चाचा, चचेरे भाई, बाबा के भाई—ये सब पितृ-बन्धु हैं (६०) । सास, ससुर, देवर, देवर-पुत्र, पति की बहन के पुत्र, ससुर के भाई—ये सब पति-बान्धव हैं (६१) । पिता, माता, बाबा, आजी, पत्नी, पुत्र-हीन नाना- नानी—इन सबके दरिद्र होने पर राजा यथा-शक्ति इन्हें अन्न-वस्त्र प्रदान करे (६२-६३) । अपनी पत्नी को दुर्वाक्य कहने पर एक दिन, पत्नी को पीटने पर तीन रात्रि और पीटने से यदि पत्नी का खून गिरे तो सात रात्रि तक भोजन का त्याग करे (६४) । क्रोध या मोह-वश भार्या को माता, बहन या बेटी कहे, तो सात रात्रि उपवास करने से शुद्धि होती है (६५) । कन्या का विवाह नपुंसक से हो और बहुत समय बीतने पर भी यह बात मालूम हो तो राजा उस कन्या का पुनः विवाह कराए, यही शिवोक्त विधि है (६६) । यदि कन्या विवाहिता होकर पति के सहवास के पूर्व