महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे श्रीनाथ ! हे जगत् के नाथ ! हे मेरे नाथ ! हे दया-निधे ! परमामृत देकर मेरे मनोरथ को पूरा करें (१८५-८६) । इस पर गुरुदेव कौलों से अनुमति-प्राप्त्यर्थ उनसे कहें कि— आज्ञा मे दीयतां कौलाः प्रत्यक्ष-शिव-रूपिणः । सच्छिष्याय विनीताय ददामि परमामृतम् ॥ अर्थात् हे शिव-स्वरूप कौल-गण ! अपने विनम्र सच्छिष्य को मैं परमामृत देता हूँ। आप लोग मुझे आज्ञा दें (१८७) । उत्तर में कौल-जन कहें कि— चक्रेश ! परमेशान ! कौल-पङ्कज-भास्कर ! कृतार्थं कुरु सच्छिष्यं देह्यमुष्मै कुलामृतम् ॥ अर्थात् हे चक्रेश्वर ! हे परमेशान ! हे कौल-कमल-भानु ! आप इस सच्छिष्य को कुलामृत देकर कृतार्थ करें (१८८) । तब कौलों की अनुमति पाकर गुरुदेव शुद्धि के सहित परमामृत से पूर्ण पात्र शिष्य के हाथ में प्रदान करें (१८६) । फिर गुरुदेव हृदय में देवी का ध्यान कर स्रुव में लगी भस्म से शिष्य और कौल साधकों के भ्रू-मध्य में तिलक लगायें (१६०) । इसके बाद सभी कौलों को समस्त प्रसाद-तत्त्व अर्पित कर 'चक्रानुष्ठान' की विधि के अनुसार पान और भोजन करें (१६१)। हे देवि ! यह मैंने तुमसे ब्रह्म-ज्ञान का एकमात्र कारण और शिवत्व-प्राप्ति का उपाय — शुभ 'पूर्णाभिषेक' बताया है (१६२)। नौ, सात, पाँच, तीन या एक रात्रि में 'पूर्णाभिषेक' करे (१६३)। हे कुलेश्वरि ! इस संस्कार के ये पांच 'कल्प' बताए गए हैं। नौ रात्रि के अभिषेक में 'सर्वतोभद्र मण्डल', सात रात्रि के अभिषेक में 'नव-नाभ-मण्डल', पाँच रात्रि के अभिषेक में 'पञ्चाब्ज-मण्डल', तीन और एक रात्रि के अभिषेक में 'अष्ट- दल-कमल' की रचना करे (१६४-६५) । 'सर्वतोभद्र' और 'नव-नाभ' मण्डल में नौ घटों तथा 'पञ्चाब्ज' मण्डल में पाँच घटों की स्थापना करे (१६६) । हे देवि ! 'अष्ट-दल कमल' में केवल एक घट की विधि बताई है । केशरादि में अङ्ग-देवता और आवरण-देवताओं की पूजा करे (१६७) । 'पूर्णाभिषेक' से सिद्ध निर्मल-चित्त कौलों के देखने, छूने और सूंघने से ही द्रव्यों की शुद्धि हो जाती है (१६८) । शाक्त, वैष्णव, शैव, सौर या गाणपत—सभी उपासकों द्वारा कुल-धर्माश्रित साधु यत्नपूर्वक पूजनीय है (१६६) । शाक्तों के लिए शाक्त गुरु, शैवों के लिए शैव गुरु, वैष्णवों के लिये वैष्णव गुरु, सोरों के लिये सौर गुरु और गाणपत के लिये गाणपत गुरु ही प्रशस्त है। 'कौल' सभी के लिए प्रशस्त गुरु है। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति सब प्रकार से 'कौल' से दीक्षा ग्रहण करे (२००-२०१) । जो लोग यत्न करके भक्ति-पूर्वक पञ्च-तत्त्वों के द्वारा कौलों की पूजा करते हैं, वे अपने सभी पूर्वजों का उद्धार करके स्वयं परम गति को प्राप्त होते हैं (२०२) । पशु के मुख से मन्त्र प्राप्त करनेवाला पशु ही होता है, इसमें सन्देह नहीं । जो वीर से मन्त्र लेता है, वह वीर और जो 'कौल' से मन्त्र ग्रहण करता है, वह 'ब्रह्मज्ञ' होता है (२०३) । जिसका 'शाक्ताभिषेक' हुआ है, वही 'वीर' है। अपनो इष्ट-देवता की पूजा-विधि से वह पञ्च-तत्त्वों का शोधन कर सकता है किन्तु 'चक्रेश्वर' नहीं बन सकता (२०४) । वीर की हत्या करनेवाला वृथा अर्थात् अवैध मद्य पीनेवाला, वीर-पत्नी-गामी और चोर अर्थात् विप्र का धन, जिसका मूल्य अस्सी रत्ती स्वर्ण तक हो, उसे चुरानेवाला — ये 'महापापी' हैं और इन चार के सम्पर्क में रहनेवाला व्यक्ति पाँचवाँ 'महा-पापी' है (२०५) ।