भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८३ (अथवा एक वर्ष के भीतर) मरने की सूचना मिलने पर तीन रात्रि का 'अशौच' होता है (७७) । 'अशौच'-युक्त व्यक्ति कुल-पूजा और प्रारब्ध कर्म को छोड़कर अन्य कोई दैव या पैत्र्य कर्म नहीं कर सकता (७८) । हे कुलेश्वरि ! पाँच वर्ष से अधिक आयुवाले मृत मनुष्य को श्मशान में दग्ध करे । कुल-स्त्री को पति के साथ दग्ध न करे क्योंकि स्त्री भगवती-स्वरूपा होती है। मोह-वश ही वह पति की चिता पर चढ़ती है और नरक में जाती है (७९-८०) । हे कालिके ! जो ब्रह्म-मन्त्रोपासक हैं, उनके मृत शरीर को जल में विसर्जित करे या मिट्टी में समाधिस्थ करे अथवा दग्ध कर दे (८१) । हे अम्बिके ! पुण्य-क्षेत्र में, तीर्थ में, विशेषकर देवी के समीप या कौलिकों के पास मरना प्रशस्त है (८२) । जो मृत्यु के समय तीनों लोकों को भुलाकर एकमात्र सत्य-स्वरूप की भावना करते हुए प्राण छोड़ता है, वह गुण-त्रय के सम्बन्ध का त्याग कर निर्लेप, निर्गुण, नित्य-बुद्ध इत्यादि निज-भाव में प्रतिष्ठित होता है अर्थात् 'निर्वाण' को प्राप्त करता है (८३) । प्रेत-भूमि में शव को ले जाकर उसे घृताक्त कर स्नान कराए और उसे उत्तराभिमुख कर चिता पर लिटाये (८४) । फिर प्रेत-गोत्र और सम्बोधनान्त प्रेत-नाम का उल्लेख करते हुए प्रेत के मुख में पिण्ड देकर वह्नि-बीज 'रं' का स्मरण करते हुए दाह-कर्म करे (८५) । यहाँ सिद्धान्न या चावल या यव-चूर्ण या गोधूम- चूर्ण द्वारा धात्री-फल (आंवले) के समान पिण्ड बनाए (८६) । प्रेत के अनेक पुत्र हों, तो ज्येष्ठ पुत्र ही श्राद्ध करने का अधिकारी होता है। ज्येष्ठ पुत्र के अभाव में ज्येष्ठ-क्रम से दूसरे पुत्रों को भी अधिकार होता है (८७) । अशौच की समाप्ति के दूसरे दिन स्नान कर पवित्र हो मृत व्यक्ति की प्रेतत्व-विमुक्ति के लिए तिल-काञ्चन का दान करे (८८) । सत्पुत्र मृत पिता के स्वर्ग-लाभ के लिए गो, भूमि, वस्त्र, यान, धातु-निर्मित गात्र और अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों का दान करे (८९) । गन्ध, माला, फल, जल, सुख देनेवाली शैय्या और जो- जो वस्तुएँ जीवित अवस्था में मृत व्यक्ति को प्रिय थीं, वे सभी प्रेत के स्वर्ग-लाभ के लिए प्रदान करे (९०) । इसके बाद उसके स्वर्ग-प्राप्ति के लिए एक बैल को त्रिशूल के चिह्न से चिह्नित कर और स्वर्ण से सजा कर विसर्जित करे (९१) । अत्यन्त श्रद्धा के साथ प्रेत-श्राद्ध में कही विधि से श्राद्धकर ब्रह्मज्ञ ब्राह्मणों, कौलों और अन्य भूखे लोगों को भोजन कराए (९२) । गो आदि के दान करने में जो असमर्थ हो, वह अपनी शक्ति के अनुसार श्राद्ध कर भूखे लोगों को भोजन कराकर पिता के प्रेतत्व का मोचन करे (९३) । यही आदि एको- द्दिष्ट और प्रेतत्व से विमुक्ति का कारण होता है। फिर प्रति वर्ष मृत्यु-तिथि पर मृत व्यक्ति के लिए अन्न प्रदान करे (९४) । बहुत विधान या बहुत कर्मों का अनुष्ठान करने से क्या लाभ ? कौलिक साधकों का अर्चन करने से सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती है (९५) । होम, जप, श्राद्ध-व्यतीत संस्कार और अन्य कर्मों में एकमात्र कौलिक साधक की अर्चना करने से सम्पूर्ण रूप से कार्य की सिद्धि होती है (९६) । शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरम्भ कर कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तक सभी शुभ कर्म करे—यह शिवोक्त विधि है (९७) । कमार्थी व्यक्ति गुरु, आचार्य और कौलिक साधक की अनुमति से अन्य विशुद्ध दिन में भी सभी अपरिहार्य कर्म कर सकता है (९८) । कौलिक व्यक्ति पञ्च-तत्त्व द्वारा आद्या देवी की पूजा कर गृहारम्भ, गृह- प्रवेश, यात्रा, शङ्ख-रत्न आदि धारण—ये सब कार्य करे (९९) । अथवा श्रेष्ठ साधक संक्षेप में करे, यथा— देवी का ध्यान करते हुए मन्त्र-जप और नमस्कार कर इच्छानुसार प्रस्थान करे (१००) । शारदीय उत्सव आदि सभी देव-पूजाओं में तत्-तत् कल्पोक्त विधि के अनुसार ध्यान और पूजा करे (१०१) । आद्या