महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
६२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र विधवा हो जाय, तो पिता उसका पुनर्विवाह करे। शैव धर्म में ऐसी ही विधि है (६७)। विवाह के बाद बारह पक्ष अर्थात् छः मास में या स्वामी की मृत्यु के एक वर्ष बाद जो स्त्री परिपुष्ट सन्तान को जन्म दे, वह उस स्वामी की पत्नी नहीं और वह पुत्र भी उसका पुत्र नहीं (६८) । गर्भाधान से पाँचवें महीने के बीच में जो स्त्री जानकर गर्भपात करे, उस स्त्री को और जो व्यक्ति उस गर्भपात का उपाय करे, उसको राजा तीव्र ताड़न द्वारा पीड़ित करे (६६)। पाँचवें मास के बाद जो स्त्री गर्भपात करे, उसे और जो व्यक्ति उसका उपाय करे, उसे हत्या-जन्य पाप होता है (७०) जो क्रूर-कर्मा मनुष्य जानकर नर-हत्या करे, उसे राजा अवश्य मृत्यु-दण्ड दे (७१)। प्रमाद या भ्रम-वश अनजान में मनुष्य-हत्या करनेवाले व्यक्ति को राजा अर्थ-दण्ड एवं कठिन ताड़ना द्वारा शुद्ध करे (७२)। जो स्वयं या अन्य द्वारा वध का उपाय करे, उस पापी को भी अज्ञानपूर्वक हत्या करनेवाले के समान ही दण्ड विहित है (७३)। हे परमेश्वरि ! परस्पर युद्ध करते समय एक को दूसरा मार डाले या आततायी मनुष्य को मारनेवाला पाप-भागी नहीं होता (७४) । पाप करने की इच्छावाला व्यक्ति अन्य का अङ्गच्छेद करे, तो राजा उसका भी अङ्गच्छेदन करे और अन्य पर प्रहार करे, तो उस पर भी प्रहार करे (७५)। जो पापी ब्राह्मण या गुरु के प्रति प्रहार के लिए डण्डा आदि उठाए, उसे राजा क्रमशः उसकी धन-सम्पत्ति जप्त करके या हस्त-दाहन द्वारा विशुद्ध करे (७६) । शस्त्र द्वारा घायल व्यक्ति की छः मास तक मृत्यु हो जाने पर प्रहार-कर्ता दण्डनीय होता है किन्तु मृत्यु-दण्ड का भागी नहीं होता (७७) । राज्य-विद्रोही, राज्य-हरण का इच्छुक, गुप्त रूप से राज-शत्रुओं का हित चाहनेवाला, राजा-सहित सैन्य का भेद लेनेवाला, राजा से युद्ध करने का इच्छुक, शस्त्र धारण कर प्रजा और पथिकों को पीड़ित करने- वाला—इन सबका विनाश करने से राजा पाप-भागी नहीं होता (७८-७६)। जो व्यक्ति स्वामी की अनिवार्य आज्ञा से नर-हत्या करता है, उसके स्थान पर स्वामी ही मृत्यु-दण्ड का भागी है—हत्या करनेवाला बध्य नहीं है (८०) । असावधान पुरुष के अस्त्र या पशु द्वारा किसी की मृत्यु होने पर अर्थ-दण्ड या शारीरिक दण्ड द्वारा उसकी शुद्धि होती है (८१)। राजा की आज्ञा न माननेवाला, राजा के सामने विवाद करनेवाला, कुल-धर्म की निन्दा करनेवाला—राजा इन सभी गर्हित व्यक्तियों को दण्डित करे (८२)। पथिकों का धन हरण करने- वाले, क्रूर, ठग, भेदिया और लोगों में झगड़ा बढ़ानेवाले दुष्टों को राजा देश से निकाल दे (८३)। जो शुल्क लेकर कन्या या पुत्र का दान करें या जो जानकर नपुंसक को कन्या दें, उन पापियों को राजा देश से निकाल दे (८४)। मिथ्यापवाद द्वारा अन्य का अनिष्ट करने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों को धर्मज्ञ राजा अपवाद के अनुरूप दण्डित करे (८५)। जो व्यक्ति जिस परिमाण में अनिष्ट करे, उतना ही उस पर अर्थदण्ड कर अनिष्ट- भागी व्यक्ति को राजा धन प्रदान करे (८६)। मणि-मुक्ता या सुवर्णादि धातु के मूल्य का विचार कर चोर के हाथ या दोनों बाहु कटवा दे (८७) । बलपूर्वक भैंस, घोड़ा, गाय आदि पशु, रत्नादि या शिशु-सन्तान के अप- हरण करनेवालों के लिए भी चोर के ही समान दण्ड विहित है (८८)। अन्न या कम मूल्य के द्रव्य के चोर को राजा एक पक्ष या सप्ताह कण-भोजन कराकर शोधित करे (८६) । हे सुर-पूजिते ! विश्वास-घातक या कृतघ्न की निवृत्ति यज्ञ, व्रत, तपस्या या दान आदि किसी प्रायश्चित्त द्वारा नहीं होती (६०)। जो लोग कूट-साक्षी हैं अर्थात् मध्यस्थ होकर जो पक्षपात करते हैं, राजा उन्हें तीव्र दण्ड द्वारा शासित करे और देश से बाहर निकाल दे (६१) । छः, चार या तीन लोगों को साक्षी का प्रमाण है। अभाव में एक व्यक्ति को साक्षी मान्य है, जो प्रसिद्ध और धार्मिक हो (६२)। हे प्रिये ! देश, काल और विषय-विशेष में जो परस्पर-विरुद्ध वाक्य बोलें, उन साक्षियों की बात अग्राह्य है (६३) । अन्धे और बहरे लोगों
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६३ की बात प्रमाण होती है। मूक (गंगे) और हकलानेवाले का सिर हिलाना स्वीकृति तथा प्रमाण के लिए उनकी लिपि ग्रहण करे (६४) सभी स्थानों में सभी के लिए लिपि ही प्रशस्त प्रमाण है, विशेष कर व्यवहार के स्थान में क्योंकि बहुत समय तक यह नष्ट नहीं होती (६५)। जो व्यक्ति अपने लिए या दूसरे के लिए जाली लिपि करते हैं, उन्हें कूट-साक्षी का दण्ड दूना करके दे (६६) । भ्रम और प्रमाद-रहित व्यक्ति अपने विषय में मात्र एक बार स्वीकार करे, तो बहु साक्षियों के होने पर भी, प्रमाण है (६७)। हे पार्वति ! जिस प्रकार सत्य का आश्रय लेकर सभी पुण्य रहते हैं, उसी प्रकार एकमात्र मिथ्या का आश्रय लेकर सभी पाप रहते हैं (६८) । अतः जो व्यक्ति सत्य-हीन है, वह सब पापों का आश्रय है। ऐसे पापात्मा का ताड़न और दमन करने से राजा पाप का भागी नहीं होता (६६) । 'मैं जो कहूँगा, वह सत्य है,' इस प्रकार संकल्प कर कौल गुरु, ब्राह्मण, गङ्गा-जल, देव-मूर्ति, कुल-शास्त्र, कुलामृत, देव-निर्माल्य—इन सबको स्पर्श कर जो कहा जाता है, उसका नाम 'शपथ' है। यह 'शपथ' लेकर जो मिथ्या बोलता है, वह एक कल्प तक नरक में रहता है (१००-१०१)। जो कार्य पाप-जनक नहीं है, उसका त्याग या ग्रहण, जो 'शपथ' के साथ स्वीकृत हो, वह अवश्य कर्तव्य है (१०२)। स्वीकृत बात का जानकर उल्लंघन करने से एक पक्ष निराहार द्वारा शुद्धि होती है। भ्रम-वश उल्लंघन हो, तो बारह दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होती है (१०३) यदि कुल-धर्म का पालन सत्य विधि से न करे, तो वह मोक्ष और मंगल-दायक नहीं होता, उस कौल-व्यक्ति के लिए केवल पाप-जनक ही होता है (१०४) । 'सुरा' द्रव-मयी तारा है अर्थात् द्रव-पदार्थ के रूप में परिणता 'तारा' है। अतः जीवों के लिए मोक्षदा, भोग और मुक्ति की कारण तथा रोग व विपत्ति की नाशिनी है (१०५) । हे प्रिये ! 'सुरा' सभी पापों को भस्म करती है; 'सुरा' द्वारा जगत् पवित्र है, 'सुरा' सब प्रकार की सिद्धि देती है और 'सुरा' ज्ञान, बुद्धि व विद्या को बढ़ाती है (१०६)। हे आद्ये ! मुक्त, मुमुक्षु, सिद्ध गण, साधक-जन, राजा और देव लोग अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए इसी 'सुरा' का सदा सेवन करते हैं (१०७) । जो शास्त्र में निर्दिष्ट नियम का और सावधान- चित्त से 'सुरा' पान करते हैं, वे पृथिवी पर मर्त्य होकर भी अमर्त्य (अर्थात् देव-समान) होते हैं (१०८)। पञ्च- तत्त्वों में से प्रत्येक तत्त्व विधि-पूर्वक सेवन करने से मनुष्य शिव-स्वरूप होता है और पाँचों तत्त्वों का सेवन करने का क्या फल होता है, उसे मैं नहीं जानता अर्थात् ज्ञान से परे फल होता है (१०६) । यदि विधि को छोड़कर कोई इस वारुणी देवी का पान करता है, तो वह पान करनेवाले की बुद्धि, आयु, यश, धन-सब कुछ नष्ट कर देती है (११०)। जो प्रमत्त चित्त से अत्यधिक 'सुरा' सेवन करता है, उसका धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-साधक ज्ञान नष्ट हो जाता है (१११)। अति 'मद्य' पीनेवाला कार्याकार्य-विचार-हीन, विभ्रान्त-बुद्धि मनुष्य पग-पग पर अपना और दूसरे का अनिष्ट करता है (११२)। अतः 'मद्य' या मादक वस्तु में अत्यन्त आसक्त व्यक्तियों को राजा या चक्रेश्वर शारीरिक दण्ड या अर्थ-दण्ड द्वारा शुद्ध करे (११३) । 'सुरा' अधिक मात्रा में पी हो या थोड़ी ही मात्रा में, वह 'सुरा'-भेद से, व्यक्ति-भेद से, देश-भेद से और काल-भेद से बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है (११४) । अतः लड़खड़ाती वाणी, काँपते हाथों, डगमगाते पैरों और अस्थिर दृष्टि द्वारा अतिरिक्त पान का निर्णय करे क्योंकि 'सुरा' के परिमाण से अति-पान को नहीं जान सकते (११५) । राजा अवशेन्द्रिय, मद से व्याकुल चित्तवाले और देवता व गुरु की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले, भय-प्रद, सभी प्रकार के अनर्थ को तैयार, शिव-घाती पापी की जीभ जलवा दे, उसका धन छीन ले और उसे ताड़ना दे (११६-१७)। जिसके पैर, वचन और हाथ विचलित हों; जो भ्रमित, उन्मत्त, उद्धत हो, उस उग्र व्यक्ति को राजा दण्ड देकर उसका धन छीन ले (११८) । जो व्यक्ति मत्त होकर अश्लील वाक्य बोले, लज्जा और भय
