महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र चौथे या छठे मास में शिशु का 'निष्क्रमण' संस्कार करे (१५७) । इस संस्कार के समय पिता स्नान व नित्य-क्रिया कर गणेश-पूजा करने के बाद शिशु को स्नान करा वस्त्र व अलङ्कार से भूषित कर अपने सामने बैठाए और निम्न मन्त्र पढ़े- ब्रह्मा विष्णुः शिवो दुर्गा गणेशो भास्करस्तथा । इन्द्रो वायुः कुबेरंश्च वरुणोऽग्निर्वृहस्पतिः । शिशोः शुभं प्रकुर्वन्तु रक्षन्तु पथि सर्वदा ॥ अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, गणेश, सूर्य, इन्द्र, वायु, कुबेर, वरुण, अग्नि और वृहस्पति-ये सब शिशु का मङ्गल करें और मार्ग में सदा रक्षा करें (१५८-१५६) । तब पिता शिशु को गोद में लेकर आनन्द-पूर्ण स्वजनों से घिर कर गीत-वाद्य के साथ बालक को बाहर ले जाए (१६०) । मार्ग में कुछ दूर जाकर निम्न मन्त्र पढ़ते हुए बालक को सूर्य का दर्शन कराए (१६१)— ॐ ह्रीं तच्चक्षुर्देव-हितं पुरस्तात् शुक्रमूच्चरत् । पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतम् ॥ अर्थात् शुक्र का अतिक्रम कर जो देव-गण के लिए भी हितकारी सूर्य-रूप चक्षु वर्तमान है, उसे हम एक सौ वर्ष तक देखें और एक सौ वर्ष तक जीवित रहें (१६२) । फिर बालक को वापस अपने घर में लाकर सूर्य को अर्घ्य देकर आत्मीय स्वजनों को भोजन कराये (१६३) । हे शिवे ! कुमार के छठे या आठवें मास में पिता या पितृव्य (चाचा) उसका 'अन्न-प्राशन' संस्कार करे (१६४) । पूर्ववत् देव-पूजा आदि और वह्नि-संस्कार कर यथा-विधि धारा-होम तक कर्म कर 'शुचि' नामक हुताशन में पाँच आहुतियाँ दे । अग्नि के लिए प्रथम आहुति, वासव के लिए द्वितीय, प्रजापति के लिए तृतीय, विश्वदेव-गण के लिए चतुर्थ और ब्रह्मा के लिए पञ्चम आहुति प्रदान करे (१६५-६७) । फिर पिता अग्नि में अन्नदा देवी का ध्यान कर उनके लिए पाँच आहुतियाँ देकर उसी घर में या अन्य गृह में वस्त्रालङ्कार-भूषित पुत्र को गोद में लेकर निम्न पञ्च प्राणाहुति-मन्त्र पढ़ते हुए क्रमशः पाँच बार उसे पायसामृत पिलाये (१६८)— १. प्राणाय स्वाहा, २. अपानाय स्वाहा, ३. समानाय स्वाहा, ४. उदानाय स्वाहा, ५. व्यानाय स्वाहा । फिर अन्न के सभी पदार्थों में से थोड़ा-थोड़ा लेकर शिशु के मुख में स्पर्श कराये (चखाये) (१६६) । तब शंख, तुरही आदि की ध्वनि कर प्रायश्चित्त होम कर क्रिया समाप्त करे । यह तुमसे 'अन्न-प्राशन' की विधि कही । अब 'चूड़ाकरण' की विधि कहता हूँ, सुनो (१७०) । कुलाचार के अनुसार जन्म होने के तीसरे या पाँचवें वर्ष में संस्कार-सिद्धि के लिए बालक का 'चूड़ा- कर्म' करे (१७१) । साधक देव-पूजा से धारा-होम तक के सभी कर्म सम्पन्न कर 'सत्य' नामक अग्नि की उत्तर दिशा में वृष-गोमय-पूरित तिल और गोधूम (गेहूँ) संयुक्त एक नया शराव (पात्र), कुछ उष्ण जल और एक तेज छुरी रखे (१७२-७३) । फिर पिता उसी स्थान में अपनी बाईं ओर बालक को मां को गोद में बैठाकर उक्त समस्त कुछ उष्ण जल से वरुण बीज 'वं' का दस बार जप करते हुए उसके केशों को मार्जित करे । तब माया अर्थात् 'ह्रीँ' मन्त्र का पाठ करते हुए दो कुश-पत्रों से उसके मस्तक पर एक चोटी बनाए (१७४-७५) । माया, लक्ष्मी अर्थात् 'ह्रीँ श्रीँ' का तीन बार जप कर लोहे की छुरी को लेकर उक्त चोटी को काट कर उसे मां के हाथ में रखे (१७६) । बालक की माता उस चोटी को दोनों हाथों से लेकर उस गोमय-युक्त शराव में रखें । फिर पिता नाई के प्रति निम्न मन्त्र कहे—