महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र बटने से उक्त दर्भ-मय ब्राह्मण की रचना होती है (१३-१४) । हे शिवे ! ‘वृद्धि-श्राद्ध’ में और ‘पार्वणादि श्राद्धों’ में छः ब्राह्मणों की विधि है किन्तु ‘एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ में केवल एक ही ब्राह्मण बताया है (१५) । उक्त कुश-मय ब्राह्मणों को एक पात्र में उत्तर-मुख रखे और निम्न मन्त्र से उन्हें स्नान कराए (१६)— ह्रीं शन्नो देवीरभीष्टये शन्नो भवन्तु पीतये शंयोरभिस्रवन्तु नः । अर्थात् जल-देवता हमारे अभीष्ट की सिद्धि के लिए मंगल करें; हमारे पीने के लिए मङ्गल करें; हम पर सब प्रकार कल्याण की वर्षा करें (१७) । इसके बाद गन्ध-पुष्प से कुश-मय ब्राह्मणों की पूजा करे (१८) । फिर पश्चिम और दक्षिण दिशा में तिल सहित दो-दो तुलसी-पत्र लेकर दर्भ-युक्त छः पात्र स्थापित करे (१६) । पश्चिम में स्थापित दो पात्रों में और दक्षिण में स्थापित चार पात्रों में क्रमशः पूर्व-मुख और उत्तर-मुख करके छः ब्राह्मणों को बिठाये (२०) । हे पार्वति ! पश्चिम में ‘देव-पक्ष’, दक्षिण में बाईं ओर ‘पितृ-पक्ष’ और दक्षिण में दाईं ओर ‘मातामह का पक्ष’ जाने (२१) । हे वरानने ! आभ्युदयिक श्राद्ध में पितरों को ‘नान्दीमुख’ और माताओं को ‘नान्दीमुखी’ पद से विभूषित कर उनका उल्लेख करे । मातामह और मातामही आदि का भी उल्लेख इसी प्रकार करे (२२) । ‘देव कर्म’ उत्तर-मुख होकर दक्षिणावर्त-क्रम से और ‘पितृ-कर्म’ दक्षिण-मुख होकर वामावर्त-क्रम से करे (२३) । हे शिवे ! माता को माता, पितादि का लंघन करके श्राद्ध करने से वह निष्फल होता है। तात्पर्य यह है कि पितृ-कर्म में दक्षिणावर्त-क्रम से दक्षिण-मुख न होवे (२४) । ‘देव-कर्म’ के समय उत्तर-मुख होकर अनुज्ञा- वाक्य का पाठ करे और ‘पितृ तथा मातामहादि के कर्म’ के समय दक्षिण-मुख होकर । हे शुचि-स्मिते ! पहले ‘देव पक्ष’ के अनुज्ञा-वाक्य का सुनो (२५)— अद्यैतस्य.........तत्तत्-कर्माभ्युदयार्थं अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः पितुः, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः पिता- महस्य, अमुक-गोत्रामुक शर्मणः प्रपितामहस्य; अमुक-गोत्रामुकी-देवी मातुः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी पिता- मह्याः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी प्रपितामह्याः; अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः मातामहस्य, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः प्रमातामहस्य, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः वृद्ध-प्रमातामहस्य; अमुक-गोत्रामुकी-देवी मातामह्याः, अमुक-गोत्रा- मुकी-देवी प्रमातामह्याः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी वृद्ध-प्रमातामह्याः विश्वेषां देवानां श्राद्धं कुश-निर्मितयोः ब्राह्मणयोरहं करिष्ये । यही अनुज्ञा-वाक्य' है (२६-२६) । हे पार्वति ! पितृ-त्रय और मातामह-त्रय के नामों के साथ ‘विश्वेषां देवानां’ पद का उच्चारण न करे (३०) । इसके बाद दस बार ब्रह्म-विद्या गायत्री का जप करे (३१) । फिर निम्न मन्त्र को तीन बार पढ़े— देवताभ्यः पितृभ्यश्च महा-योगिभ्य एव च । नमोऽस्तु पुष्ट्यै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ॥ अर्थात् देवताओं, पितरों और महा-योगियों को, पुष्टि को और स्वाहा को नमस्कार । और हाथ में जल लेकर ‘वं हुं फट्’ इस मन्त्र द्वारा श्राद्ध के सभी पदार्थों का शोधन करे (३२) । अर्थात् उक्त मन्त्र-पूत जल को पदार्थों पर छिड़के (३३) । तब अग्नि-कोण में एक पात्र स्थापित कर कहे कि— रक्षोधनममृतं, मम यज्ञ-रक्षां कुरुष्व । फिर उस पात्र में तुलसी-दल से युक्त जल डाले और देव-पक्ष से आरम्भ कर कुश-मय ब्राह्मणों को देवादि- क्रम से जल-गण्डूष देकर कुशासन प्रदान करे (३४-३५) । तब विश्व-देव-गण का, पितृ-त्रय का, मातृ-त्रय का, मातामह-त्रय का और मातामही-त्रय का आवाहन करे (३६) । फिर पहले विश्व-देव-गण की पूजा करे, तब