६४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र से हीन हो, राजा उसका धन छीनकर उसे दण्डित करे (११६) । हे कुलेश्वरि ! सौ बार अभिषिक्त कौल यदि अति-पान करे, तो उसे कुल-धर्म-बहिष्कृत और पशु ही माना जाता है (१२०) । 'मद्य' शोधित हो या अशोधित, जो व्यक्ति उसे अति पान करता है, वह कौल-गण द्वारा त्याज्य और राजा द्वारा दण्डनीय है (१२१) । यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य मत्त होकर ब्राह्म-धर्म की विधि के अनुसार परिणीता पत्नी को 'मद्य'-पान कराए, तो उस भार्या के सहित पाँच दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होतो है (१२२)। असंस्कृत 'सुरा' पीनेवाला तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है। यदि कोई व्यक्ति अशोधित 'मांस' खाता है, तो उसे दो दिन उपवास करना होगा (१२३) । यदि कोई व्यक्ति असंस्कृत 'मत्स्य' और 'मुद्रा' खाता है, तो उसे एक दिन उपवास करना चाहिए। यदि कोई विधि का उल्लंघन कर पञ्चम तत्त्व की सेवा करे, तो वह व्यक्ति राज-दण्ड द्वारा शुद्ध होता है (१२४) । हे शिवे ! यदि कोई व्यक्ति जानकर मनुष्य या गाय का मांस खाता है, तो वह एक पक्ष उपवास द्वारा शुद्ध होता है, यही उसका प्रायश्चित्त है (१२५) । जो मनुष्याकृति वाले पशु या मांस खानेवाले जीव का मांस खाता है, वह तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१२६) । जो म्लेच्छ, यवन, चाण्डाल या कुलाचार-विरोधी पशु का अन्न खाता है, उसको शुद्धि एक पक्ष के उपवास से होती है (१२७) । हे कुलेश्वरि ! जो अनजान में पूर्वोक्त व्यक्तियों का जूठा खा लेता है, वह एक पक्ष के उपवास से और जो जानकर खाता है, वह एक मास के उपवास से शुद्ध होता है (१२८) । जो व्यक्ति एक बार अनुलोम जाति अर्थात् क्रमशः नीच जाति का अन्न खाता है—यथा ब्राह्मण क्षत्रिय का अन्न खाए, क्षत्रिय वैश्य का अन्न खाए इत्यादि तो वह तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१२६) । यदि पशु, चाण्डाल या म्लेच्छ का अन्न 'चक्र' में अर्पित हो या 'वीर' व्यक्ति के हाथ द्वारा दिया जाय, तो उसे खाने में कोई पाप-भागी नहीं होता (१३०) । अन्नाभाव, दुर्भिक्ष, विपत्-काल या प्राण-संकट के समय निषिद्ध भोजन करके प्राण-रक्षा करनेवाला पाप-भागी नहीं होता (१३१) । हाथी की पीठ पर, अनेक लोगों द्वारा वहनीय प्रस्तर या काष्ठासन पर और दूषित पदार्थ का यदि लक्ष्य न हो तो भक्ष्य- दोष नहीं होता (१३२) । हे प्रिये ! जिन पशुओं का मांस अभक्ष्य है, जो पशु रोगी हैं, उन्हें देवता के लिए न मारे, मारने से पाप होता है (१३३) । जानकर गो-हत्या हो, तो 'कृच्छ्र-व्रत' करे। अनजान में गो-हत्या हो जाय, तो आधा 'कृच्छ्र-व्रत' करे (१३४) । जब तक इस व्रत को न कर ले, तब तक क्षौर-कर्म, नाखून काटना, वस्त्र धोना आदि न करे (१३५) । एक मास उपवास में बिताकर, एक मास कण खाकर व एक मास भिक्षान्न खाकर बिताना ही 'कृच्छ्र-व्रत' है (१३६) । व्रत पूरा होने पर कौलों को जातिवालों को और बन्धु-बान्धवों को भोजन कराने से जान कर की गई गो-हत्या के पाप से मुक्ति मिलती है (१३७) । हे शिवे ! ठीक से पालन न करने से हुई गो-हत्या का पाप आठ दिन के उपवास से दूर होता है किन्तु क्षत्रिय छः दिन, वैश्य चार दिन, शूद्र दो दिन, उपवास कर इस पाप से छूट जाता है (१३८) । इच्छा करके हाथी, ऊँट, भैंसे और घोड़े की हत्या करनेवाला पापी मनुष्य तीन दिन के उप- वास से शुद्ध होता है (१३६) । हिरण, भेंड़, बकरे और बिल्ली की हत्या करने पर एक दिन का उपवास करे । मोर, तोते या हंस की हत्या करने पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास करे (१४०) । अस्थि-युक्त जीव की हत्या करने पर एक रात्रि निरामिष भोजन करे। अस्थि-हीन जीव की हत्या करने पर दुःख करने से ही शुद्धि होती है (१४१) । हे देवि ! शिकार करते समय पशु, मछली या अण्डज जीव की हत्या करने से राजा पापी नहीं होता क्योंकि यह उसका नित्य-धर्म है (१४२) हे भद्रे ! देवता के लिए जो कर्म हैं, उन्हें छोड़कर अन्य सभी कर्मों में हिंसा वर्जित है। वैध हिंसा करने से मनुष्य पाप से लिप्त नहीं होता है (१४३) । सङ्कल्पित व्रत पूरा न कर सके, देव-निर्माल्य को लांघ जाय, अशौच-काल में देव-प्रतिमा को छू ले, तो
ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६५ गायत्री का जप करे (१४४)। माता, पिता और ब्रह्म-दाता—ये महा-गुरु हैं। जो इनकी निन्दा करता है या इन्हें कठोर बात कहता है, वह पाँच दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१४५)। जो इसी प्रकार किसी अन्य गुरु, कौल या ब्राह्मण की निन्दा करता है या कटु बात करता है, वह ढाई दिन के उपवास से पाप-मुक्त होता है (१४६)। धनार्थी मनुष्य सभी देशों में जा सकते हैं किन्तु जिस देश या शास्त्र में कौलाचार निषिद्ध हो, उस देश और शास्त्र को छोड़ दे (१४७)। जिस देश में कौलाचार निषिद्ध है, उसमें इच्छानुसार जाने से कुल-धर्म से गिरना पड़ता है और तब पुनः पूर्णाभिषेक द्वारा ही वह शुद्ध हो पाता है (१४८)। सूर्योदय से आठ पहर तक निराहार रहना ही 'उपवास' है। प्रायश्चित्त में यही विहित है (१४६)। प्राण-धारण के लिए एक अञ्जलि जल पीने या हवा खाने से 'उपवास' से भ्रष्ट नहीं होता (१५०)। वृद्धावस्था या शारीरिक पीड़ा से 'उपवास' में असमर्थ हो, तो प्रत्येक 'उपवास' के अनुकल्प में बारह ब्राह्मणों को भोजन कराए (१५१)। दूसरे की निन्दा, अपनी प्रशंसा या दुःखदायी अनुचित बात कहने या अवैध कार्य करने पर केवल परिताप से शुद्धि होती है (१५२)। इनके सिवा जान या अनजान में किए सभी पाप गायत्री देवी की उपासना और कौल भोजन द्वारा नष्ट होते हैं (१५३)। पुरुषों के लिए जो साधारण नियम विहित हैं, वही स्त्रियों और नपुंसक लोगों के प्रति भी प्रयोग करे किन्तु स्त्रियों के सम्बन्ध में यह विशेष बात है कि उनके पति ही महा-गुरु हैं (१५४)। महा-व्याधि से ग्रस्त चिर- रोगी लोग स्वर्ण-दान से पवित्र होकर देव और पितृ-कर्म में अधिकारी होते हैं (१५५)। अपमृत्यु या विद्युदग्नि से दूषित घर को 'भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा, स्वः स्वाहा'—इन शत-संख्यक व्याहृतियों द्वारा होम कर शुद्ध करे (१५६)। बावली, कुएँ, तालाब आदि में अस्थि-युक्त शव दिखने पर उस शव को बाहर निकालकर उन्हें शुद्ध करे (१५७)। उनके शोधन की विधि यह है कि इक्कीस घड़े विशुद्ध जल को पूर्णाभिषेक-मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर उस जल को उक्त बावली आदि में छोड़ दे (१५८)। यदि उक्त बावली आदि में जल थोड़ा ही हो और वह शव की दुर्गन्ध से दूषित हो गया हो, तो कीचड़ सहित वह सारा जल बाहर करने के बाद उक्त विधि से मन्त्रित जल उसमें छोड़े (१५६)। उक्त जलाशय में यदि हाथी बराबर बहुत जल हो, तो एक सौ घड़े जल उससे बाहर निकालकर पूर्वोक्त अभिषेक मन्त्रों से पवित्र इक्कीस घड़े जल को उसमें छोड़कर उसे शुद्ध करें (१६०)। शव से छुआ जलाशय यदि इस विधि से शोधित न हो, तो उसका जल न पिए और वैसे जलाशय की प्रतिष्ठा भी न करे (१६१)। उसके जल में स्नान या उसके द्वारा किया गया कोई भी कर्म वृथा होता है। यदि स्नान या कोई कर्म कर ले, तो एक दिन निराहार रहकर पञ्चामृत पीने से शुद्धि होती है (१६२)। जो धनी होकर याचना करता है, वीर होकर युद्ध से मुख मोड़ता है, जो कुल-धर्म को दोष लगाता है, जो कुल-स्त्री होकर सुरा-पान करती है, जो मित्र से द्रोह करता है, जो पण्डित होकर स्वयं पापाचार करता है—ऐसे पापी व्यक्ति को जो देख ले, वह सूर्य का दर्शन कर विष्णु का स्मरण करे और पहने हुए वस्त्रों सहित स्नान करे, तो उन्हें देखने से हुए पाप से मुक्त होगा (१६३-६४)। जो द्विजाति होकर गधे, मुर्गे या सुअर का बेचता है या किसी अन्य नीच कर्म को करता है, वह तीन दिन के व्रतानुष्ठान से शुद्ध होता है (१६५)। हे अम्बिके ! तीन दिन व्रत की विधि यह है कि एक दिन निराहार, एक दिन कण-भोजन और एक दिन जल-पान करे (१६६)। बन्द द्वार वाले घर में यदि कोई बिना बुलाए प्रवेश करता है या जो बात बताने से मना की गई है, उसे कोई कह दे, तो पाँच दिन आहार छोड़ना पड़ता है (१६७)। जो अहंकार-युक्त होकर आनेवाले गुरु-
६६ । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जन को देखकर खड़ा नहीं होता, वह एक दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१६८) । अच्छी तरह से स्पष्ट अर्थ- वाले इस शिव-प्रणीत शास्त्र का जो लोग कूट अर्थ करेंगे, वे पतित होकर अधोगति को प्राप्त करेंगे (१६६) । हे देवि ! तुमसे जो कहा है, वह सार का भी सार है और उत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट धर्म है, पवित्र करनेवाला है, कल्याणकारी है और इह-लोक तथा परलोक में परमार्थ देनेवाला है (१७०) । बारह्वाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन श्री सदाशिव ने कहा—हे आद्ये ! मैं तुम्हें पुनः सनातन व्यवहार बताता हूँ । इस व्यवहार की रक्षा करने से राजा स्वच्छन्द होकर प्रजा का पालन कर सकता है (१) । राजा के नियम को न मानने से मनुष्य धन-लोलुप होकर गुरुजनों, स्वजनों और बन्धु-बान्धवों के साथ झगड़ा करने लगेंगे (२) । हे देवि ! धन के लिए एक दूसरे पर चोट करेंगे और हिंसा, धन चुराने की इच्छा के कारण पापी होंगे (३) । अतः मनुष्य के कल्याण के लिये मैं धर्म-सम्मत राज-नियम बनाता हूँ। इन नियमों के मानने से मनुष्यों का कभी अमंगल न होगा (४) । राजा पापों के निवारण के लिए जिस प्रकार पापियों के दण्ड का विधान करे, उसी प्रकार मनुष्यों के सम्बन्ध-भेद के अनुसार दाय (संपत्ति) का भी विभाजन करे (५) । विवाह और जन्म के भेद से संबंध दो प्रकार के होते हैं, जिनमें से जन्माधीन संबंध अत्यन्त बली होता है (६) । हे शिवे ! धन के अधिकार के विषय में ऊर्ध्व- तन संबंध की अपेक्षा अधस्तन संबंध श्रेष्ठ है । इसी प्रकार अधः-ऊर्ध्व-क्रम से स्त्री-जाति की अपेक्षा पुरुष-जाति ही श्रेष्ठ है (७) । इनके बीच अधिकतर निकट संबंध के क्रम से दाय (संपत्ति) का अधिकारी होता है । पण्डित लोग इसी विधि के अनुसार यथा-क्रम धन का विभाग करते हैं (८) । मृत व्यक्ति के यदि पुत्र, पौत्र, कन्या, पिता और पत्नी आदि जीवित हैं, तो पुत्र ही धन का अधिकारी होगा, अन्य कोई नहीं (६) । जहाँ सन्तान बहुत हैं, वहाँ सभी पुत्र समान अंश प्राप्त करेंगे, किन्तु वंशानुक्रम से 'ज्येष्ठ पुत्र' ही राज्याधिकारी होगा (१०) । यदि पैतृक ऋण है, तो पैतृक धन में से ही उसे चुकाना होगा क्योंकि ऋण के रहते पैतृक धन का विभाग करना उचित नहीं है (११) । यदि ऋण के रहते पुत्रों में पैतृक धन बँट गया हो, तो राजा उनसे वह धन लेकर पैतृक ऋण को चुकाये (१२) जिस प्रकार पाप करने से अपने को ही नरक में जाना होता है, उसी प्रकार अपने ऋण से अपने को ही बँधना पड़ता है, दूसरा कोई नहीं बँधता (१३) । स्थावर या अस्थावर जो कुछ सामान्य धन हो, उसमें से अधिकारियों को उनके विभाग के अनुसार अपना-अपना अंश मिलता है (१४) । अधिकारियों में सहमति होने से विभाजन सिद्ध होता है, यदि उनमें सहमति न हो, तो राजा पक्षपात-हीन दृष्टि से अंश बाँट दे (१५) । जिस स्थावर या अस्थावर को बाँटा न जा सके, राजा उसका मूल्य या उप-स्वामित्व अधिकारियों में विभाजित कर दे (१६) । धन के बँट जाने पर भी यदि कोई व्यक्ति किसी धन में अपना अंश प्रमाणित करे, तो राजा उस धन को पुनः बाँट कर अंश न पानेवाले व्यक्ति को उसका भाग दिला दे (१७) । हे शिवे ! सभी अधिकारियों की संमति से धन बँट जाने के बाद उस विभाजन के संबंध में विवाद करनेवाला व्यक्ति राजा द्वारा दण्डनीय होगा (१८) । मृत व्यक्ति के पौत्र, पत्नी और पिता यदि विद्यमान हैं, तो पौत्र ही अधस्तनत्व-रूप से गौरव पाकर धन
बारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन । ३६७ का अधिकारी होगा (१९)। पुत्र-हीन मृत व्यक्ति के पिता के भाई और पितामह यदि विद्यमान हैं, तो जन्म के अनुसार निकटता होने के कारण पिता ही उसके धन के अधिकारी होंगे (२०)। हे प्रिये ! कन्या के अति सन्नि- कृष्ट होने पर भी मृत व्यक्ति की कन्या यदि विद्यमान है, तो पौत्र धन का अधिकारी होगा क्योंकि स्त्री की अपेक्षा पुरुष ही मुख्य है (२१)। मृत पुत्र को सोपान मानकर धन पितामह से पौत्र को जाता है। संसार में प्रसिद्ध है कि स्वयं पिता ही पुत्र-स्वरूप होता है (२२)। विवाह-सम्बन्ध में ब्राह्म-विधि से विवाहिता पत्नी ही श्रेष्ठ है। पति की अर्द्धाङ्ग-स्वरूपा वह ब्राह्मी पत्नी ही पुत्र-हीन पति के धन की अधिकारिणी होती है (२३)। पति-पुत्र-हीना नारी पति के धन को पाकर भी उसे दान या विक्रय नहीं कर सकती, केवल स्त्री-धन को ही वह दान या विक्रय कर सकती है (२४)। पितृ-कुल या श्वसुर-कुल से दिया गया या अपने द्वारा कमाया धन 'स्त्री-धन' कहा गया है (२५)। उक्त नारी की मृत्यु होने पर पति के प्राप्त धन की स्थिति पूर्ववत् हो जायगी अर्थात् पति के निकटवर्ती व्यक्ति को वह धन मिलेगा (२६)। स्वामी की मृत्यु होने पर स्त्री स्व-धर्म के अनुसार पति के बन्धुओं के अधीन या उनके अभाव में पिता के बन्धुओं के अधीन रहकर धन की अधिकारिणी होगी (२७)। जिस स्त्री के प्रति व्यभिचार की शंका है, वह पति के धन को नहीं पाएगी; जो व्यक्ति उसके पति के धन का अधिकारी होगा, उससे वह जीविका मात्र पाएगी (२८)। हे शुचि-स्मिते ! यदि स्वर्गीय व्यक्ति के अनेक पत्नियां हैं, तो उन सबको पति का धन बराबर बाँटकर मिलेगा (२६)। स्वामी के धन की अधिकारिणी पत्नी की मृत्यु होने और पति की कन्या के विद्यमान होने पर वह धन पुनः पति का होकर दुहितृ-गामी होगा (३०)। इसी प्रकार कन्या के रहने पर पुत्र-वधू को मिला धन उसकी मृत्यु होने पर पुनः स्वामी को जाकर श्वसुर के अधीन होकर उस कन्या को मिलेगा (३१)। हे शिवे ! इसी प्रकार पितामह के विद्यमान होने पर यदि धन माता को मिला है, तो माता की मृत्यु होने पर वह धन माता के पति अर्थात् पितामह के पुत्र का धन होकर पितामह को मिलेगा (३२) मृत व्यक्ति का ऊर्ध्व- गत धन जैसे पिता को मिलता है, वैसे ही पति-हीना माता को भी मिलता है (३३)। जननी के रहते विमाता धन की अधिकारिणी नहीं होती। जननी की मृत्यु होने पर पुत्र का आश्रय कर पिता द्वारा विमाता भी धन- भागिनी होती है (३४)। अधस्तन अधिकारी का अभाव हो, तो धन अधोगामी नहीं होता, परन्तु वही धन जिस क्रम से वैसा होता, उसी क्रम से वह ऊर्ध्वगामी होगा (३५)। अतः चाचा के रहने पर बहन को मिला धन भी कन्या-पुत्र-हीना उस बहन की मृत्यु होने पर, बहन के पति के रहने पर भी, लौट कर चाचा को ही मिलेगा (३६)। धन ऊर्ध्व से अधोगामी होकर पहले पुरुष को मिलता है। अतः सहोदरा बहन के रहने पर भी सौतेला भाई धन का अधिकारी होता है (३७)। सहोदरा बहन और सौतेले भाई की सन्तान के रहने पर सौतेले भाई को प्राप्त धन को सौतेले भाई की सन्तान ही पाएगी (३८)। हे शिवे ! मृत व्यक्ति के धन को सहोदर और सौतेले भाई दोनों बराबर बाँट लें क्योंकि यह धन मृत व्यक्ति के पितृ-धन के समक्ष है (३६)। कन्या जीवित है, तो उसका पुत्र धनाधिकारी नहीं होगा। जहाँ जो धनाधिकार का बाधक है, वहाँ उसकी मृत्यु के बाद दूसरे का धन मिलेगा। यहाँ कन्या दौहित्र के धनाधिकार में बाधक है, अतः कन्या की मृत्यु के बाद दौहित्र को अधिकार मिलेगा (४०)। अविवाहिता बहन का विवाह सामान्य पैतृक धन से करने पर पुत्र न होने पर कन्या के पितृ-धन को बाँटकर ले (४१) सन्तति-हीना मृत स्त्री का स्त्री-धन स्वामी को मिलता है। स्त्री-धन से भिन्न अन्य धन जिसे उत्तराधिकार-सूत्र से प्राप्य है, उसी को मिलेगा (४२)। उत्तराधिकार के संबंध से जो सम्पत्ति नारी को मिलती है, उससे वह अपना भरण-पोषण और पुण्य कर्म कर सकती है किन्तु उसे दान या विक्रय नहीं कर सकती १३
६८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र (४३) । चाचा और पिता की विमाता विद्यमान हों, तो धन पितामह-गामी होकर बाद में चाचा द्वारा चाची को ही मिलता है (४४) । पितामह, चाचा और भाई जीवित हों, तो अधस्तन पुरुष की प्रधानता होने से भाई ही धन का अधिकारी होगा (४५) । चाचा की अपेक्षा भाई और पितामह दोनों ही समान रूप से सन्निकृष्ट हैं, ऐसे स्थल पर मृत व्यक्ति का धन पितृधन होकर भाई को मिलेगा (४६) । मृत व्यक्ति के दौहित्र और पिता विद्यमान हों, तो दौहित्र ही धनाधिकारी होगा क्योंकि धन स्वभावतः अधोगामी होता है (४७) । हे कालिके ! स्वर्गीय व्यक्ति के पिता व माता विद्यमान हों, तो पुरुष की मुख्यता होने से पिता ही धनाधिकारी होगा (४८) । मृत व्यक्ति के मातुल के जीवित होने पर भी पितृ-संबंध की गुरुता होने से पितृ-सपिंड व्यक्ति ही धन पाएगा (४६) । हे शिवे ! धन यदि अधोगामी न हो सकेगा, तो वह ऊर्ध्वतन पुरुष को मिलेगा। पुरुष की प्रधानता होने से पहले धन पितृ-कुल को मिलेगा। इसी कारण से मातुल के सन्निकृष्ट होने से वह धनभागी नहीं है (५०) । हे पार्वति ! मृत-पितृक पौत्र पितामह के धन से पिता के प्राप्य अंश को पाएगा (५१) । पौत्री यदि भ्रातृ-हीना, पितृ-मातृ- विहीना और स्व-धर्मिणी है, तो पितामह के धन में पितृव्य के साथ बराबर भाग पाएगी (५२) । हे देवि ! पौत्रों को पितामही और पितृ-भगिनी यदि जीवित हों, तो पितृ-गत धन में पौत्री ही अधिकारिणी होगी अर्थात् धनी की कन्या, माता, बहन के बीच कन्या ही उत्तराधिकारिणी है (५३) । अधोगामी धन में अधस्तन पुरुष की ही प्रधानता है और ऊर्ध्वगामी धन में ऊर्ध्वतन पुरुष की (५४) । हे प्रिये ! इसी से पुत्र-वधू, पौत्री या कन्या के जीवित होने पर मृत व्यक्ति का धन उसके पिता नहीं ले सकते (५५) । यदि मृत व्यक्ति के पितृ-कुल में कोई उत्तराधिकारी नहीं है, तो पूर्वोक्त विधि के अनुसार वह धन मातामह-कुल को मिलेगा (५६) । मातामह-कुल को प्राप्त धन मामा, मामा के पुत्र आदि के द्वारा पहले अधस्तन, उसके अभाव में ऊर्ध्वतन एवं पुरुष को और उसके अभाव में नारी को मिलेगा (५७) । ब्राह्म विवाह से विवाहिता पत्नी की सन्तान के होने पर और पितृ-सपिण्ड के रहने पर शैव विवाह से विवाहिता स्त्री की सन्तान मृत व्यक्ति के धन को नहीं पाएगी (५८) । हे भद्रे ! शैव विवाह से विवाहिता पत्नी और उसके पुत्र धनाधिकारी से मृत व्यक्ति की सम्पत्ति के अनुसार भोजन-वस्त्र पा सकेंगे (५६) । हे प्रिये ! शैव विवाह से विवाहिता पत्नी का पालन शैव पति ही करता है, यदि वह व्यभिचारिणी न हो। यह शैवी पत्नी पिता-माता आदि के धन की अधिकारिणी नहीं है (६०) । पिता क्रोध या लोभ से सत्कुलोत्पन्ना कन्या को यदि शैव विवाह में देता है, तो वह लोक-समाज में निन्दित होता है (६१) । शैवी पत्नी और उसका वंश न होने पर शिव-शासन से क्रमशः अर्थात् पूर्व-पूर्वाभाव में समानोदक, आचार्य और राजा मृत व्यक्ति के धन को पाएँगे (६२) । हे प्रिये ! पिण्ड-दाता से सातवें पुरुष तक 'सपिण्ड' और आठवें से दसवें पुरुष तक 'समानोदक' कहलाते हैं। फिर केवल 'गोत्रज' कहलाते हैं (६३) । जो धन एक बार बाँटकर बाद में स्वेच्छा से मिश्रित कर लिया गया हो, उसे बिना बँटा मानकर पुनः बाँटा जायगा (६४) । बँटे हुए या न बँटे हुए धन में जिसका जितना अंश निर्दिष्ट है, उस व्यक्ति के मरने पर उसके उत्तराधिकारी उसी के अनुसार अंश प्राप्त करेंगे (६५) । जो जिसके धन का अधिकारी है, वह उसे अपने जीवन भर पिण्डदान करेगा, शैव पत्नी के पुत्र को छोड़कर (६६) । इस लोक में जन्म-संबंध के कारण जिस प्रकार 'अशौच' विहित है, उसी प्रकार उत्तराधिकारी को भी तीन रात्रि का अशौच विहित है (६७) । पूर्णाशौच या खंडाशौच निर्दिष्ट अशौच-काल के बीच में सुनने पर अशौच-काल के जो कुछ दिन शेष हों, द्विजादि आदि सभी वर्ण उन्हीं कुछ दिनों में शुद्ध होंगे (६८) । अशौच-काल के बीत जाने पर खंडाशौच सुनने पर अशौच नहीं होता किन्तु पूर्णाशौच सुनने पर तीन दिन का अशौच होगा, यदि एक वर्ष से अधिक न हो गया हो (६६) । एक वर्ष
बारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन | ६६ बीत जाने पर पुत्र पिता या माता का और पतिव्रता पत्नी पति का मरण सुनने पर तीन रात्रि का अशौच मानें (७०)। जब एक अशौच के बीच एक अन्य अशौच होता है, तब गुरु अशौच द्वारा मनुष्यों की शुद्धि होती है (७१)। दीर्घ-काल तक होने से अशौच व्याप्य होता है, उससे व्यापक अशौच गुरुतर होता है (७२)। यदि मरणाशौच या जननाशौच के शेष दिनों में कोई दूसरा मरण-जनित या जन्म-जनित खंडाशौच उपस्थित हो, तो पूर्व अशौच द्वारा ही वह छूट जायगा अर्थात् खंडाशौच को ग्रहण नहीं किया जायगा। यदि पूर्णाशौच हो, तो पूर्व अशौच के बाद दो दिन अशौच बढ़ जायगा (७३)। स्त्रियों का जब तक विवाह नहीं होता, तब तक पितृ-कुल में अशौच होगा। विवाह होने पर पिता-माता की मृत्यु पर तीन रात का अशौच होगा (७४)। विवाह के बाद स्त्री पति-गोत्र को पाती है। इसी प्रकार दत्तक पुत्र दत्तक लेनेवाले के गोत्र को पाता है (७५)। जननी और जनक दोनों की सम्मति से पुत्र ग्रहण कर ग्रहण-कर्त्ता अपने गोत्र और नाम का उल्लेख कर दत्तक पुत्र का संस्कार करे (७६)। जिस प्रकार औरस पुत्र को पिता-माता के धन और पिंड का अधिकार होता है, उसी प्रकार दत्तक पुत्र को भी दत्तक लेनेवाले स्त्री-पुरुष के धन और पिंड का अधिकार है क्योंकि वे ही दत्तक के पिता-माता हैं (७७)। पाँच वर्षीय बालक को सवर्ण से लेकर उसका प्रतिपालन करे। दत्तक लेने में पाँच वर्ष से अधिक आयु का बालक प्रशस्त नहीं है (७८)। हे कालिके ! भाई का पुत्र भी यदि दत्तक हो, तो दत्तक लेनेवाला ही उसका पिता होगा और उसका जन्मदाता सभी कार्यों में उसका पितृव्य (चाचा) होगा (७९)। जो व्यक्ति जिसके धन का अधिकारी होगा, वही व्यक्ति उसके धर्म का पालन करेगा और नियम मानेगा तथा उसके बन्धुओं को सन्तुष्ट करेगा (८०)। कानीन (कन्या-काल में उत्पन्न पुत्र), गोलक (उप-पति द्वारा विधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) और कुंड (उप-पति द्वारा सधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) अति पापी हैं, उनके मरने पर अशौच नहीं होता और उन्हें धनाधिकार भी नहीं होता (८१)। जिन पुरुषों को लिङ्गच्छेद का दंड मिला है या जिन स्त्रियों की नाक राज- दंड द्वारा काटी गई है या जो महा-पापी हैं उनके मरने पर अशौच नहीं माना जाता (८२)। जो व्यक्ति निरुद्देश हों, उनके परिवार और धन की रक्षा राजा बारह वर्ष तक करे (८३)। बारह वर्ष बीतने पर उक्त अनुद्दिष्ट व्यक्ति की कुश-मय देह का दाह कराए। तीन रात्रि के बाद उस व्यक्ति के पुत्रादि द्वारा प्रेतत्व-मोचन कराए (८४)। फिर राजा उस अनुद्दिष्ट व्यक्ति के धन को उसके पुत्रादि के क्रम से यथा-सम्भव उसके परिवार के लोगों में बाँट दे अन्यथा वह पापी होगा (८५)। जिसका रक्षक कोई नहीं है, उनका और दीन, विपत्ति-ग्रस्तादि लोगों का रक्षक राजा ही है क्योंकि राजा प्रजा-गण का प्रभु है (८६)। हे कालिके ! अनुद्दिष्ट व्यक्ति यदि धन बँटने के बाद भी आ जाय, तो स्त्री-पुत्र, धन उसी के होंगे (८७)। अंशी-गण की सम्मति के बिना पुरुष भी पैतृक स्थावर धन को स्वजन को या अन्य व्यक्ति को दान नहीं कर सकते (८८)। जो स्थावर, अस्थावर धन अपना उपार्जित है, उसे और पैतृक अस्थावर संपत्ति को स्वेच्छा- नुसार दान कर सकते हैं (८९)। पुत्र या पत्नी अथवा कन्या, दौहित्र या जनक, जननी किम्वा भाई या बहन के रहते भी जो स्थावर और अस्थावर धन अपना उपार्जित है तथा पैतृक सारा अस्थावर धन दान में दे सकता है (९०-९१)। इस प्रकार का धन पुरुष ऐसे दान में या अन्य किसी धर्म-कार्य में व्यय करे, तो उसके पुत्रादि उसे अन्यथा नहीं कर सकते (९२)। धर्मार्थ में लगाई संपत्ति की रक्षा धन-दाता ही करेगा, किन्तु उसे वह पुनः नहीं ले सकता क्योंकि धर्म ही उस धन का स्वामी है (९३)। हे अम्बिके ! स्वयं या प्रतिनिधि द्वारा सङ्कल्प के अनुसार मूल-धन या उप-स्वत्व को धर्मार्थ में लगाए (९४)। धनी व्यक्ति यदि स्नेह-वश किसी उत्तराधिकारी को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो उसे कोई अन्य व्यक्ति अन्यथा नहीं कर सकता (९५)। यदि उत्तराधिकारियों में से एक ही व्यक्ति को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो अन्य उत्तराधिकारी उसे रोक नहीं सकते (९६)। जहाँ
- १०० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र बहुत भाइयों में से एक भाई पैतृक धन द्वारा धन पैदा करता है, वहाँ उक्त पैतृक धन में ही सब भाइयों का अधिकार है; उपार्जित धन उपार्जन करनेवाले के सिवा अन्य किसी को नहीं मिलेगा (६७)। जो भाई पैतृक नष्ट द्रव्य का उद्धार करता है, वह उत्तराधिकारियों के बीच दो भाग पाएगा (६८)। शरीर-शून्य व्यक्ति को पुण्य, धन और विद्या नहीं मिलती। यह शरीर पितृ-संबंधी है, अतः कौन धन पैतृक नहीं है (६६) ? मानव-गण पृथक् अन्न, पृथक् धन वाले होकर भी जो कुछ उपार्जित करते हैं, वह सब पितृ-संक्रान्त है, अतः अपना उपार्जित , धन कैसे सम्भव है (१००) ? अतः हे महेश्वरि ! जो व्यक्ति अपने परिश्रम से जो धन उपार्जित करता है, वही - उसका उपार्जित है, वही उस धन का स्वामी है, अन्य कोई नहीं (१०१) । हे देवि ! माता, पिता, गुरु, पितामह या मातामह को हाथ से भी मारनेवाला व्यक्ति उनके धन का अधि- कारी नहीं होता (१०२)। अन्य किसी सम्बन्धी व्यक्ति का भी प्राण नाश करने पर वह विनष्ट व्यक्ति के धन को नहीं पाएगा, कोई अन्य उत्तराधिकारी उस व्यक्ति के धन का अधिकारी होगा (१०३)। हे अम्बिके ! नपुंसक और पंगु जीवन भर अन्न-वस्त्र पाएगा, धन का अधिकारी नहीं होगा (१०४) । मार्ग में या अन्य किसी स्थान पर किसी सस्वामिक धन के मिलने पर राजा विचार कर उस धन को पानेवाले के द्वारा धन-स्वामी को प्रदान करे (१०५) । अस्वामिक जीव या धन के मिलने पर, पानेवाला व्यक्ति ही उसका अधिकारी होगा, राजा को उसका दशमांश अर्पित करे (१०६) । योग्य क्रेता यदि पास में है, तो स्वामी स्थावर धन अन्य व्यक्ति को नहीं बेच सकता (१०७)। पास रहने- वाले क्रेताओं के बीच जाति या सवर्ण प्रशस्त है ; उनके अभाव में बन्धु । बहुत बन्धु यदि खरीदने के इच्छुक हों, तो विक्रेता की इच्छा ही मान्य है अर्थात् इच्छानुसार जिसे चाहे, उसे बेच सकता है (१०८) । दूसरा व्यक्ति यदि स्थावर धन का मूल्य निश्चित कर उसे खरीदने को तैयार हो और निकटस्थ व्यक्ति यदि वही मूल्य दे, तो वही खरीदार होगा, दूसरा व्यक्ति नहीं (१०६) । यदि निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देने में असमर्थ है या अन्य को बेचे जाने में सहमत है, तो गृहस्थ दूसरे व्यक्ति को भी बेच सकता है (११०) । हे देवि ! प्रवासी व्यक्ति के अज्ञातवास में यदि स्थावर संपत्ति कोई अन्य खरीद ले, तो सुनने पर वही मूल्य देकर प्रवासी उसे पुनः पा सकता है (१११) । किन्तु यदि क्रेता ने उसमें गृह, उपवन बना लिया हो या उसे भग्न किया हो, तो निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देकर भी स्थावर धन का नहीं पा सकता (११२) । जल या वन से निकाली हुई, अति दुर्गम, अनिवारित, भोग एवं राजस्व- शून्य भूमि को राजाज्ञा के बिना भी उपजाऊ बना सकते हैं (११३)। वह भूमि बहुत परिश्रम से भी तैयार की गई हो, तो भी उसमें उत्पन्न वस्तु का दशमांश राजा को देकर उसका भोग करे क्योंकि राजा ही सारी भूमि का स्वामी है (११४) । जिस स्थान में दूसरे का अनिष्ट हो सकता हो, वहाँ बावली, कुआँ, तालाब खोदना; वृक्ष लगाना या घर बनवाना निषिद्ध है (११५) । देवोद्देश से बने कुएँ और नदी का जल सभी पी सकते हैं और इन जलाशयों के निकट रहनेवाले उनसे सिंचाई करने के अधिकारी हैं (११६) । जिस जलाशय से सिंचाई करने से लोगों को जल की कमी अनुभव हो, उससे निकट के लोग भी सिंचाई नहीं कर सकते (११७) । अंशी लोगों की सम्मति के बिना अविभक्त सम्पत्ति को रेहन रखना या बेचना अवैध है। इसी प्रकार जिस सम्पत्ति का स्वामित्व या परि- माण निर्दिष्ट नहीं है, उसका बेचना या बन्धक रखना अप्रामाणिक होता है (११८) । बन्धक वस्तु को जानकर नष्ट करने पर राजा उस नष्ट करनेवाले व्यक्ति से उस वस्तु के स्वामी को उसका मूल्य दिलाए (११६)। बन्धक करनेवाले की सम्मति से बन्धक पशु आदि वस्तु को उपयोग में लानेवाला व्यक्ति ही उस पशु का पोषण करेगा (१२०) । जब कोई काल और लाभ के नियम की उपेक्षा कर लाभ के लिए स्थावर-अस्थावर सम्पत्ति को लगाएगा,
तेरहवां उल्लास : 'देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०१ तो वह लाभ अन्यथा होगा (१२१) । पिता की मृत्यु होने पर सभी भागीदारों की सम्मति के बिना सामान्य संपत्ति को नहीं लगाया जा सकता (१२२) । हे पार्वति ! यदि बहुमूल्य वस्तु कम मूल्य में या कम मूल्य की वस्तु बहुत मूल्य में बिके, तो राजा उसे अन्यथा करने में समर्थ है (१२३) । जिस प्रकार शरीर का जन्म और मरण एक ही बार होता है, उसी प्रकार दान और कन्या का ब्राह्म विवाह एक ही बार होता है (१२४) । जिसके एक ही पुत्र है, वह पुत्र का दान नहीं कर सकता ; जिसके एक ही स्त्री है, वह स्त्री का दान करने में समर्थ नहीं होता। जो पितरों का हित चाहता है, वह एक ही कन्या होने पर उसे शैव विवाह में नहीं दे सकता (१२५) । देव कार्य में, पितृ-कार्य में, वाणिज्य में—विशेषतः राज-द्वार में प्रतिनिधि जो कुछ करेगा, वह उसके नियुक्त करनेवाले का ही किया माना जायगा (१२६)। हे सुव्रते ! प्रतिनिधि को नियुक्त करनेवाले के दोष के लिए प्रतिनिधि या दूत दंडनीय नहीं है, यह नित्य विधि है (१२७) । ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में धर्म-सम्मत जो कुछ स्वीकार किया गया है, उसे करना होगा (१२८) । जगदीश्वर जगत् की रक्षा करते हैं। जो इस जगत् को नष्ट करना चाहते हैं, वे स्वयं विनष्ट हो जाते हैं। ईश्वर द्वारा पालित जगत् के रक्षकों की रक्षा जगदीश्वर करते हैं। अतः सदैव जगत् के हित में लगे रहना चाहिए (१२६) । ☸ ☸ ☸ तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि सभी निगमों के सार एवं स्वर्ग और मोक्ष के एकमात्र कारण-स्वरूप बातों के बतानेवाले देवदेव महेश्वर से कलि द्वारा मलीन जीवों की पवित्रता के लिए एकाग्र-चित्त त्रिभुवन-जननी पार्वती ने भक्ति-पूर्वक कहा (१) —महद्-योनि अर्थात् महत्-तत्त्व की उत्पादिका आदि-शक्ति अर्थात् मूल प्रकृति महा-द्युति एवं सूक्ष्म से भी सूक्ष्मा अर्थात् सर्वथा दुर्ज्ञेया 'महा-काली' का रूप-निरूपण किस प्रकार होगा (२) ? हे देव ! प्रकृति के कार्य का अर्थात् घट-पट आदि का ही रूप होता है, किन्तु 'महा-काली' साक्षात् परात्परा अर्थात् प्रकृति-रूपा है, अतः रूप होना असम्भव है। इस विषय में मुझे विशेष सन्देह है। हे देव ! आप मेरे इस संदेह को विशेष रूप से दूर करें (३) । श्रीसदाशिव ने कहा—हे प्रिये ! पहले ही बताया है कि उपासकों के कार्य के लिए गुण व क्रिया के अनुसार देवी का रूप कल्पित होता है (४) । हे शैलजे ! सफेद, पीले आदि रङ्ग जैसे काले रङ्ग में लुप्त हो जाते हैं, वैसे ही सभी भूत 'काली' में प्रविष्ट हैं (५) । इसी से उस निर्गुणा, निराकारा, योगियों की हित-कारिणी, काल-शक्ति का रङ्ग काला कहा गया है (६) । नित्या, काल-रूपा, अव्यया और कल्याण-रूपा इस 'काली' के मस्तक पर चन्द्र-कला का चिह्न अमृत को सूचित करता है (७) । नित्य-स्वरूप चन्द्र, सूर्य और अग्नि द्वारा काल- सम्भूत सारा जगत् दिखाई देता है, इसी से 'काली' के तीन नेत्र कल्पित हुए हैं (८) । सभी प्राणियों को ग्रास करने और काल-दंड द्वारा चबाने से सब प्राणियों का रक्त ही महेश्वरी के लाल वस्त्र से ज्ञात होता है (६) । हे शिवे ! समय-समय पर विपत्ति से जीवों की रक्षा करने और अपने-अपने कार्य में जीवों को प्रेरित करने की बात
