महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 89, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन | ७६ प्रणाम करे और ज्ञानी चक्रेश्वर उन्हें वाग्भव-रमा अर्थात् 'ऐं श्रीं' ये दो बीज सुनाए (२७६)। हे कुलेश्वरि ! वह कुलीन दम्पति उस शैव विवाह-स्थल में जो-जो स्वीकार किया जाय, उसका पालन शिवोक्त विधानानुसार उन्हें यत्न-पूर्वक करना होगा (२७७)। इस शैव-विवाह में आयु और वर्ण का विचार नहीं है। शम्भु के आदेशा- नुसार पति-हीना और असपिण्डा से ही विवाह करे (२७८)। जो स्त्री शैव धर्म-चक्र के नियमानुसार विवाहिता है, सन्तानार्थी वीर उसके नियमित ऋतु-काल को देखकर चक्र के निवृत्ति-काल में उसका परित्याग कर सकता है (२७६)। अनुलोम-क्रम में अर्थात् वर उच्चजाति का हो, कन्या निम्न जाति की, तो इस कन्या की सन्तान मातृ- जाति के अनुरूप ही व्यवहार में मानी जायगी। विलोम-क्रम में अर्थात् वर निम्न जाति का हो और कन्या उच्च जाति की, तो उसके गर्भ से उत्पन्न सन्तान को सामान्य जाति को समझा जायगा (२८०)। इन सभी सङ्कर जातिवालों के पितृ-श्राद्धादि में कौल व्यक्तियों को भोज्य द्रव्य देना और भोजन कराना होगा (२८१)। हे देवि ! भोजन और मैथुन मनुष्यों को स्वभाव से ही प्रिय हैं। अतएव उनके संक्षेप के लिए और हित-साधन के लिए शैव धर्म में उनकी सीमा निर्दिष्ट की गई है (२८२)। हे महेश्वरि ! इसीलिए शिव-प्रवर्तित धर्म का सेवन करने से मनुष्य धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष का पूर्ण अधिकारी होता है, इसमें सन्देह नहीं (२८३-८४)। • × • दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन देवी ने कहा-हे नाथ ! आपसे दस प्रकार के संस्कारों और कुशण्डिका की विधि सुनी। अब कृपा करके मुझे 'वृद्धि-श्राद्ध' का विधान बताइए (१)। हे शंकर ! किस संस्कार में अथवा किस प्रतिष्ठा-कर्म में 'कुशण्डिका' और 'वृद्धि-श्राद्ध' करना है और कहाँ नहीं करना है, वह सब मेरी प्रसन्नता के लिए तथा जीवों के कल्याण के लिए ठीक-ठीक बताइए (२-३)। श्री सदाशिव ने कहा-हे भद्रे ! गर्भाधान से विवाह तक दस संस्कारों में जो कार्य जिसमें विहित हैं, वह सब मैं विशेषकर कहता हूँ (४)। हे वरानने ! मैंने उक्त प्रकार से जिस स्थल पर जैसी विधि बताई है, कल्याण-कामी तत्त्वज्ञ लोग उसी प्रकार अनुष्ठान करें। उससे भिन्न अन्य स्थलों पर जैसी विधि है, वह कहता हूँ, सुनो (५)। हे प्रिये ! वापी, कूप, तड़ाग, देव-प्रतिमा, गृह, उद्यान, व्रत आदि सभी प्रतिष्ठा-कार्यों में पञ्च-देव-पूजा, मातृकाओं की पूजा, वसुधारा, वृद्धि-श्राद्ध और कुशण्डिका करना चाहिए (७)। जो कर्म स्त्रियों द्वारा होते हैं, उनमें वृद्धि-श्राद्ध नहीं होता, केवल देवताओं और पितरों की तृप्ति के लिए एक भोज करना चाहिए (८)। स्त्रियाँ पुरोहित द्वारा भक्ति-पूर्वक देव-पूजन, षोडश-मातृका-पूजन, वसुधारा-दान और कुशण्डिका करावें (६)। हे शिवे ! दैव और पितृ-कर्मों में पुत्र, पौत्र, दौहित्र, भागिनेय, जामाता और पुरोहित को प्रतिनिधि बनाना प्रशस्त है (१०)। हे कालिके ! 'वृद्धि-श्राद्ध' को बताता हूँ, सुनो (११)। नित्य-कर्म समाप्त कर अत्यन्त एकाग्र होकर गङ्गा, यज्ञेश्वर विष्णु, वास्तुदेव और भू-स्वामी की पूजा करे (१२)। फिर 'प्रणव' (ॐ) का स्मरण करते हुए दर्भ (कुश) का ब्राह्मण बनाये। पाँच, नौ, सात या तीन कुश-पत्र लेकर उन्हें दक्षिणावर्त ढाई बार लपेट कर