भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

७८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हुए वर भार्या के दोनों हाथों को पकड़े— पाणिं गृह्णामि सुभगे ! गुरु-देव-रता भव । गार्हस्थ्यं कर्म धर्मेण यथावदनुशीलय ॥ अर्थात् हे सुभगे ! मैं तुम्हारा पाणिग्रहण करता हूँ । तुम गुरु और देवता की भक्त होकर धर्मानुसार यथा- विधि गृहस्थी के कार्य करो (२५९) । हे शिवे ! तब वधू स्वामी द्वारा दिए घृत और भाई द्वारा दिए लाज (लावा) से प्रजापति के लिए चार बार आहुति प्रदान करे (२६०) । फिर वर भार्या के साथ खड़े होकर अग्नि की प्रदक्षिणा करे और दुर्गा-शिव, लक्ष्मी-विष्णु तथा ब्राह्मी-ब्रह्मा—इन दम्पतियों में से प्रत्येक दम्पति के लिए तीन-तीन आहुतियाँ प्रदान करे (२६१) । इसके बाद शिलारोहण और सप्त पद-गमन करे। यदि विवाह की रात्रि में ही कुशाण्डिका हो, तो वर- वधू स्त्रियों के साथ होकर अरुन्धती का दर्शन करें (२६२)। फिर लौटकर वर आसन पर यथाविधि बैठकर स्विष्टकृत होम से लेकर पूर्णाहुति तक समस्त कार्य समाप्त करे (२६३) । भिन्न-गोत्रा, असपिण्डा, सवर्णा के साथ कुल-धर्म के अनुसार ब्राह्म-विवाह करना निर्दोष है (२६४) । जो भार्या ब्राह्म-विवाह द्वारा परिणीता है, वही गृहेश्वरी होती है। इस पत्नी की अनुमति के बिना कोई व्यक्ति पुनः ब्राह्म-विवाह नहीं कर सकता (२६५) । हे कुलेश्वरि ! ब्राह्म-विवाह से विवाहिता पत्नी के गर्भ से उत्पन्न सन्तान या उसके वंश का कोई विद्यमान हो, तो शैव विवाह से विवाहिता भार्या के गर्भ से उत्पन्न सन्तान धन की अधिकारी नहीं हो सकती (२६६) । हे परमेश्वरि ! शैव विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री के गर्भ से उत्पन्न सन्तान या उसके वंश की सन्तानें धनाधिकारी व्यक्ति की सम्पत्ति के अनुसार उससे भोजन-वस्त्र पा सकती हैं (२६७) । शैव विवाह के दो प्रकार हैं। 'कुल-चक्र' में यह विवाह हो सकता है। चक्र के नियमानुसार एक प्रकार है और यावज्जीवन स्थायी विवाह दूसरा प्रकार है (२६८) । चक्रानुष्ठान के समय वीराचारी एकाग्र-चित्त हो शक्ति-साधकों और स्वजनों के बीच परस्पर इच्छा से विवाह करें (२६९) । इसके लिए भैरवियों और वीराचारी साधकों से अपना मनोरथ निवेदन करे। यथा— 'आवयोः शाम्भवोद्वाहे भवद्भिरनुमन्यताम् ।' अर्थात् हम दोनों के शैव विवाह के सम्बन्ध में आप लोग अनुमति दें (२७०) । इस प्रकार उनकी अनुमति लेकर सप्ताक्षर मन्त्र अर्थात् 'परमेश्वरि स्वाहा' का एक सौ आठ बार जप कर परमा कालिका को प्रणाम करे (२७१) । हे शिवे ! तब कौल-वर्ग के समक्ष उस रमणी से कहे— 'अकैतवेन चित्तेन पति-भावेन मां वृणु ।' अर्थात् चित्त में कोई कपट न रखकर पति-भाव से मुझे वरण करो (२७२) । हे देवेशि ! तब वह कौल कामिनी बड़ी श्रद्धा के साथ गन्ध-पुष्प-अक्षत द्वारा प्रियतम पति का वरण कर उसके हाथ में अपना हाथ प्रदान करे (२७३) । तदनन्तर चक्रेश्वर निम्न मन्त्र द्वारा उस दम्पति का अभिषेक करे। उस समय चक्र में उपस्थित सभी वीर लोग आदर के साथ 'स्वस्ति' कहें (२७४)— राज-राजेश्वरी काली तारिणी भुवनेश्वरी । वगला कमला नित्या युवां रक्षन्तु भैरवी ॥ अर्थात् राज-राजेश्वरी, काली, तारिणी, भुवनेश्वरी, वगला, कमला, नित्या और भैरवी—ये तुम दोनों की रक्षा करें (२७५) । यह मन्त्र पढ़ते हुए मद्य अथवा अर्घ्य-जल द्वारा बारह बार दोनों का अभिषेक करे। फिर वह दम्पति