१०२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र उनके वर और अभय से स्पष्ट होती है (१०) । हे भद्रे ! वे रजो गुण से उत्पन्न विश्व में रहती हैं, इसी से कहा है कि वे लाल कमल के आसन पर बैठी हैं (११) । ज्ञान-स्वरूपा, सब लोगों की साक्षि-स्वरूपिणी वे देवी मोह-मयी सुरा को पीकर क्रीडा करनेवाले काल से उत्पन्न जगत् को देखती हैं (१२) । अल्पबुद्धि भक्तों के हित के लिए उक्त प्रकार गुणानुसार उन भगवती के अनेक प्रकार के रूप कल्पित हुए हैं (१३) । श्री देवी ने कहा—जीवों के उद्धार के लिये आपने 'आद्या कालिका' का जो ध्यान बताया है, यदि उसी के अनुसार मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या धातु की मूर्ति बनाकर साधक व्यक्ति उसे वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कर सुन्दर घर बनाकर उसमें देवेशी को उस मूर्ति को स्थापित करे, तो उसका क्या फल होगा ? हे प्रभो ! किस विधि से उस मूर्ति की 'प्रतिष्ठा' करनी होगी, यह कृपया मुझे बताइए (१४-१६) । आपने पहले बावली, कुएँ, घर, उद्यान और देव-प्रतिमा की प्रतिष्ठा का उल्लेख किया है, किन्तु विशेष रूप से नहीं बताया है (१७) । हे परमेश्वर ! मैं आपके मुख से उनका विधान भी सुनना चाहती हूँ। यदि आपकी रुचि हो, तो कृपया बताइए (१८) । श्री सदाशिव ने कहा—हे परमेश्वरि ! तुमने जो जानना चाहा है, वह बहुत गोपनीय है। तुम्हारे स्नेह से मैं उसे बताता हूँ। तुम एकाग्र होकर सुनो (१६) । इस भू-मण्डल पर मनुष्य दो प्रकार के हैं—१. सकाम, २. निष्काम । निष्काम लोगों को मोक्ष-पद और कामी लोगों को जैसा फल मिलता है, वह कहता हूँ (२०) । हे प्रिये ! जो व्यक्ति जिस देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा करता है, वह उसी देवता के लोक को और उस लोक को भोग्य वस्तुओं को पाता है (२१) । मृण्मयी (मिट्टी की) प्रतिमा प्रतिष्ठित करनेवाला दस हजार कल्पों तक स्वर्ग में रहता है। लकड़ी, पत्थर और धातु की प्रतिमा का फल क्रमशः दस-दस गुना अधिक है अर्थात् लकड़ी की प्रतिमा से एक लाख कल्प तक स्वर्ग में रहता है इत्यादि (२२) । जो व्यक्ति देवता की प्रसन्नता के लिए या किसी कामना से ध्वज और वाहन के साथ तृण-काष्ठादि का घर बनाकर उत्सर्ग करता है या इस प्रकार के उत्कृष्ट घर का संस्कार कराता है, उसका पुण्य सुनो (२३) । हे परमेश्वरि ! जो व्यक्ति तृणादि से बने घर को दान करता है, वह बहुत हजार कोटि वर्षों तक देवलोक में रहता है (२४) । ईंट का बना गृह दान करने से इससे सौ गुना अधिक फल होता है । पत्थर के गृह-दान का फल इससे दस हजार गुना अधिक है (२५) । हे आद्ये ! सेतु और संक्रम (विशेष प्रकार का सेतु) बनानेवाले को यम-लोक नहीं देखना पड़ता । वह सुखपूर्ण देवलोक को पाकर स्वर्ग-वासियों के साथ आनन्द करता है (२६) । वृक्ष और उपवन की प्रतिष्ठा करने- वाला देव-लोक में जाकर कल्प-वृक्षों से युक्त दिव्य घर में रहता हुआ अपनी मनचाही सभी सुन्दर भोग्य वस्तुओं का उपभोग करता है (२७) । सब प्राणियों को प्रसन्नता के लिए जो जलाशय दान करता है, वह पापों से छूट- कर ब्रह्म-लोक को जाता है और उस जलाशय में जितनी बूँदें होती हैं, उतने सौ वर्षों तक वहाँ रहता है (२८) । हे देवि ! जो व्यक्ति देवता की प्रीति के लिए कोई वाहन देता है, वह उस देवता से रक्षित होकर उसी के लोक में चिरकाल तक रहता है (२६) । इस भू-मण्डल पर मिट्टी के वाहन देने का जो फल है, उसका दस गुना फल लकड़ी का वाहन दान करने से और प्रस्तर-वाहन के दान से उसका भी दस गुना अधिक फल होता है (३०) । पीतल, कांसे, ताम्बे आदि धातु से बने देव-वाहन के दान से क्रमशः सौ गुना अधिक फल होता है (३१) । श्रेष्ठ साधक भगवती के मन्दिर में 'महा-सिंह', शिव-मन्दिर में 'वृषभ' और विष्णु-मन्दिर में 'गरुड़' का निर्माण कराकर दान में देता है (३२) । जिसके सभी दाँत तीक्ष्ण हैं, मुख-मण्डल भीषण है, कन्धे केशरों से सुशोभित हैं, चार पैर हैं, नाखून वज्र के समान हैं—वह 'महा-सिंह' कहा जाता है (३३) । दो सींगें ही जिसके अस्त्र हैं, शरीर श्वेत वर्ण का है, चार पैर हैं, खुर काले रंग के हैं, बड़ा भारी ककुद है, पूंछ काली है, कन्धे
तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०३ श्याम रंग के हैं—वह 'वृषभ' कहलाता है (३४)। जिसकी जाँघ पक्षी के समान, मुख मनुष्य के समान, नाक लम्बी है और दो पंखों से युक्त अञ्जलि बनाकर जो दोनों पैरों को सिकोड़कर बैठा है—उसे 'गरुड़' कहते हैं (३५) । देवालय को ध्वज, पताका का दान करने से देवता को सौ वर्ष तक रहनेवाली प्रसन्नता होती है। बत्तीस हाथ ऊँचे रङ्ग-बिरंगे, सुदृढ़, छिद्र-रहित, देखने में सुन्दर, लाल वस्त्र से लपेटे हुए और आगे के भाग में विष्णु के चक्र से युक्त ध्वज-दण्ड का निर्माण करे (३६-३७)। ऐसे ध्वज-दण्ड के अगले भाग में सम्बन्धित देवता के वाहन के चिह्न से युक्त पताका लगाए। जिसका मूल-भाग प्रशस्त और अगला भाग सूक्ष्म है; जो सुन्दर वस्त्र से बनी ध्वज के आगे शोभा पाती है—वही 'पताका' कही जाती है (३८) । जो वस्त्र, अलङ्कार, पर्यङ्क, यान, सिंहासन, पान-पात्र, भोजन-पात्र, ताम्बूल-पात्र, पीकदान, मणि-मुक्ता- प्रवाल आदि रत्न और अन्य दूसरी अपनी प्रिय वस्तुएँ देवता को श्रद्धा-भक्ति के साथ दान करता है, वह उस देवता के लोक में पहुँचकर उन्हीं वस्तुओं का कोटि गुना फल पाता है (३६-४०) ! कामियों का फल स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षय होनेवाला होता है। निष्कामियों को पुनर्जन्म-रहित निर्वाण-मुक्ति मिलती है (४१) । जलाशय, गृह, आराम, सेतु, संक्रम, वृक्ष और देव-प्रतिष्ठा के समय 'वास्तु-दैत्य की पूजा' करे। जो वास्तु-पूजा न करके देव-प्रतिष्ठा आदि कर्म करता है, उसके उस कर्म में वास्तु-देव अपने गणों के साथ विघ्न डालते हैं। (४२-४३) । १. कपिलास्य, २. पिङ्ग-केश, ३. भीषण, ४. रक्त-लोचन, ५. कोटराक्ष, ६. लम्ब-कर्ण, ७. दीर्घ-जङ्घ, ८. महोदर, ६. अश्व-तुण्ड, १० काक-कण्ठ, ११. वज्र-बाहु, १२. वृतान्तक—इन सभी वास्तु- देव के गणों का यत्न-पूर्वक पूजन करे (४४-४५) । जिस मण्डल में वास्तुदेव की पूजा करनी चाहिए, उसे कहता हूँ, सुनो (४६) — वेदी या पानी से लिपी हुई किसी सम-तल भूमि पर वायु-कोण से ईशान-कोण तक एक हाथ लम्बी रेखा सूत्र-पात द्वारा बनाए (४७) । ईशान-कोण से अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण से नैर्ऋत-कोण तक और नैर्ऋत-कोण से वायु-कोण तक एक-एक रेखा बनाकर एक चतुष्कोण मण्डल बनाए (४८-४६) । हे देवि ! इस मण्डल के एक कोने से दूसरे कोने तक दो रेखाएँ खींचकर मण्डल को चार भागों में इस प्रकार बाँटे कि उस स्थल पर मछली के पूंछ के चार आकार बन जायँ (५०) । उक्त पुच्छ-मूल के भेद कर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा तक और उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा तक दो रेखाएँ खींचे (५१) । फिर कोण-रेखा-युक्त चतुष्कोणों में कर्णाकर्णि चार रेखाएँ और मध्य स्थल में पश्चिम से पूर्व तक और उत्तर से दक्षिण तक दो रेखाएँ खींचे (५२) । इस प्रकार उक्त मण्डल के सोलह कोष्ठ बनाकर पञ्च-वर्णों के चूर्ण द्वारा उत्तम यन्त्र की रचना करे (५३) । फिर मध्य के चतुष्कोण में एक सुन्दर चतु- र्दल-पद्म अङ्कित करे, जिसकी कर्णिका पीले और लाल रंग की तथा केशर लाल रंग की हो (५४) । तब पद्म के सभी दलों को सफेद या पीले रंग का करे। फिर पद्म के सन्धि-स्थानों को इच्छानुसार रंगों से भरे (५५) । तब ईशान कोण के कोष्ठक से आरम्भ कर बारह कोष्ठ क्रमशः श्वेत, कृष्ण, पीत, रक्त-इन चार रंगों से पूरे (५६) । हे प्रिये ! दक्षिणावर्त्त-क्रम से इन सभी कोष्ठों को पूरे। फिर वामावर्त्त-क्रम से उसमें देव-गण की पूजा करे (५७) । पहले विघ्न की शान्ति के लिए पद्म में वास्तु-दैत्य की और ईशान कोण से आरम्भ कर (वामावर्त-क्रम से) बारह कोष्ठों में कपिलास्य आदि दानवों की पूजा करे (५८) । तब कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि का संस्कार कर यथा-शक्ति आहुतियाँ देकर 'वास्तु-यज्ञ' समाप्त करे (५६) । हे देवि ! तुमसे यह मंगल-दायिनी 'वास्तु-पूजा' कही गई। इसके करने से मनुष्य वास्तु के विघ्नों से पीड़ित नहीं होता (६०) ।
