महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें७६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र उपवीत-द्वयं दिव्य-वस्त्रादलङ्करणानि च । गृहाण पादुका-छत्रं गन्ध-माल्यानुलेपनम् ॥ अर्थात् हे पुत्र ! अब ब्रह्मचर्योचित वेश को छोड़ो। शम्भु द्वारा दर्शित मार्ग के अनुसार देवों और पितरों का अर्चन करो (२२१) । ब्रह्म-विद्या के उपदेश से तुम्हारा शरीर पवित्र हो गया है । तुम गृहस्थाश्रम को प्राप्त हुए हो । अतः तुम उसके निर्दिष्ट कर्म करो (२२२) । दो उपवीत, दो दिव्य वस्त्र, अलङ्कार, पादुका, छत्र, गन्ध, माला और अनुलेपन ग्रहण करो (२२३) । तदनन्तर शिष्य कृष्णाजिन से युक्त कषाय वस्त्र, यज्ञ-सूत्र, मेखला, दण्ड, भिक्षा-पात्र और आचार के अनुसार उपार्जित भिक्षा को गुरु को समर्पित कर शुद्ध दो यज्ञोपवीत और उत्तम दो वस्त्रों को पहनकर गन्ध तथा माला धारण कर आचार्य के पास मौन होकर बैठे । आचार्य गृहस्थाश्रमो से यह कहे (२२४-२२६)— जितेन्द्रियः सत्य-वादी ब्रह्म-ज्ञान-परो भव । स्वाध्यायाऽऽश्रम-कर्माणि यथा-धर्मेण साधय ॥ अर्थात् तुम जितेन्द्रिय, सत्य-वादी और ब्रह्म-ज्ञान में तत्पर होओ। धर्मशास्त्र का लंघन न कर अध्ययन करो और गृहस्थाश्रम के सब कर्मों का पालन करो (२२७) । द्विज शिष्य को गुरु इस प्रकार आदेश देकर पहले माया (ह्रीं) और सबसे अन्त में प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए 'भूः भुवः स्वः' इन तीन मन्त्रों द्वारा 'समुद्भव' नामक अग्नि में तोन बार होम कराकर स्विष्टिकृत होम कर हे भद्रे ! पूर्णाहुति देने के बाद 'उपनयन'-क्रिया को समाप्त करे (२२८-२२६) । हे प्रिये ! जीव-सेक से लेकर उपनयन तक के नौ संस्कार पिता द्वारा हो सम्पन्न हो सकते हैं । 'उद्वाह- संस्कार' पिता अथवा स्वयं करे (२३०) । कार्य-कुशल व्यक्ति विवाह के दिन स्नान के बाद नित्य-क्रिया करके पञ्च-देवों की पूजा कर गौरी आदि १६ मातृकाओं का पूजन करे । फिर वसुधारा देकर वृद्धि-श्राद्ध करे (२३१) । पहले से निश्चित वर-पात्र के गीत-वाद्य के साथ निशा-काल में आने पर उसे छाया-मण्डप में लाकर वर के आसन पर पूर्वाभिमुख करके बैठाए (२३२) । दाता पश्चिमाभिमुख होकर बैठे । कन्या-दाता पहले आचमन कर ब्राह्मणों के साथ स्वस्ति और ऋद्धि का पाठ करे (२३३) । फिर कन्या-दाता वर से कुशल-प्रश्न और अर्चना-प्रश्न करके प्रश्न का उत्तर लेकर पाद्यादि द्वारा वर का अर्चन करे (२३४) । 'समर्पयामि' शब्द द्वारा देय द्रव्य प्रदान करे । दोनों चरणों में पाद्य और मस्तक पर अर्घ्य समर्पित करे (२३५) । मुख में आचमनीय देकर उत्तम दो वस्त्र, गन्ध, माल्य, उत्तम आभूषण, रत्न और यज्ञ-सूत्र समर्पित करे (२३६) । फिर कांस्य-पात्र में दधि, घृत और मधु रखकर इसे 'मधुपर्कं समर्पयामि' कहकर हाथ में प्रदान करे (२३७) । वर भी उस मधु- पर्क-पात्र को लेकर बाएँ हाथ में रखकर प्राणाहुति-मन्त्र 'प्राणाय स्वाहा' इत्यादि को पढ़कर दाएँ हाथ के अँगूठे और अनामिका द्वारा पाँच बार सूँघ कर उस पात्र को उत्तर दिशा में रख दे । इस प्रकार मधुपर्क समर्पित कर वर को पुनः आचमन कराए (२३८-३६) । तब दूर्वा और आतप-तण्डुल हाथ में लेकर जामाता के दाएँ जानु को पकड़कर विष्णु को स्मरण करते हुए 'तत् सत्' इस वाक्य का उच्चारण कर मास, पक्ष, और तिथि का उल्लेख कर वर के प्रपितामह से पिता तक के प्रत्येक के गोत्र-प्रवर-सहित षष्ठ्यन्त नाम का उच्चारण और इसी प्रकार गोत्र-प्रवरादि-सहित द्वितीयान्त वर के नाम का उल्लेख कर उत्तम वर का वरण करे (२४०) । फिर इसी प्रकार कन्या के प्रपितामह से पिता तक के तीन पुरुषों के षष्ठ्यन्त नाम, गोत्र और प्रवर के सहित उच्चा- रण कर इसी प्रकार गोत्र-प्रवर-सहित द्वितीयान्त कन्या-नाम का उल्लेख कर कन्या-दाता कहे (२४१-४२)— 'ब्राह्मोद्वाहेन दातुं भवन्तं वृणेऽहम् ।' अर्थात् ब्राह्म विवाह द्वारा कन्या-दान करने के लिए मैं तुम्हारा वरण करता हूँ (२४३) ।