भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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२. राजेन्द्रलाल मित्र की संस्कृत पुस्तकें, सं० २८९-आद्या-सदा-शिव के संवाद-रूप में। पूर्व- काण्ड मात्र, जिसमें १४ उल्लास हैं। विषय हैं-भगवती आद्या महादेव से 'जीवों के निस्तार' का उपाय पूछती हैं, भगवान् शिव उपाय बताते हैं-पर-ब्रह्म की उपासना, प्रकृति की साधना, देवी का दशाक्षर- मन्त्र, कलश-स्थापना, तत्त्व-संस्कार, श्रीपात्र-स्थापना, होम, चक्रानुष्ठान, कुल-तन्त्र, वर्णाश्रम के आचार, कुश-कण्डिका, दस संस्कार, वृद्धि-श्राद्ध, अन्त्येष्टि, पूर्णाभिषेक, अनिष्ट-कारी पापों का प्रायश्चित्त आदि। ३. वङ्गीय साहित्य परिषद् सूची-पत्र, सं० १२९-अपूर्ण। ४. कलकत्ता संस्कृत कालेज पुस्तकालय, सूची-पत्र सं० ५५-आद्या-सदा-शिव के संवाद- रूप में उत्तरार्द्ध मात्र, जिसमें १४ उल्लास हैं। विषय हैं-१. कलियुग में पतित जीवों का उद्धार कैसे हो, २. परम-ब्रह्मोपासना, ३. उपासना-विधि, ४. प्रकृति-साधना, ५. मन्त्रों के उद्धार, संस्कार आदि, ६. पात्र-स्थापन, होम, चक्रानुष्ठान, ७. कुल-तत्त्व, ८. वर्णाश्रम के आचार, ९. कुश-कण्डिका, दश संस्कार, १०. पूर्णाभिषेकादि, ११. अपने, पराए पापों का प्रायश्चित्त, १२. सनातन व्यवहार, १३. वास्तु, गृह-याग, १४. शिव-लिङ्ग-स्थापनादि। ५. जम्मू काश्मीर महाराजा पुस्तकालय सूची-पत्र, सं० १०६६-सदा-शिव-प्रोक्त। ६. राजस्थान पुरातत्त्व ग्रन्थ-सूची, सं० ६२६२-मात्र पूर्व-काण्ड। कविराज जी ने यह भी सूचित किया है कि 'प्राण-तोषिणी तन्त्र' और 'सर्वोल्लास तन्त्र' में 'महा-निर्वाण तन्त्र' के वचनों को उद्धृत किया गया है, किन्तु 'सर्वोल्लास' में उद्धृत वचन प्रकाशित 'महा-निर्वाण तन्त्र' में नहीं पाए जाते। प्रकाशित संस्करण 'आगम अनुसन्धान समिति कलकत्ता' के द्वारा सन् १९१८ में प्रकाशित 'महा-निर्वाण तन्त्र' की भूमिका में आर्थर एबेलॉन (सर जॉन वुडरफ) ने इस तन्त्र के प्रकाशित संस्करणों का जो विवरण दिया है, उसके अनुसार आठ संस्करणों का परिचय निम्न प्रकार है- १. 'महा-निर्वाण तन्त्र' का प्रथम खण्ड, जिसमें चौदह उल्लास हैं, पहले पहल 'आदि ब्राह्म समाज' द्वारा सन् १८७६ में प्रकाशित हुआ। उसके सम्पादक थे श्री आनन्दचन्द्र वेदान्त-वागीश। इस खण्ड की संस्कृत-टीका स्वामी हरिहरानन्द भारती द्वारा की गई थी, जिसकी पाण्डुलिपि उनके शिष्य राजा राममोहन राय के हाथ की लिखी उपलब्ध थी। उसे भी मूल के साथ प्रकाशित किया गया। २. इसके बाद इस तन्त्र का मूल मात्र सन् १८८६ में श्रीकृष्णगोपाल भक्त ने प्रकाशित किया। इस संस्करण के सम्पादक थे श्री जगन्मोहन तर्कालङ्कार। इसमें भारती की उक्त टीका के साथ वङ्गानुवाद और तर्कालङ्कार की व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ भी प्रकाशित हुईं। ३. इसी वर्ष अर्थात् सन् १८८६ में वाराणसी की दण्डी-सभा के श्री शाक्तानन्द सरस्वती द्वारा (छ:)

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