१०४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र देवी ने कहा—हे नाथ ! वास्तु-देव का मण्डल और वास्तु-पूजा की विधि आपने बताई किन्तु वास्तुदेव का ध्यान आपने नहीं कहा। अब इसे प्रकट करें (६१)। श्री सदाशिव ने कहा--हे महेश्वरि ! वास्तु-राक्षस का ध्यान कहता हूँ, सुनो, जिसका अनुशीलन करने से सारी आपत्तियाँ तुरन्त नष्ट हो जाती हैं (६२)— चतुर्भुजं महा-कायं जटा-मण्डित-मस्तकम् । त्रिलोचनं करालास्यं हार-कुण्डल-शोभितम् ॥ लम्बोदरं दीर्घ-कर्णं लोमशं पीत-वाससम् । गदा-त्रिशूल-परशु-खट्वाङ्गं दधतं करैः ॥ असि-चर्म-धरैर्वीरैः कपिलास्यादिभिर्युतम् । शत्रूणामन्तकं साक्षादुद्यदादित्य-सन्निभम् ॥ ध्यायेद् देवं वास्तु-पतिं कूर्म-पद्मासन-स्थितम् । अर्थात् चतुर्भुज, विशाल-काय, जटा-जूट से विभूषित मस्तक, त्रिनेत्र, भयानक मुख, हार और कुण्डल से विभूषित, लम्बोदर, दीर्घ-कर्ण, लोमश, पीत-वस्त्र, चार हाथों में गदा, त्रिशूल, परशु और खट्वाङ्ग, खड्ग-चर्म-धारी, कपिलास्य आदि वीर-गणों से वेष्ठित, शत्रु-संहार-कारी, साक्षात् उदय होते हुए सूर्य के समान तेजस्वी, कूर्म के ऊपर पद्मासन पर बैठे हुए 'वास्तु-पति देव' का ध्यान करना चाहिए। महामारी, रोग, डाकिनी-भय, उपद्रव, सन्तान के दोष, सर्प या राक्षस-भय के होने पर उक्त प्रकार का ध्यान कर सपरिवार 'वास्तु-देव' को पूजा करे (६३-६७)। फिर तिल, घृत और पायस से होम करे, तो सभी बातों में शान्ति मिलती है। हे सुव्रते ! पूर्वोक्त कर्मों में जिस प्रकार 'वास्तु-पुरुष' पूज्य हैं, उसी प्रकार 'नव-ग्रह', 'दश-दिक्पाल' और 'ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, वाग्-देवी, लक्ष्मी, शङ्करी, मातृ-गण, गणेश' व 'वसु-गण' भी पूजनीय हैं। हे कालिके ! उक्त सभी कर्मों में यदि 'पितृ-गण' तृप्त नहीं हैं, तो कर्त्ता का सभी कुछ व्यर्थ जाता है और उसके पग-पग पर विघ्न आते हैं, अतः हे महेश्वरि ! यत्न करके उक्त संस्कार-कर्मों में और इसमें 'पितृ-गण' की तृप्ति के लिए 'आभ्युदयिक श्राद्ध' करें। अब सर्व-शान्ति-विधायक 'ग्रह-यन्त्र' बताता हूँ (६८-७२), जिसमें 'ग्रह-गण' और 'इन्द्रादि दिक्-पाल- गण' पूजित होकर वांञ्छित वर देते हैं (७३)। तीन त्रिकोण बनाकर उनके बाहर एक वृत्त बनाए। उस वृत्त के बाहर उससे लगे हुए आठ दल (पंखड़ियाँ) बनाए। उनके बाहर चार द्वारों सहित एक सुन्दर भूपुर बनाए (७४)। भूपुर के बाहर पूर्व और ईशान कोण के मध्य में प्रादेश बराबर एक वृत्त बनाए (७५)। फिर पश्चिम और नैर्ऋत कोण के मध्य में भी ऐसा ही एक और वृत्त बनाए (७६)। तब नव-ग्रह के रङ्गों द्वारा इस यन्त्र के नौ कोणों को भरे (७७)। मध्य त्रिकोण को दाईं और बाईं ओर क्रमशः श्वेत और पीत रंग भरे। उसका पीछे का भाग काला रंगे। अष्ट-दलों का अष्ट-दिक्-पाल के रङ्गों से भरे (७८)। श्वेत, रक्त और कृष्ण रंग के चूर्ण से भूपुर की प्राचीर रंगे। हे देवि ! भूपुर के बाहर स्थित प्रादेश-बराबर दोनों वृत्तों के ऊपर और बीच के भागों को क्रमशः रक्त और श्वेत रङ्ग का बनाए। सारे सन्धि-स्थानों को स्वेच्छानुसार रंग से भरे (७६-८०)। जिस प्रकोष्ठ में जिस ग्रह का और जिस दल में जिस दिक्-पाल की पूजा करनी है तथा जिस द्वार में जिस देवता की स्थिति है, उनका क्रम अब बताता हूँ, सुनो (८१) - मध्य कोण में 'सूर्य' की पूजा करे, उनके दोनों ओर 'अरुण' और 'शिखा' की पूजा करे। सूर्य के पीछे के भाग में 'प्रचण्ड' और 'उद्दण्ड' की पूजा करे (८२)। सूर्य के ऊर्ध्व-कोण में पूर्व-दिशा में 'चन्द्र' का, अग्नि-कोण में 'मङ्गल' की, दक्षिण दिशा में 'बुध' की, नैर्ऋत-कोण में 'बृहस्पति' को, पश्चिम दिशा में 'शुक्र' की, वायु-कोण में 'शनि' की, उत्तर-दिशा में 'राहु' को,
तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०५ ईशान-कोण में 'केतु' की और चन्द्र के चारों ओर 'नक्षत्र-मण्डल' की पूजा करे । (८३-८४) । १. 'सूर्य' रक्त-वर्ण, २. 'चन्द्र' श्वेत-वर्ण, ३. 'मङ्गल' अरुण-वर्ण, ४. 'बुध' पाण्डु-वर्ण, ५. 'बृहस्पति' पीत-वर्ण, ६ 'शुक्र' श्वेत-वर्ण, ७. 'शनि' कृष्ण-वर्ण, ८. 'राहु' और 'केतु' अनेक-वर्ण हैं । 'सूर्य' के दो हाथों में दो पद्म और दो हाथों में वर-अभय हैं- ऐसा उन्हें चार हाथों वाला ध्यान करे (८५) । 'चन्द्र' के दो हाथों में वर-मुद्रा और अमृत का ध्यान करे । 'मङ्गल' को कुछ कुबड़े शरीरवाला और दोनों हाथों से दण्ड लिए ध्यान करे । 'बुध' को बाल-रूप और ललाट पर गिरे हुए घुँघराले केशों सहित ध्यान करे (८६-८७) । 'बृहस्पति' को यज्ञोपवीत-युक्त और दो हाथों में पुस्तक और अक्ष-माला लिए ध्यान करे । 'शुक्र' का भी ध्यान ऐसा ही करे । शनि को काना और खञ्ज ध्यान करे (८८) । 'राहु' को विकृत, क्रूर-कर्मा मस्तक के रूप में और 'केतु' को, विकृत, क्रूर-कर्मा धड़ के रूप में ध्यान करे । उत्तम साधक उक्त प्रकार नौ ग्रहों का ध्यानपूर्वक पूजन कर अष्ट-दलों में पूर्वादि-क्रम से इन्द्रादि दिक्- पालों की पूजा करे । १. पीत-वर्ण 'इन्द्र' को सहस्राक्ष, ऐरावतारूढ़, पीले रेशम वस्त्र पहने, हाथ में वज्र लिए ध्यान कर उनकी पूजा करे । २. रक्त-वर्ण 'अग्नि' को छागारूढ़, हाथ में शक्ति लिए और ३. कृष्ण-वर्ण 'यम' को महिषारूढ़, हाथ में दण्ड लिए ध्यान करे । ४. श्याम-वर्ण 'निरृति' को अश्वारूढ़ खड्ग लिए; ५. शुक्ल-वर्ण 'वरुण' को मकरारूढ़, पाश लिए; ६ कृष्ण-वर्ण 'वायु' को मृगारूढ़, अंकुश लिए; ७. सुवर्ण-वर्ण 'कुबेर' को रत्न- सिंहासनारूढ़, यक्षों द्वारा स्तुत, पाश व अंकुश लिए; ८. शुक्ल-वर्ण 'ईशान' को वृषारूढ़, व्याघ्र-चर्म पहने, त्रिशूल व वर-मुद्रा लिए ध्यान करे (८६-६५) । इन सबकी ध्यानपूर्वक यथा-क्रम पूजा कर भूपूर के बाहर ऊर्ध्व और अधो वृत्त में क्रमशः 'ब्रह्मा' और 'अनन्त' की पूजा करे । तब द्वार-देवताओं को पूजा करे (६६) - १ उग्र, २ भीम, ३ प्रचण्ड, ४ ईश-ये चार पूर्व-द्वारी; १ जयन्त, २ क्षेत्रपाल, ३ नकुलेश, ४ बृहत्-शिरा - ये दक्षिण-द्वारी; १ वृक, २ अश्व, ३ आनन्द, ४ दुर्जय-ये पश्चिम-द्वारी; १ त्रिशिरा, २ पुरुजित, ३ भीमनाद, ४ महादेव-ये उत्तर-द्वारी हैं । ये सभी द्वार- देवता शस्त्रधारी हैं (६७-६८) । हे सुव्रते ! ब्रह्मा और अनन्त के ध्यान सुनो :- रक्तोत्पल-निभो ब्रह्मा चतुरास्यश्चतुर्भुजः । हंसारूढो वराभीति-माला-पुस्तक-पाणिकः ।। अर्थात् 'ब्रह्मा' रक्त-कमल के समान प्रभाववाले, चतुर्मुख, चतुर्भुज, हंस पर आसीन हैं और हाथों में वर, अभय, अक्षमाला व पुस्तक लिए हैं (६६-१००) । हिम-कुन्देन्दु-धवलः सहस्राक्षः सहस्र-पात् । सहस्र-पाणि-वदनो ध्येयोऽनन्तः सुरासुरैः ।। अर्थात् 'अनन्त' हिम, कुन्द, पुष्प और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल वर्णवाले, सहस्र-नेत्र, सहस्र-चरण, सहस्र-मुख हैं और सुर व असुरों द्वारा ध्येय हैं (१०१) । हे प्रिये ! ध्यान, पूजा-विधि और यन्त्र का वर्णन हो चुका । अब 'वास्तु' से लेकर 'अनन्त' तक सब देवों के मन्त्र भी सुनो (१०२)- १ वास्तु-मन्त्र-क्षाँ क्षीँ क्षूँ क्षैँ क्षौं क्षः । २ सूर्य-मन्त्र-ॐ ह्रीँ तिग्म-रश्मे आरोग्यदाय स्वाहा ३ सोम-मन्त्र-क्लीँ ह्रीँ ऐँ अमृत-कराऽमृतं प्लावय प्लावय स्वाहा ४ मङ्गल-मन्त्र-ऐँ ह्राँ ह्रीँ सर्व-दुष्टान् नाशय नाशय स्वाहा फा०-१४
१०६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र ५ बुद्ध-मन्त्र—ह्रीँ श्रीँ सौम्य सर्वान् कामान् पूरय स्वाहा ६ वृहस्पति-मन्त्र—ॐ ऐँ ॐ सुर-गुरो अभीष्टं यच्छ यच्छ स्वाहा ७ शुक्र-मन्त्र—शाँ शीँ शूं शैँ शौँ शः ८ शनि-मन्त्र—ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ सर्व-शत्रून् विद्रावय विद्रःवय मार्तण्ड-सूनवे नमः ९ राहु-मन्त्र—राँ ह्राँ भ्रौं ह्रीँ सोम-शत्रो शत्रून् विध्वंसय विध्वंसय राहवे नमः १० केतु-मन्त्र—हूँ ह्लूँ कैँ केतवे स्वाहा ११ दश-दिक्पाल-मन्त्र—१ लं इन्द्राय नमः, २ रं अग्नये नमः, ३ मृं यमाय नमः, ४ स्त्रूं निर्ऋतये नमः, ५ वं वरुणाय नमः, ६ यं वायवे नमः, ७ क्षं कुबेराय नमः, ८ ह्रौं ईशानाय नमः, ६ ब्रीं ब्रह्मणे नमः, १० अं अनन्ताय नमः। (१०३-१३) अन्य परिवार-देवताओं के नाम ही उनके मन्त्र हैं। जहाँ मन्त्र नहीं बताया है, वहाँ नाम ही मन्त्र होता है (११४)। जिस मन्त्र के अन्त में 'नमः' लगा है, उसमें 'नमः' न जोड़े। इसी प्रकार स्वाहान्त मन्त्र में 'स्वाहा' शब्द न जोड़े (११५)। नौ ग्रहों और दश दिक्पालों को उनके वर्ण के अनुरूप रङ्ग के पुष्प, वस्त्र व आभूषण दें अन्यथा वे प्रसन्न नहीं होते (११६)। ज्ञाना व्यक्ति कुशण्डिकोक्त विधि से वह्नि-स्थापन कर विविध पुष्पों व समिधा द्वारा होम करे (११७)। शान्ति और पुष्टि-कर्मों में 'वरद' नामक अग्नि, प्रतिष्ठा-कर्म में 'लोहिताक्ष' नामक और क्रूर कर्मों अर्थात् अभिचारादि म 'शत्रुहा' नामक अग्नि में होम करे (११८)। हे महेशानि ! शान्ति, पुष्टि व क्रूर कर्मों में 'ग्रह-याग' करने से अभीष्ट फल मिलता है (११६)। प्रतिष्ठा- कार्यों में जैसे देव-पूजा और पितृ-तर्पण अर्थात् आभ्युदयिक श्राद्ध कर्त्तव्य हैं वैसे ही वास्तु-याग और ग्रह-याग में भी करे (१२०)। यदि एक ही दिन दो-तीन प्रतिष्ठा व वास्तु-यागादि करने हों, तो उन सब कार्यों के लिए एक बार देव-पूजन, पितृ-श्राद्ध और अग्नि-संस्कार करे (१२१)। फल चाहनेवाले व्यक्ति जलाशय, गृह, उपवन, सेतु, संक्रम, वृक्ष, वाहन और अन्य दूसरी देय वस्तु को 'प्रोक्षण' किये बिना देवता को न दे (१२२-१२३)। सभी काम्य कर्मों में पूरा फल पाने के लिए विधि-वाक्य के अनुसार 'सङ्कल्प' करे (१२४)। शोधित और अर्चित द्रव्य का नामोल्लेख कर 'सम्प्रदाय' अर्थात् जिसे दान देना है, उसक नाम का उच्चारण कर दान करने से ठीक फल मिलता है (१२५)। जलाशय, गृह, उपवन, सेतु, संक्रम और वृक्ष के 'प्रोक्षण-मन्त्र' कहते हैं। इन सभी मन्त्रों का प्रयोग 'ब्रह्म-विद्या' अर्थात् गायत्री के साथ करे (१२६)। १ जलाशय-प्रोक्षण-मन्त्र—'जीवनाधार ! जीवानां जीवन-प्रद ! वरुण ! प्रोक्षणे तव तृ प्यन्तु जल- चर-भूचर-खेचराः ।।' अर्थात् हे जलाधार ! हे प्राणियों के जोवन-दाता ! हे वरुण ! तुम्हारे प्रोक्षण से जल-चर, भू-चर और खेचर सभी तृप्त हों (१२७)। २ गृह-प्रोक्षण-मन्त्र—'तृण-काष्ठादि-सम्भूत वासेय ! ब्रह्मणः प्रिय ! त्वां प्रोक्षयामि तोयेन प्रीतये भव सर्वदा ।।' अर्थात् हे तृण-काष्ठादि-सम्भूत रहने योग्य गृह ! हे ब्रह्मा के प्रिय ! तुम्हें जल से प्रोक्षित करता हूँ। सदा मुझे प्रसन्न रखो (१२८)। ईंट का गृह हो तो 'इष्ठकादि-सम्भूत' कहे (१२६)। ३ उपवन-प्रोक्षण-मन्त्र—'फलैः पत्रैश्च शाखाभिश्छायाभिश्च प्रियङ्कराः । यच्छन्तु मेऽखिलान् कामान् प्रोक्षितास्तीर्थ-वारिभिः ।' अर्थात् फल, पत्तों, डालियों और छायाओं द्वारा प्रसन्न करनेवाले हे उपवन ! तीर्थ-
तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि | १०७ जल से प्रोक्षित होकर मेरी सभी इच्छाओं को पूरा करो (१३०)। ४ सेतु-प्रोक्षण-मन्त्र—'सेतुस्त्वं भव-सिन्धूनां पारदः पथिक-प्रियः। मया संप्रोक्षितः सेतो ! यथोक्त- फलदो भव ।।' अर्थात् हे सेतु ! तुम ससार-सागर से पार करनेवाले, पथिकों के प्रिय हो। मुझसे प्रोक्षित होकर निर्दिष्ट फल-दाता बनो (१३१)। ५ संक्रम-प्रोक्षण-मन्त्र—'संक्रम ! त्वां प्रोक्षयामि लोकानां संक्रमं यथा । ददासीह तथा स्वर्गे संक्रमो मे प्रदीयताम् ।।' अर्थात् हे संक्रम ! तुम्हें प्रोक्षित करता हूँ। इस संसार में जैसे लोगों को पार करते हो, वैसे ही मुझे स्वर्ग में गति प्रदान करो (१३२) । हे प्रिये ! उपवन-प्रोक्षण-मन्त्र का ही प्रयोग वृक्ष के संस्कार में करे (१३३)। हे अम्बिके ! सर्व-साधारण द्रव्य के प्रोक्षण का मन्त्र है—ॐ वं फट् (१३४)। 'वाहन' यदि स्नान कराने योग्य हो, तो उसे गायत्री मन्त्र से स्नान कराये; स्नान कराने योग्य न हो, तो कुशाग्र से अर्घ्य-जल द्वारा उसे शोधित करे (१३५)। प्राण-प्रतिष्ठा कर उस 'वाहन' का नामोल्लेख कर, पूजाकर और सजाकर उसे देवता को प्रदान करे (१३६)। जलाशय की प्रतिष्ठा में जल-जन्तु के अधिपति 'वरुण देव', गृह-प्रतिष्ठा में 'ब्रह्मा प्रजापति' और उपवन, सेतु, संक्रम-प्रतिष्ठा में त्रिभुवन-रक्षक सर्वात्मा, सर्वज्ञ प्रभु 'विष्णु' पूजनीय हैं (१३७) । देवी ने कहा—विविध विधान आपने बताये हैं, किन्तु कर्मों का 'क्रम' नहीं बताया है (१३८) । क्रम- रहित कर्म बहुत प्रयत्न के साथ करने पर भी पूरा फल नहीं देता (१३६) । श्री सदाशिव ने कहा — हे परमेश्वरि ! माता के समान हित करनेवाली ! तुमने क्रमानुसार कार्य करने की जो बात पूछी है, वह लोगों के लिए बड़ी मङ्गलकारी है (१४०) । हे देवि ! 'वास्तु-याग' से लेकर उक्त सभी कार्यों के अनुष्ठान का क्रम मैं बताता हूँ (१४१)। पूर्व-दिन में आहार-संयम कर अगले दिन प्रातः स्नान करे । फिर पूर्वाह्न-कर्म सम्पन्न कर गुरु और नारायण की पूजा करे (१४२) । तब अपनो कामना का उल्लेख करते हुए विधिपूर्वक सङ्कल्प कर गणेशादि की पूजा करे (१४३) । गणेश का ध्यान— बन्धूकाभं त्रिनेत्रं द्विरद-वर-मुखं नाग-यज्ञोपवीतं, शङ्खं चक्रं कृपाणं विमल-सरसिजं हस्त-पद्मैर्दधानम् ॥ उद्यद्-बालेन्दु-मौलिं दिनकर-किरणोद्दीप्त-वस्त्राङ्ग-शोभं, नानालङ्कार-युक्तं भजत गण-पतिं रक्त-पद्मोपविष्टम् ॥ अर्थात् बन्धूक पुष्प के समान रक्त-वर्ण, त्रिनेत्र, गजेन्द्र-वदन, सर्प-मय-यज्ञोपवीत-धारी, चार कर-कमलों में शङ्ख, चक्र, खड्ग और खिला हुआ कमल लिए, उदोयमान बाल-चन्द्र से शोभित मस्तक, सूर्य की किरणों के समान उज्ज्वल वस्त्र और विविध आभूषणों से शोभित शरीर, रक्त कमल पर विराजमान गणपति का भजन करता हूँ (१४४)। इस प्रकार गणेश का ध्यान कर यथा-शक्ति उनकी पूजा करे। फिर ब्रह्मा-सरस्वती और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करे (१४५)। शिव, नव-दुर्गा, षोडश-मातृका और घृत-धारा से वसु-गण की पूजा कर आभ्युदयिक करे (१४६)। तब उक्त विधि के अनुसार वास्तु-राक्षस के मण्डल को बनाकर उसमें सपरिवार वास्तु-देव की पूजा करे (१४७)। फिर स्थण्डिल में पूर्ववत् अर्थात् कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि-संस्कार व धारा-होम तक के कर्म समाप्त
१०८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कर वास्तु-होम आरम्भ करे (१४८) । वास्तु को, वास्तु के परिवार-गण को और पूजित देवतादि को यथा-शक्ति आहुति देकर कर्म समाप्त करे (१४६) । वास्तु-याग में पृथक् भाव से कर्तव्य यह 'क्रम' तुमसे मैंने कहा। हे प्रिये ! ग्रह-यज्ञ में भी यही 'क्रम' विहित है। ग्रह-याग में ग्रहों को प्रधानता होने से अङ्ग-भाव में उनकी पूजा मना है, अतः सङ्कल्प के बाद अङ्ग-भाव से वास्तु-दैत्य की पूजा कर्तव्य है—यह विशेषता है (१५०-५१) । गणेशादि देव-पूजादि सभी कर्म वास्तु-याग के विधान के अनुसार होंगे। ग्रहादि के यन्त्र, मन्त्र और ध्यान पहले हो बताए हैं (१५२) । प्रसङ्ग- क्रम से ग्रह-याग और वास्तु-याग का 'क्रम' कहा जायगा। अब पूर्व-प्रस्तावित कर्मों में से 'कूप-संस्कार' की विधि कहता हूँ (१५३) । यथा-विधि सङ्कल्प कर मण्डल पर स्थापित घट या शालग्राम के मध्य में, जिसमें भी रुचि हो, वास्तु-पूजा करे (१५४) । तब गणपति, ब्रह्मा- सरस्वती, हरि-लक्ष्मी, शिव-दुर्गा की पूजा करे और नौ ग्रह, दश दिक्-पाल, मातृ-गण एवं अष्टवसु भी पूजनीय हैं। फिर पितृ-कार्य करे। 'कूप-संस्कार' में 'वरुण' की प्रधानता है, अतः उनकी पूजा विशेष रूप से करे (१५५- ५६) । यथा-शक्ति विविध उपहारों से 'वरुण' की पूजा कर यथा-विधि संस्कृत अग्नि में 'वरुण देवता' के लिए होम करे। पूजित देव-गण में से प्रत्येक को आहुति देकर पूर्णाहुति तक का सारा कार्य कर होम समाप्त करे (१५७-५८) । तब ध्वज-पताका-माल्य-चन्दन-सिन्दूर से चर्चित उत्तम जलाशय को पूर्वोक्त प्रोक्षण-मन्त्र से प्रोक्षित करे (१५६) । फिर अपनी कामना-पूर्ति के लिए या देवता को प्रीति के लिए सभी समयों में प्राणियों को प्रसन्न करनेवाले कृपादि जलाशय को उत्सर्ग करे (१६०) । श्रेष्ठ साधक हाथ जोड़कर प्रार्थना करे कि— सुप्रीयन्तां सर्व-भूता नभो-भू-तोय-वासिनः, उत्सृष्टं सर्व-भूतेभ्यो मयैतज्जालमुत्तमम् । तृप्यन्तु सर्व-भूतानि स्नान-पानावगाहनैः, सामान्यं सर्व-जीवेभ्यो मया दत्तमइदं जलम् । ये च केचिद् विपद्यन्ते स्व-स्व-कर्म-विपाकतः, तत्-पापेर्न प्रलिप्येऽहं सफलास्तु मम क्रिया ॥ अर्थात् खेचर, भूचर, जलचर—सभी प्राणी प्रसन्न हों, सभी प्राणियों के लिए मैं इस उत्तम जल को उत्सर्ग करता हूँ। सभी प्राणी स्नान, अङ्ग-प्रक्षालनादि, पान और अवगाहन कर तृप्त हों। मैं इस जल को सामान्यतः सब जीवों के लिए दान करता हूँ अर्थात् मैं इस भाव से दान करता हूँ कि इस पर सभी जीवों का समान अधि- कार हो। अपने-अपने कर्म-फल से जो कोई व्यक्ति इसमें देह-त्याग करें, उसके पाप में मैं लिप्त न होऊँ। मेरी क्रिया सफल हो। इसके बाद दक्षिणा तक कार्य कर शान्ति-कर्म करने के बाद ब्राह्मण, कौल और भूखे दरिद्र लोगों को भोजन कराए। हे शिवे ! सभी जलाशयों की प्रतिष्ठा का यही 'क्रम' है (१६१-६५) । तड़ागादि की प्रतिष्ठा में नाग, स्तम्भ और जलचर का भी निर्माण करना होता है (१६६) । मत्स्य, मण्डूक, मकर और कूर्म—ये सभी जल-जन्तु या जलचर कर्त्ता की सम्पत्ति के अनुसार धातु के बनवाये (१६७) । मत्स्य-मिथुन और मण्डूक-मिथुन स्वर्ण के, मकर-मिथुन रजत के, कूर्म-मिथुन ताम्र या पीतल के बनवाये (१६८) । इन सब जलचरों के सहित तड़ाग, दीर्घिका, या सागर का उत्सर्ग कर 'सुप्रीयन्तां ०' इत्यादि श्लोकों से प्रार्थना करे। फिर नाग-पूजा करे (१६६)— १ अनन्त, २ वासुकि, ३ पद्म, ४ महा-पद्म, ५ तक्षक, ६ कुलीर, ७ कर्कट, ८ शङ्ख—ये आठ नाग जल के रक्षक हैं (१७०) । आठ अश्वत्थ के पत्तों पर इन नागों के नाम लिखकर प्रणव और गायत्री का स्मरण करते हुए उन पत्तों को घट के मध्य में छोड़ दे (१७१) । चन्द्र और सूर्य को साक्षी कर घट के भीतर विलोडन कर एक
तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि | १०६ पत्ता बाहर निकाले। उस पत्ते में जिस नाग का नाम हो, उसी को जल का रक्षक बनाए (१७२)। तैल, हरिद्रा से लिप्त लकड़ी का एक सीधा, बीस हाथ लम्बा शुभ स्तम्भ लाकर व्याहृति और प्रणव का पाठ करते हुए उसे तीर्थ-जल से स्नान कराये। उस स्नापित स्तम्भ में ह्रीं, श्रीं, क्षमा और शान्ति के साथ नाग की पूजा करे (१७३-७४) । फिर प्रार्थना करे- नाग ! त्वं विष्णु-शय्याऽसि महादेव-विभूषणम् । स्तम्भमेनमधष्ठाय जल-रक्षां कुरुष्व मे । अर्थात् हे नाग ! तुम विष्णु की शय्या और महादेव के अलङ्कार हो। इस स्तम्भ में स्थान बनाकर मेरे जल की रक्षा करो (१७५) । इसके बाद उस नागाधिष्ठित स्तम्भ को जलाशय के मध्य में स्थापित कर कर्त्ता तड़ाग की प्रदक्षिणा करे (१७६)। यह स्तम्भ यदि पहले से स्थापित हो, तो नाग की पूजा घट में कर उस घट का जल तड़ाग में छोड़कर शेष कर्म समाप्त करे (१७७) । इसी प्रकार गृह-प्रतिष्ठा में भी सङ्कल्प कर वास्तु-पूजा से वसु-धारा और आभ्युदयिक तक के कर्म कर वरुण के स्थान पर 'प्रजापति देव' की विशेष रूप से पूजा करे और प्राजापत्य होम करे (१७८-७६)। पूर्वोक्त मन्त्र से गृह को प्रोक्षित और गन्धादि से अर्पित कर ईशान कोण की ओर मुख कर हाथ जोड़ प्रार्थना करे (१८०)- प्रजा-पति-पते गेह ! पुष्प-माल्यादि-भूषितः । अस्माकं शुभ-वासाय सर्वथा सुखदो भव ।। अर्थात् हे प्रजापति-स्वामी के गृह ! तुम पुष्प-माल्यादि से भूषित होकर मेरे शुभ आवास के लिए सब प्रकार से सुखदायक हो (१८१) । तब दक्षिणा तक कर्म कर शान्ति और आशीर्वाद करे। अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मण, कौल