भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार । ७३ क्षुर-मुण्डिन् ! शिशोः क्षौरं सुखं साधय स्वाहा । अर्थात् हे नापित ! तुम सुखपूर्वक इस शिशु का क्षौर-कर्म करो । यह मन्त्र पढ़कर पिता नाई को देखता हुआ प्रजापति के लिए 'सभ्य' नामक अग्नि में तीन आहुतियाँ प्रदान करे (१७७-७८) । तब नाई बालक का क्षौर-कर्म करे और पिता उस बालक को स्नान कराकर वस्त्र, अलङ्कार, माला से विभूषित करे तथा अग्नि के पास अपनी बाईं ओर उसे बैठाकर स्विष्टकृत होम करे । फिर प्रायश्चित्त होम कर पूर्णाहूति प्रदान करे (१७६-८०) । तब स्वर्ण, रजत या लोहे की शलाका द्वारा निम्न मन्त्र को पढ़ते हुए शिशु का कर्ण-वेध करे— ह्रीं शिशो ! ते कुशलं कुरुतां विश्व-कृद् विभुः । अर्थात् हे शिशो ! विश्व-स्रष्टा विभु तुम्हारा मङ्गल करें (१८१) । फिर 'आपोहिष्ठा मयो भुव' इस मन्त्र द्वारा पुत्र का अभिषेक कर शान्ति-कर्म और दक्षिणा प्रदान कर 'चूड़ा-कर्म' समाप्त करे (१८२) । गर्भाधान से चूड़ाकरण तक के संस्कार-कर्म सभी जातियों के एक समान हैं। शूद्र और सामान्य जाति के ये सभी संस्कार अमन्त्रक होते हैं (१८३) । ब्राह्मण आदि पाँच वर्णों को कन्या के जात-कर्म से चूड़ाकरण तक के संस्कार—एकमात्र निष्क्रमण को छोड़कर—अमन्त्रक करने चाहिए (१८४) । अब द्विज-गण के 'उपनयन'-कर्म को विधि कहता हूँ, जिसके करने से वे दैव और पैत्र कर्म करने के अधिकारी होते हैं (१८५) । गर्भ से आठवें या आठवें वर्ष की आयु से आठ वर्ष के समय के भीतर अर्थात् ब्राह्मण बालक का 'उपनयन' संस्कार सोलह वर्ष की आयु के भोतर ही होना चाहिए । उसके बाद 'उपनयन' करने की विधि नहीं है और वह दैव एवं पैत्र कर्म के करने का अधिकारी नहीं होता (१८६) । विद्वान् पिता नित्य-क्रिया करके पञ्च-देवताओं का पूजन करे । गौरो आदि १६ मातृकाओं की पूजा करे । फिर वसु-धारा दे (१८७) । तब देवताओं और पितरों की तृप्ति के लिए वृद्धि-श्राद्ध करे । कुशण्डिकोक्त विधि के अनुसार धारा-होम तक सभी कर्मों को करे (१८८) । प्रातःकाल अच्छी तरह स्नान कराकर, भोजन कराकर उत्तम अलंकार से विभूषित कर, शिखा के सिवा पूर्ण रूप से मुण्डित, रेशमी वस्त्र पहनाकर बालक को छाया- मण्डप में लाकर 'समुद्भव' नामक अग्नि के पास अपनी बाईं ओर सुन्दर स्वच्छ आसन पर बैठाए । फिर गुरु उस शिष्य से कहे— 'ब्रह्मचर्यं कुरु वत्स !' अर्थात् हे पुत्र ! ब्रह्मचर्य करो । शिष्य उत्तर में गुरु से निवेदन करे— 'ब्रह्मचर्यं करोमि ।' अर्थात् मैं ब्रह्मचर्य करता हूँ (१८६-१६१) । तब गुरु प्रसन्न-हृदय से शान्त-हृदय शिशु के दीर्घायु और तेजोवृद्धि के लिए कषाय रंग के दो वस्त्र उसे प्रदान करे (१६२) । कषाय-वस्त्र-धारी इस बालक को गुरु मूंज या कुश की बनी, गाँठ लगी, तीन लट वाली मेखला मौन होकर दे (१६३) । बालक निम्न मन्त्र का उच्चारण कर मेखला को अपनी कमर में बाँधे— ह्रीं सुभगा मेखला स्यात् शुभ-प्रदा । फा०-१०