महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें६० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र देना—ये दोनों बातें ही मनुष्य के दुःख और रोगादि देनेवाले पाप को उत्पन्न करती हैं (१४)। हे कुल-नायिके ! यह पाप दो प्रकार का है—१. केवल अपना अनिष्ट करनेवाला, जैसे सन्ध्यादि दैनिक कर्म न करने से और २. दूसरों का भी अनिष्ट करनेवाला, जैसे ब्रह्म-हत्यादि से (१५) । राज-दण्ड द्वारा दूसरों का अनिष्ट-दायक पाप से मुक्ति पा सकते हैं। प्रायश्चित्त और समाधि द्वारा अन्य प्रकार के पाप से मुक्ति मिलती है (१६) । जो पापी प्रायश्चित्त या राज-दण्ड से पवित्र नहीं होते, वे इस लोक में निन्दित होकर परलोक में नरक से छुटकारा नहीं पाते अर्थात् चिर काल तक नरक में रहते हैं (१७) । हे आद्ये ! पहले राज-शासन का निर्णय बताता हूँ। हे महेश्वरि ! इस शासन के न करने से राजा अधम गति को पाता है (१८) । शासन में राजा भृत्य, पुत्र, प्रिय या अप्रिय—सभी को समान दृष्टि से देखे (१६) । यदि राजा स्वयं पापाचार करता है, तो वह उपवास और दान द्वारा अपने को शुद्ध करे। यदि निर्दोष व्यक्तियों को वह दण्ड दे जाय, तो दान द्वारा उन सभी निर्दोषियों को सन्तुष्ट कर उपवास द्वारा शुद्ध हो (२०) । राजा यदि ऐसा पाप करे, जिसके लिए वह मृत्यु-दण्ड का पात्र बनता हो, तो वह राज्य को छोड़कर वन में जाए और तपस्या द्वारा अपना उद्धार करे (२१) । राजा बड़े पाप के लिए छोटा और छोटे पाप के लिए बड़ा दण्ड न दे (२२) । जिसे बहु-संख्यक् कुमार्गी व्यक्तियों पर शासन करना पड़े, उसे पाप से न डरनेवाले व्यक्ति के छोटे अपराध के लिए बड़ा दण्ड देना भी उचित है (२३) । केवल एक बार अपराध के लिए लज्जा युक्त, प्रतिष्ठित एवं पाप से डरनेवाले व्यक्ति के बड़े पाप के लिए छोटा ही दण्ड देना उचित है (२४) । यदि बहु-मान्य कौल व्यक्ति छोटे अपराध का अपराधी हो या उसी प्रकार का ब्राह्मण व्यक्ति छोटा पाप करे, तो राजा उन्हें वाग्- दण्ड दे (२५) । जो राजा मन्त्रियों के साथ विचार कर न्याय-दण्ड और पुरस्कार का निर्णय नहीं करता, वह महा-पापी होता है (२६) । पुत्र पिता-माता का त्याग न करे, प्रजा राजा का त्याग न करे और विनय-सम्पन्ना पत्नी पति का त्याग न करे; वे अति पापी हों, तभी त्याज्य हैं (२७) । प्रजा के लोग धार्मिक राजा के राज्य, धन और जीवन की यत्न से रक्षा करें अन्यथा उन्हें अधोगति मिलती है (२८ । हे शिवे ! जो जान-बूझकर माता, बहन, पुत्री गमन करते हैं या जान कर बहुत बड़ी हत्या करते हैं या कुल-धर्म का आश्रय लेकर पुनः कुल-कर्मों का अनुष्ठान छोड़ देते हैं और विश्वास-घाती हैं, वे अति-पापी हैं (२६-३०) । माता, बहिन या पुत्री गमन करनेवाले के लिए मृत्यु-दण्ड विहित है; इस कार्य में इच्छा रखनेवाले माता, बहिन या पुत्री के लिए भी यही दण्ड है (३१) । विमाता, बुआ, बहू, सास, गुरु-पत्नी, पितामही, नानी, चाचा की पुत्री, ममेरी बहन, चाची, मामी, भाभी, भतीजी, भांजे की पत्नी, स्वामी की पत्नी, स्वामी की पुत्री या कुमारी गमन करनेवाले पापियों के लिए लिङ्गच्छेद का दण्ड विहित है। इस दुष्कार्य में इच्छा रखनेवाली इन सभी स्त्रियों के पाप-मोचन के लिए नासिका-छेदन और घर से निष्कासन ही दण्ड है (३२-३४) । सपिण्ड की पत्नी या पुत्री और विश्वासी व्यक्ति की पत्नी गमन करनेवाले का सर्वस्व-हरण और मस्तक-मुण्डन ही दण्ड है (३५) । यदि अज्ञानवश पूर्वोक्त किसी नारी के साथ ब्राह्म या शैव विधि से विवाह हुआ हो, तो इस अकार्य का ज्ञान होते ही उस स्त्री का त्याग कर दे (३६) । जो व्यक्ति सजातीय पर-पत्नी गमन करे या जो अपनी अपेक्षा हीन जाति की पर-स्त्री अर्थात् चाण्डालादि अपकृष्ट जाति से भिन्न हीन-वर्ण की पर-स्त्री से गमन करे, उसे पर्याप्त अर्थ-दण्ड और एक मास तक कण-भोजन का दण्ड दे (३७) हे वरानने ! जानकर ब्राह्मणी-गमन करने- वाले क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या सामान्य जाति के व्यक्ति का लिङ्गच्छेद-रूप दण्ड कहा है (३८) । इस कर्म में इच्छा रखनेवाली ब्राह्मणी को विकृत अर्थात् अङ्ग-हीना कर राजा देश से निकाल दे और जो वीराचारियों की पत्नी से गमन करे, उसका लिङ्गच्छेद और इस कुक्रिया में आसक्त वीर-पत्नी आदि को विकृता कर देश से निकालना