महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवां उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८१ पितृ-त्रय, मातृ-त्रय, मातामह-त्रय और मातामही-त्रय को पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, धूप, दीप, वस्त्रादि द्वारा पूजा करे । पूजा कर देव-पक्ष से आरम्भ कर पात्र-पातन हेतु पूछे (३७-३८) । इसके बाद माया-बीज 'ह्रीं' का उच्चारण कर देव-पक्ष के लिए एक चतुष्कोण-मण्डल बनाए । फिर इसी प्रकार पितृ-पक्ष और मातामह-पक्ष के लिए भी 'ह्रीं' से दो-दो मण्डल बनाए (३६) । वरुण-बीज 'वं' से इन मण्डलों का प्रोक्षण कर इन पर क्रमशः पात्र स्थापित कर समस्त सामग्री-सहित पात्र को बीज से प्रक्षालित कर पीने के लिए जल-सहित क्रमशः अन्न रखे (४०) । फिर सभी अन्न पर मधु एवं यव प्रदान कर 'ह्रां हूँ फट्' इस मन्त्र से उस समस्त अन्न को जल द्वारा प्रोक्षित कर क्रमशः विश्वदेव-गण को, पितृ-गण को, मातृ-गण को, माता- मह-गण को और मातामही-गण को उनका उल्लेख करते हुए उस अन्न को उन्हें निवेदित करे । फिर गायत्री और 'देवताभ्यः' आदि मन्त्र का तीन बार पाठ करे (४१-४२) । हे आद्ये ! तब शेषान्न-प्रश्न और पिण्ड-प्रश्न करे (४३) । ब्राह्मणों से प्रश्न का उत्तर मिलने पर देने से बचे अक्षतादि द्वारा विल्व के समान बारह पिण्ड बनाए (४४) । उसी प्रकार का एक दूसरा पिण्ड बनाए । तब नैऋत-कोण में मण्डल के ऊपर यव-सहित दर्भ (कुश) बिछाए (४५) और निम्न दो मन्त्रों का पाठ करते हुए अपिण्डों को पिण्ड-दान करे— ये मे कुले लुप्त-पिण्डाः पुत्र-दार-विवर्जिताः । अग्नि-दग्धाश्च ये केऽपि व्याल-व्याघ्र-हताश्च ये ॥ ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्य-जन्मनि बान्धवाः । मद्-दत्त-पिण्ड-तोयाभ्यां ते यान्तु तृप्तिमक्षयां ॥ अर्थात् मेरे वंश में जो लुप्त-पिण्ड हैं; जो स्त्री-पुत्र से रहित हैं ; जो अग्नि से जले हैं ; जो सर्प, व्याघ्रादि द्वारा मरे हैं; जो मेरे बान्धव अबान्धव हैं या जो अन्य जन्म के मेरे बान्धव हैं, वे सब मेरे द्वारा दिए इस पिण्ड और जल द्वारा अक्षय तृप्ति को प्राप्त करें (४६-४७) । फिर हाथ धोकर आचमन करे और गायत्री तथा 'देवताभ्यः' इत्यादि मन्त्र का तीन बार जप कर मण्डल बनाए (४८) । हे देवि ! पितृ-पक्ष से आरम्भ कर उच्छिष्ट पात्र के सम्मुख पूर्वोक्त विधि से दो-दो मण्डल बनाए (४६) । 'वं' बीज से इन सभी मण्डलों को प्रोक्षित कर इन पर कुश बिछाये । फिर वायु-बीज 'यं' से सभी कुशों को प्रोक्षित कर पितृ-दर्भ से आरम्भ कर दर्भ के मूल, मध्य और ऊर्ध्व भाग में क्रमशः १ पितृ-त्रय, २ मातृ-त्रय, ३ मातामह-त्रय और ४ मातामही-त्रय को तीन-तीन पिण्ड प्रदान करे (५०) । हे महेश्वरि ! प्रत्येक का सम्बो- धनान्त-नाम उच्चारण कर 'स्वधा' कहते हुए प्रत्येक को यव और मधु-सहित पिण्ड प्रदान करे (५१) । पिण्ड- दान करने के बाद 'कर-लेप' द्वारा अर्थात् अन्न-युक्त हाथ को कुश में रगड़ कर 'लेप-भोजी' अर्थात् चौथे से सातवें पुरुष को प्रसन्न करे । एकोद्दिष्ट श्राद्ध में यह 'लेप-भोजि-पितृ-गण-प्रीणन विधि' नहीं है (५२) । देवताओं और पितृ-गण की तृप्ति के लिए दश बार गायत्री-जप और तीन बार 'देवताभ्यः पितृभ्यश्च' इस मन्त्र का पाठ कर पिण्ड-पूजा करे । तब धूप-दीप को जलाकर दोनों आँखें बन्दकर यह भावना करे कि 'दिव्य देह-धारी पितृ-गण यज्ञ-स्थल में कव्य अर्थात् उनके लिए दिए गए द्रव्य का भोजन कर रहे हैं।' फिर निम्न मन्त्र से पितृ-गण को प्रणाम करे— पिता मे परमो धर्मः पिता मे परमं तपः । स्वर्गः पिता मे तत्-तृप्तौ तृप्तमस्त्यखिलं जगत् ॥ अर्थात् पिता ही मेरे परम धर्म हैं, पिता ही मेरे परम तप हैं, पिता ही मेरे स्वर्ग हैं। उनके तृप्त होने से सारा जगत् तृप्त होता है (५३-५५) । फिर निर्माल्य लेकर पितृ-गण से आशीर्वाद हेतु प्रार्थना करे (५६)— आशिषो मे प्रदीयन्तां पितरः करुणा-मयाः । वेदाः सन्ततयो नित्यं वर्द्धन्तां बान्धवा मम ॥ फा०—११