महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन । ८६ जो पापी लोग कुल-मार्ग, कुल-द्रव्य और कुल-साधक की निन्दा करते हैं, वे अधोगति को पाते हैं (२०६) । रुद्र डाकिनियाँ और रुद्र भैरव देव कौल-द्वेषी मनुष्यों के मांसास्थि का चर्वण कर आनन्दित हो नृत्य करते हैं (२०७) । दयालु, सत्य-निष्ठ और सदा पर-हितैषी व्यक्ति भी कौलों की निन्दा करके किसी भी प्रकार नरक जाने से बच नहीं सकते (२०८) । बहुत प्रकार के प्रयोग और बहुत से कर्म कहे हैं किन्तु एक-मात्र ब्रह्म-परायण 'कौल' का 'कर्म-त्याग' और 'कर्मानुष्ठान'-दोनों समान फल-दायक होते हैं (२०६) । एकमात्र परम ब्रह्म ही त्रिभुवन में व्याप्त होकर अवस्थित है, अतः विश्व की पूजा करने से वह ब्रह्म की ही पूजा होती है क्योंकि सभी वस्तुएँ ब्रह्म से अन्वित हैं अर्थात् अभिन्न हैं (२१०) । हे प्रिये ! फल में आसक्त, काम-परायण और कर्म-काण्ड में लगे हुए व्यक्ति अलग- अलग भावों से अन्य देवताओं की पूजा करने पर भी ब्रह्म का ज्ञान पाते हैं और ब्रह्म में लय हो जाते हैं (२११) । जो सभी वस्तुओं को ब्रह्म में और सभी वस्तुओं में ब्रह्म को देखते हैं, उन्हें ही 'सत्कौल' और जीवन्मुक्त जाने, इसमें सन्देह नहीं (२१२) ।
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन अपर्णा देवी वर्णाश्रम-भेद के अनुसार धर्म का विवरण सुनकर बड़ी प्रसन्न हुईं और उन्होंने शङ्कर से पूछा (१) । श्री देवी ने कहा-हे प्रभो ! आप सर्वज्ञ हैं । संसार-यात्रा में सफलता हेतु आपने वर्ण और आश्रम के आचार, धर्म और संस्कारों को बताया है (२) । किन्तु कलि-काल के मनुष्य काम-क्रोधादि से बुद्धि-हीन, नास्तिक, श्रद्धालु और सदा इन्द्रिय-सुख चाहनेवाले होंगे (३) । हे ईशान ! मूर्ख लोग आपके बताए अनुष्ठान को न करेंगे, उनकी क्या गति होगी ? इसे विशेष रूप से बतायें (४) । श्री सदाशिव ने कहा-हे देवि ! तुमने उत्तम प्रश्न किया है। तुम जगत् की जननी, जन्म और संसार- बन्धन से छुड़ानेवाली दुर्गा हो (५) । इस चराचर जगत् को तुम्हीं बनाए रहती हो (६) । तुम्हीं पृथ्वी, तुम्हीं जल, तुम्हीं वायु, तुम्हीं अग्नि, तुम्हीं आकाश, तुम्हीं अहङ्कार और तुम्हीं महत्-तत्त्व-स्वरूपा हो (७) । इस संसार में तुम्हीं समस्त जीव, तुम्हीं विद्या, तुम्हीं परम-देवता, तुम्हीं इन्द्रिय-समूह, तुम्हीं मन, तुम्हीं बुद्धि, तुम्हीं जगत् को गति और स्थिति हो (८) । तुम्हीं समस्त वेद, तुम्हीं प्रणव, तुम्हीं समस्त स्मृतियाँ, तुम्हीं महा-भारतादि समस्त संहिता, तुम्हीं निगम, तुम्हीं आगम, तुम्हीं तन्त्र, तुम्हीं सर्व-शास्त्र-मयी, तुम्हीं शिवा (६), तुम्हीं महा- काली, महा-लक्ष्मी, महा-नील-सरस्वती, महोदरी, महा-माया, महा-रौद्री एवं महेश्वरी हो (१०) । तुम्हीं सर्वज्ञा, ज्ञान-मयी हो, अतः तुमसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। हे प्राज्ञे ! फिर भी इस समय तुम जो पूछती हो, उसे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए बताता हूँ (११) । हे देवि ! कलियुग के मनुष्यों का आचरण तुमने ठीक ही बताया है। अपने हित की बात जानकर भी तुरन्त सुख देनेवाले पाप में मस्त होकर हिताहित की विवेचना से रहित हो वे सत्पथ पर नहीं चलते। उन लोगों की मुक्ति के लिए जो कर्त्तव्य है, उसे कहता हूँ (१२-१३) । निषिद्ध कर्म करना और विहित कर्म को छोड़ फा०-१२