और दरिद्रों को भोजन कराये (१८२) । हे शैलजे ! यदि दूसरे के लिए गृह-प्रतिष्ठा हो, तो सङ्कल्प में 'अमुकस्य वासाय' अर्थात् 'अमुक (नामोल्लेख करे) के वास के लिए' ये शब्द जोड़ ले। देवता के लिए निर्मित गृह की प्रतिष्ठा की विधि सुनो (१८३)। उक्त प्रकार गृह-संस्कार कर शंख-तूर्यादि वाद-ध्वनि करते हुए देवता के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (१८४)- उत्तिष्ठ देव-देवेश ! भक्तानां वाञ्छित-प्रद ! आगत्य जन्म-साफल्यं कुरु मे करुणा-निधे ।। अर्थात् हे देव-देवेश ! हे भक्त के अभीष्ट को देनेवाले ! हे दयासागर ! उठिये, आकर मेरे जन्म को सफल बनायें (१८५) । इस प्रकार प्रार्थना कर साधक देवता को गृह के समीप लाकर स्थापन-पूर्वक उसके सम्मुख भाग में वाहन की स्थापना करे (१८६)। गृह के ऊपर त्रिशूल या चक्र स्थापित मन्दिर के ईशान-कोण में पताका-युक्त ध्वजा- रोपण करे (१८७) ! चन्द्रातप, क्षुद्र घण्टे, पुष्प-माल्य और आम्र-पल्लवों से गृह को अच्छी तरह सजाकर दिव्य वस्त्र द्वारा आच्छादन करे (१८८) । आगे बताई विधि से विहित द्रव्यों से उत्तराभिमुख स्थापित देव क, स्नान कराये (१८६)- १. दुग्ध-स्नान- 'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं दुग्धेन स्नापयामि त्वां मातेव परिपालय' अर्थात् दुग्ध से तुम्हें स्नान कराता हूँ, माता के समान मेरा पालन करो-इस मन्त्र से देवता को दूध से स्नान कराए। २. दधि-स्नान - 'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं दध्ना त्वां स्नापयाम्यद्य भव-ताप-हरो भव' अर्थात् दही से तुम्हें आज स्नान कराता हूँ, संसार के दुःख-हारी बनो-इस मन्त्र से देवता को दही से स्नान कराए। ३. मधु-स्नान- 'ऐं ह्रीं श्री मूलं मधुना स्नापितः प्रीतो मामानन्द-मयं कुरु' अर्थात् मधु से स्नान कर
११० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रसन्न हो, मुझे आनन्द-मय करो—इस मन्त्र से देवता को मधु से स्नान कराये । ४. घृत-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं सावित्रीं ॐ देव-प्रियेण हविषा आयुः शुक्रेण तेजसा । स्नानं ते कल्प- यामीश ! मामरोगं सदा कुरु' अर्थात् हे ईश ! देव-प्रिय, आयु, वीर्य और तेज-स्वरूप घृत से तुम्हें स्नान कराता हूँ, मुझे सदा नीरोग रखो—इस मन्त्र से देवता को घृत से स्नान कराये (१६०-६३) । ५. शर्करा-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं व्याहृतिं गायत्रीं देवेश ! शर्करा-तोयैः स्नातो मे यच्छ वांछितम्' अर्थात् हे देवेश ! शर्करा-जल से स्नान कर मुझे मेरा अभीष्ट फल प्रदान करो —इस मन्त्र से देवता को शर्करा-जल से स्नान कराये (१६४) । ६. नारिकेल-स्नान—'ऐं ह्रीं श्रीं मूलं गायत्रीं वं विधात्रा निर्मितैर्दिव्यैः प्रियैः स्निग्धैरलौकिकैः, नारि- केलोदकैः स्नानं कल्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् ब्रह्मा द्वारा निर्मित दिव्य, प्रिय, स्निग्ध और अलौकिक नारि- केल-जल से तुम्हें स्नान कराता हूँ, तुम्हें नमस्कार है—इस मन्त्र से देवता को नारिकेल-जल से स्नान कराये । ७. इक्षु-स्नान—'गायत्रीं मूलं इक्षुजैः रसैः स्नापयामि' मन्त्र से ईख के रस से देवता को स्नान कराये । ८. कर्परा स्नान—'क्लीं ॐ गायत्रीं मूलं कर्पूरागुरु-काश्मीर-, स्तूरी-चन्दनोदकैः, सुस्नातो भव सुप्रीतो भुक्ति-मुक्ती प्रय ' अर्थात् कपूर, अगुरु, कुंकुम कस्तूरी और चन्दन-युक्त जल से सुस्नात होकर प्रसन्न हों ओर मुझे भोग व मोक्ष प्रदान करें—इस मन्त्र से उक्त प्रकार सुगन्धित जल से देवता को स्नान कराये (१६५-६७) । इस प्रकार आठ कलशों से स्नान कराकर जगत्पति को मन्दिर के भीतर लाकर आसन के ऊपर स्थापित करे (१६८) । देव-प्रतिमा यदि स्नान कराने योग्य न हो, तो यन्त्र में या देवता के मूल-मन्त्र में या शालग्राम शिला में स्नान कराकर पूजा करे (१६६) । दुग्धादि से उक्त प्रकार स्नान कराने में यदि असमर्थ हो, तो यथा-शक्ति शुद्ध जल से भरे हुए आठ, सात या पाँच कलश द्वारा स्नान कराये (२००) । चक्र-पूजा के प्रसङ्ग में कलश का परिमाण बताया है, आगमोक्त सभी कर्मों में उसी प्रकार का घट विहित है (२०१) । इसके बाद अपनी-अपनी पूजा-विधि के अनुसार महादेव की पूजा करे । उस पूजा के सभी उपचारों को बताता हूँ, हे परात्परे ! सुनो (२०२) —१. आसन, २, स्वागत, ३. पाद्य, ४. अर्घ्य, ५. आचमनीय, ६. मधु- पर्क, ७. पुनः आचमनीय, ८. स्नानीय, ६. वस्त्र, १०. भूषण, ११. गन्ध, १२. पुष्प, १३. धूप, १४. दीप, १५. नैवेद्य और १६. वन्दना—ये षोडश उपचार देव-पूजा में कहे हैं (२०३-४) । १. पाद्य, २. अर्घ्य, ३. आच- मन, ४. मधुपर्क, ५. पुनः आचमन, ६. गन्ध, ७. पुष्प, ८. धूप, ६. दीप, १०. नैवेद्य—ये 'दशोपचार' माने गए हैं (२०५) । १. गन्ध, २. पुष्प, ३. धूप, ४. दीप और ५. नैवेद्य—ये 'पञ्चोपचार' कहे हैं (२०६) । 'फट्' मन्त्र से अर्घ्य-पात्र के जल से अभिषेक कर धेनु-मुद्रा दिखाने के बाद गन्ध-पुष्प से पूजा कर देय द्रव्य का नामोल्लेख करे (२०७) । आगे बताए मन्त्र और मूल-मन्त्र का स्मरण कर चतुर्थी विभक्ति-युक्त देव-नाम का उच्चारण कर त्यागार्थ वचन का पाठ करे (२०८) । देवता के लिए देय सभी वस्तुओं के निवेदन को यहीं विधि है; इसी के अनु- सार देवता को द्रव्य प्रदान करे (२०६) । आद्या की पूजा-विधि में पाद्य, अर्घ्यादि देने और कारणादि के अर्पण करने का विधि बताई जा चुकी है (२१०) । वहाँ जो मन्त्र नहीं बताए हैं, उन्हें यहां बताता हूँ, सुनो । आसनादि उपचारों के देने में इन्हीं का प्रयोग करे (२११)— १. आसन—'सर्व-भूतान्तरस्थाय सर्व-भूतान्तरात्मने कल्पयाम्युपवेशार्थमासनं ते नमो' नमः अर्थात् सब प्राणियों के अन्तर में स्थित और सब प्राणियों के अन्तरात्मा-स्वरूप तुम्हें बैठने हेतु आसन देता हूँ । तुम्हें
तेरहवां उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १११ बारम्बार नमस्कार (२१२) । २ स्वागत--हाथ जोड़कर स्वागत की प्रार्थना करे : 'देवाः स्वाभीष्ट-सिद्धयर्थं यस्य वाञ्छन्ति दर्शनं, सुस्वागतं स्वागतं मे तस्मै ते परमात्मने । अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सफलाः क्रियाः, स्वागतं यत् त्वया तन्मे तपसां फलमागतम्' अर्थात् सभी देवता अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए जिनके दर्शन की चाह करते हैं, उन तुम परमात्मा का मैं स्वागत करता हूँ। आज मेरा जन्म, जीवन और सारा कर्म सफल है क्योंकि तुम्हारे स्वागत के रूप में मेरी तपस्या का फल ही मुझे मिला है (२१३-१५) । ३. पाद्य—विहित पाद्य जल को लेकर कहे : 'यत्पाद-जल-संस्पर्शाच्छुद्धिमाप जगत्-त्रयं, तत्-पादाब्ज- प्रोक्षणार्थं पाद्यं ते कल्पयाम्यहम्' अर्थात् जिन चरणों के जल के स्पर्श से तीनों लोक शुद्ध होते हैं, उन तुम्हारे चरणों के धोने हेतु मैं तुम्हें पाद्य देता हूँ (२१६-१७) । ४. अर्घ्य—परमानन्द-सन्दोहो जायते यत्-प्रसादतः, तस्मै सर्वात्म-भूताय आनन्दाघ्यं समर्पये' अर्थात् जिनकी प्रसन्नता से परमानन्द-परम्परा होती है, सबकी आत्मा-स्वरूप उन तुमको मैं अर्घ्य देता हूँ (२१८) । ५. आचमनीय—प्रोक्षित और चर्चित जातो-लवङ्ग-कक्कोल से सुगन्धित जल या केवल शुद्ध जल लेकर कहे : 'यदुच्छिष्टमुपस्पृष्टं शुद्धिमेत्यखिलं जगत्, तस्मै मुखारविन्दाय आचामं कल्पयामि ते' अर्थात् जिसके जूठे के स्पर्श से सारा जगत् शुद्धि को प्राप्त करता है, तुम्हारे उसी मुख-कमल के लिए मैं आचमन देता हूँ (२१६-२०) । ६. मधुपर्क—मधुपर्क को लेकर भक्ति-पूर्वक उसे आगे के मन्त्र से अर्पित करे : 'ताप-त्रय-विनाशार्थम- खण्डानन्द-हेतवे, मधुपर्कं ददाम्यद्य प्रसीद परमेश्वर' अर्थात् तीनों दुःखों के नाश के लिए अखण्डानन्द के कारण-स्वरूप तुम्हें मधुपर्क देता हूँ। हे परमेश्वर, प्रसन्न होओ (२२१-२२) । ७. पुनराचमनीय—'अशुचिः शुचितामेति यत्-स्पृष्ट-स्पर्श-मात्रतः, तस्मिंस्ते वदनाम्भोजे पुनराचम- नीयकम्' अर्थात् जिससे छुए के स्पर्श मात्र से अपवित्र भी पवित्र हो जाता है, तुम्हारे उसी मुख-कमल में पुनः आचमन अर्पित है (२२३) । ८. स्नानीय—स्नान हेतु पूर्ववत् प्रोक्षित और चर्चित जल देवता के सामने रखकर कहे : 'यत्-तेजसा जगद् व्याप्तं यतो जातमिदं जगत्, तस्मै ते जगदाधार ! स्नानार्थं तोयमर्पये' अर्थात् जिनके तेज से जगत् व्याप्त है, जिनसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है, हे जगदाधार ! उन्हीं तुमको स्नान के लिए जल देता हूँ (२२४-२५) । स्नान, वस्त्र और नैवेद्य देने के बाद आचमन देना चाहिए । अन्य द्रव्यों के देने के बाद एक-एक बार जल छोड़ना चाहिए (२२६) । ६. वस्त्र—दो वस्त्र लेकर पूर्ववत् शोधित कर दोनों हाथों में उन्हें उठाकर कहे : सर्वावरण-हीनाय माया- प्रच्छन्न-तेजसे, वाससी परिधानाय कल्पयामि नमोऽस्तु ते' अर्थात् सब प्रकार के आवरणों से रहित, अविद्या से छिपे हुए तेजवाले तुम्हारे लिए उत्तरीय के साथ वस्त्र देता हूँ, तुम्हें नमस्कार (२२७-२८) । १०. आभूषण—स्वर्ण, रोप्य आदि के बने विविध आभूषणों का प्रोक्षण और अर्चन कर कहे : 'विश्वा- भरण-भूताय विश्व-शोभैक-योनये, माया-विग्रह-भूषार्थं भूषणानि समर्पये' अर्थात् विश्व के आभूषण-स्वरूप एवं विश्व को शोभा के एकमात्र कारण, तुम्हारे माया-मय शरीर के सजाने हेतु आभूषण देता हूँ (२२६-३०) । ११ गन्ध—'गन्ध-तन्मात्रया सृष्टा येन गन्ध-धरा धरा, तस्मै परात्मने तुभ्यं परमं गन्धमर्पये' अर्थात् जिनके द्वारा गन्ध-तन्मात्रा से गन्धवती पृथ्वी रची गई है, उन्हीं परात्मा-स्वरूप तुम्हें परम गन्ध देता हूँ (२३१) । १२ पुष्प—'पुष्पं मनोहरं रम्यं सुगन्ध देव-निर्मितं, मया निवेदितं भक्त्या पुष्पमेतत् प्रगृह्यताम्'