भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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७० । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र भद्रे ! किं त्वं पिबसि ? अर्थात् हे भद्रे ! तुम क्या पीती हो (१२१) ? इस पर पत्नी तीन बार कहे — ह्रीं पुंसवनम् । अर्थात् पुत्र-प्रसव के लिए भूत वस्तु पीती हूँ। तब पत्नी तीन प्रसृति यव और माष-युक्त दधि का पान करे (१२२)। इसके बाद जीवित पुत्रोंवालो स्त्रियों के साथ पत्नी को पति याग-स्थान में लावे और अपनी बाईं ओर उसे बैठाकर चरु-होम आरम्भ करे (१२३)। पहले पूर्व-वत् चरु लेकर 'रक्षोघ्न' हुताशन का ध्यानकर रुद्र और प्रजापति का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से बारह आहुतियाँ प्रदान करे (१२४-२६)— ह्रीं हूं ये गर्भ-विघ्न-कर्त्तारो ये च गर्भ-विनाशकाः। भूताः प्रेताः पिशाचाश्च वेताला बाल-घातकाः। तान् सर्वान् नाशय नाशय गर्भ-रक्षां कुरु कुरु स्वाहा ॥ अर्थात् गर्भ में विघ्न करनेवाले और गर्भ को नष्ट करनेवाले जो-जो भूत-प्रेत-पिशाच-वेताल तथा बाल- घाती हैं, उन सबका नाश करो, गर्भ की रक्षा करो। इसके बाद निम्न मन्त्र से ५ आहुतियाँ दे— ह्रीं चन्द्रमसे स्वाहा। तब पत्नी के हृदय को स्पर्श कर माया-लक्ष्मी अर्थात् 'ह्रीं श्रीं' मन्त्र का १०० बार जप करे (१२७)। फिर स्विष्टकृत-होम कर प्रायश्चित्त-होम द्वारा 'पुंसवन'-कर्म समाप्त करे। पाँचवें महीने में पत्नी को पञ्चामृत प्रदान करे (१२८)। शर्करा, मधु, दुग्ध, घृत और दधि—सम-भाग इन पाँच द्रव्यों को 'पञ्चामृत' कहते हैं। यह देह-शुद्धि के लिए विहित है (१२६)। हे शिवे ! पति इन पाँचों द्रव्यों में से प्रत्येक द्रव्य के ऊपर वाग्भव 'ऐं', मदन 'क्लीं', लक्ष्मी 'श्रीं', माया 'ह्रीं', कूर्च 'हूँ' और इन्द्र 'लं'—अर्थात् 'ऐं क्लीं श्रीं ह्रीं हूँ लं' इन बीजों का पाँच-पाँच बार जप कर पञ्चामृत बनाकर पत्नी को पाँचवें महीने में पिलाये (१३०)। छठे या आठवें मास में 'सीमन्तोन्नयन' करे। जब तक सन्तान का जन्म न हो, तब तक की अवधि के मध्य में 'सीमन्तोन्नयन' करना चाहिए (१३१)। ज्ञानी पति पूर्वोक्त धारा-होम तक के कर्म कर पत्नी-सहित आसन पर बैठकर क्रमशः तीन आहुतियाँ निम्न मन्त्रों से प्रदान करे (१३२)— विष्णवे स्वाहा । भास्वते स्वाहा । धात्रे स्वाहा । फिर चन्द्रमा का ध्यान कर 'शिव' नामक हुताशन में चन्द्र के लिए सात बार आहुतियाँ दे (१३३)। हे शिवे ! दोनों अश्विनीकुमारों, इन्द्र, विष्णु, शिव, दुर्गा, प्रजापति—इन सबका ध्यान कर प्रत्येक को पाँच-पाँच आहुतियाँ दे (१३४)। तब पति दाएँ हाथ में स्वर्ण कङ्कतिका (कंघी) लेकर उसे सीमन्त (माँग) से लेकर बंधे हुए केश-पाश (जूड़े) में प्रविष्ट करे (१३५)। शिव, विष्णु और ब्रह्मा का ध्यान कर निम्न मन्त्र को पढ़े— ह्रीं भार्य्ये कल्याणि सुभगे ! दशमे मासि सुव्रते ! सुप्रसूता भव प्रोता प्रसादाद् विश्व-कर्मणः ॥ आयुष्मतो कङ्कतिका वर्चस्वी ते शुभं कुरु । अर्थात् हे आर्ये ! हे कल्याणि ! हे सुभगे ! हे सुव्रते ! तुम दसवें मास में उत्तम सन्तान को जन्म देकर प्रसन्न और आयुष्मती होओ और विश्वकर्मा के प्रसाद से कङ्कतिका (कंधी) तुम्हारे तेज को बढ़ाये। तुम शुभ कार्य का अनुष्ठान करो (१३६-३७)।

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