भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 139 में से

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पृष्ठ 81

नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ७१ तदनन्तर स्विष्ट-कृत होमादि द्वारा कर्म समाप्त करे (१३८) । सन्तान उत्पन्न होते ही घोर व्यक्ति सुवर्ण देकर पुत्र-मुख को देखकर सूतिका-गृह से भिन्न किसी अन्य गृह में पूर्वोक्त विधि से धारा-होम समाप्त करे (१३६)। फिर अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, विश्वदेव-गण और ब्रह्मा के लिए पाँच आहुतियाँ प्रदान करे । तब पिता कांस्य-पात्र में मधु और घृत बराबर-बराबर लेकर उस पर वाग्भव 'ऐं' बीज का १० बार जप कर दाएँ हाथ की अनामिका द्वारा निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए पुत्र को उसे चटाये (१४०-४१)— आयुर्वर्चो बलं मेधा वर्धतां ते सदा शिशो । अर्थात् हे शिशो ! तुम्हारी आयु, तेज, बल और मेधा में निरन्तर वृद्धि हो (१४२) । इस प्रकार आयुष्यकर कार्य कर बालक का एक गुप्त नाम रखे । पुत्र के लाए जाने पर उसी नाम से उसे बुलाए (१४३) । इसके बाद प्रायश्चित्तादि होम कर जात-कर्म पूर्ण करे । तब धात्री उत्साह-पूर्वक नारी-छेदन करे (१४४) । जब तक नाड़ी-छेदन नहीं होता, तब तक शौच की बाधा नहीं होती अर्थात् अशौच नहीं होता । अतः नाड़ी-छेदन के पूर्व देवी और पैत्री क्रिया करता रहे (१४५) । कन्या के भी ये सभी कर्म अमन्त्रक करे । छठे या आठवें मास में प्रकाश्य 'नामकरण' करे (१४६) । 'नामकरण' के समय माता शिशु पुत्र को स्नान कराकर उत्तम दो वस्त्र पहनाकर पति के पास लाए और उसे पूर्व-मुख करके बैठाए (१४७) । फिर पिता सुवर्ण-सहित कुशोदक द्वारा शिशु के मस्तक पर निम्न तीन मन्त्रों से जल छिड़के— जाह्नवी यमुना रेवा सु-पवित्रा सरस्वती । नर्मदा वरदा कुन्ती सागराश्च सरांसि च । एते त्वामभिषिञ्चन्तु धर्म-कामार्थ-सिद्धये ॥१ ह्रीं आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन महे रणाय चक्षषे ॥२ ह्रीं यो वः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेऽन ऊष तीखि मातरः । तस्मा अरङ्ग माम वोयस्य क्षयाय-जिन्वथ आपो जनयथा च नः ॥३ अर्थात्-१. गङ्गा, यमुना, रेवा, सुपवित्रा सरस्वती, नर्मदा, वरदा, कुन्ती, सभी सागर और सभी सरोवर —ये सब धर्म-काम-अर्थ की सिद्धि के लिए तुम्हारा अभिषेक करें (१४८-१४६) । २. हे जल ! तुम सुख-दाता हो, अतः हमारे लिए इस समय अन्न की व्यवस्था और पर-काल में पर-ब्रह्म से हमारा मिलन कराओ (१५०) । ३. माता के समान स्नेह-युक्त तुम हम लोगों को मङ्गलकारी रस का अधिकारी बनाओ । हे सभी जल ! तुमने जिस रस द्वारा जगन्मण्डल को व्याप्त कर रखा है, उससे हम तृप्त हों, हमें उसका भोग कराओ (१५१) । तदनन्तर पिता पूर्ववत् वह्नि-संस्कार कर धारा-होम तक सभी कार्य कर पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (१५२) । पार्थिव नामक अग्नि में उक्त पाँच आहुतियाँ देते समय पहले अग्नि को, फिर वासव को, तब प्रजापति को, फिर विश्व-देव-गण को और तब ब्रह्मा को आहुति दे (१५३) । फिर पुत्र को गोद में लेकर उसके दाएँ कान में थोड़े अक्षरों का, सरलतः से उच्चारण होनेवाला उसका नाम सुनाए (१५४) । इस प्रकार तीन बार नाम सुनाकर स्विष्ट-कृत होम आदि सम्पन्न कर ब्राह्मणों का निवेदन कर कर्म समाप्त करें (१५५) । कन्या-सन्तान का निष्क्रमण, वृद्धि श्राद्ध नहीं है। उसका नामकरण, अन्न-प्राशन और चूडाकरण अमन्त्रक ही करे (१५६) ।

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