महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ७७ इसके बाद वर कहे— 'वृतोऽस्मि ।' अर्थात् 'मैं वृत होता हूँ।' फिर कन्या-दाता वर से कहे— 'यथा-विहितं विवाह-कर्म कुरु ।' अर्थात् 'विधि के अनुसार विवाह का कर्म करो।' उत्तर में वर कहे— 'यथा-ज्ञानं करवाणि ।' अर्थात् मुझे जैसा ज्ञान है, उसी के अनुसार करता हूँ (२४४)। तत्र वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कन्या को लाकर अन्य वस्त्र द्वारा आच्छादित करे। उसे वर के सम्मुख बैठाए (२४५)। फिर कन्या-दाता पुनः वस्त्र और अलंकार आदि द्वारा वर की पूजा कर वर के दाएँ हाथ में कन्या का हाथ रखे (२४६)। उसी हाथ के मध्य में फल, ताम्बूल और पञ्च-रत्न देकर पूजाकर वर को कन्या समर्पित करे (२४७)। समर्पण करते समय पहले अपनी कामना का उल्लेख कर तीन पुरुषों के नामो- ल्लेख-पूर्वक कारण का वर्णन कर चतुर्थी-विभक्ति वर के नाम के अन्त में लगाकर उसका उच्चारण करे (२४८)। तब तीन पुरुषों के नामोल्लेख पूर्वक कन्या के द्वितीयान्त नाम के बाद निम्न पद का उच्चारण करे— 'अर्चितां समलंकृतां साच्छादनां प्रजापति-देवताकां तुभ्यमहं सम्प्रददे ।' और कन्या-दान करे। वर उत्तर में 'स्वस्ति' कह कर कन्या को ग्रहण करे। कन्या-दाता वर से कहे (२४६)— 'धर्मे चार्थे च कामे च भवता भार्यया सह वर्त्तितव्यं ।' अर्थात् तुम धर्म, अर्थ और काम के विषयों में भार्या के साथ मिलकर कार्य करना । वर उत्तर दे—'वाढं वर्त्तितव्यम्' अर्थात् मैं ऐसा ही करूँगा । फिर काम-स्तुति का पाठ करे (२५०-५१)— दाता कामो गृहीताऽपि कामायाऽदाच्च कामिनीम् । कामेन त्वां प्रगृह्णामि कामः पूर्णोऽस्तु चावयोः ॥ अर्थात् काम सम्प्रदान करता है ; काम ही प्रतिग्रह करता है, काम ही काम-हेतु कामिनी को ग्रहण करता है। हे भार्ये ! मैं काम-जन्य तुम्हे ग्रहण करता हूँ हम दोनों के काम पूर्ण हों (२५२)। अब कन्या-दाता कन्या और जामाता से कहे— प्रजापति-प्रसादेन युवयोरभि-वाञ्छितम् । पूर्णमस्तु शिवं चास्तु धर्मं पालयतां युवाम् ॥ अर्थात् प्रजापति के प्रसाद से तुम दोनों का अभीष्ट पूरा हो और तुम दोनों का कल्याण हो; तुम दोनों एकत्र होकर धर्म का पालन करो (२५३) । इसके बाद दाता मङ्गल गीत, वाद्य, शंख आदि की ध्वनि करते हुए कन्या और वर को वस्त्र से आच्छा- दित कर परस्पर शुभ-दृष्टि कराए (२५४)। फिर जामाता को यथा-शक्ति स्वर्ण और रत्न की दक्षिणा देकर अच्छिद्रावधारण करे (२५५) । तब उसी रात्रि में या अगले दिन वर को भार्या के साथ कर कुशण्डिकोक्त विधि से अग्नि-स्थापन करे (२५६) । इस स्थल में 'योजक' नाम वह्नि और 'प्राजापत्य' नामक चरु निर्दिष्ट है। वर धारा-होम तक सारा कार्य कर पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (२५७) । शिव, दुर्गा, विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र—इन पंच-देवताओं का ध्यान कर प्रत्येक के लिए एक-एक आहुति संस्कृत अग्नि में दे (२५८) । फिर निम्न मन्त्र पढ़ेते