भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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८४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कालिका के पूजा-स्थल में उक्त विधान के अनुसार बलिदान और होम करे। अन्त में कौलिक व्यक्ति की अर्चना और दक्षिणा देकर कर्म समाप्त करे (१०२)। गङ्गा, विष्णु, शिव, सूर्य और ब्रह्मा को पूजा कर उद्दिष्ट देवता की पूजा करे—यह सामान्य विधि कही है (१०३) । कौलिक ही परम धर्म, कौलिक ही परम देवता, कौलिक ही परम तीर्थ है, अतएव सदा कौलिक साधक की अर्चना करे (१०४) । साढ़े तीन कोटि तीर्थ एवं ब्रह्मादि सभी देवता कौलिक शरीर में वास करते हैं, अतः कौलिक साधक की पूजा करने से क्या नहीं होता (१०५)? पूर्णाभिषिक्त सत्कौलिक जिस देश में विराजता है, वही धन्य-मान्य-पुण्यतम और देवताओं द्वारा प्रार्थनीय होता है (१०६) । साक्षात् शिव-स्वरूप, पाप-पुण्य-रहित पूर्णाभिषिक्त साधक का प्रभाव पृथ्वी पर कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता (१०७)। कौल व्यक्ति नर- रूप में सारे जगत् के उद्धार का निमित्त है और लोक-यात्रा की शिक्षा देने के लिए भूमण्डल पर विहार करता है (१०८) । श्री देवी ने कहा- हे प्रभो ! पूर्णाभिषिक्त कौल साधक की महिमा आपने कही। अब आप कृपा कर मुझे उक्त 'अभिषेक' का विधान सुनाइए (१०६)। श्री सदाशिव ने कहा—सत्य, त्रेता और द्वापर युगों में यह विधान गुप्त रहा। पूर्व-काल में गुप्त भाव से इसका अनुष्ठान कर लोगों ने मोक्ष प्राप्त किया है (११०)। प्रबल कलि-काल में कुलाचारी लोग रात्रि-काल में या दिन में प्रकट रूप से 'अभिषेक' करें (१११) । बिना अभिषेक केवल मद्य-सेवन करने से ही कौल नहीं होता। जिसका 'पूर्णाभिषेक' हुआ है, वही कौल, कुलार्चक और चक्राधीश्वर होता है (११२) । अभिषेक के पूर्व-दिन में गुरुदेव सब विघ्नों की शान्ति के लिए यथा-शक्ति उपचारों के द्वारा विघ्न-राज अर्थात् गणपति की पूजा करें (११३) । हे प्रिये ! यदि गुरुदेव शुभ 'पूर्णाभिषेक' में अधिकारी न हों, तो पूर्णा- भिषिक्त कौल द्वारा उक्त संस्कार कराए (११४)। 'ख' वर्ण के बाद के वर्ण ('ग') को अनुस्वार-युक्त करने से बना 'गं' ही गणपति का बीज है (११५) । इस गणपति-मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निवृत्, देवता गणपति और विनियोग कर्त्तव्य कर्म के विघ्न की शान्ति के निमित्त है (११६) । छः दीर्घ स्वरों से युक्त मूल-मन्त्र ('गां गीं' इत्यादि) द्वारा षडङ्ग-न्यास करे। हे शिवे ! फिर प्राणायाम कर गणपति का ध्यान करे (११७) -- सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतर-जठरं हस्त-पद्मैर्दधानं । शङ्खं पाशांकुशेष्टान्युरु-कर-विलसद्-वारुणी-पूर्ण-कुम्भं ॥ बालेन्दूद्दोप्त-मौलिं करि-पति-वदनं बीजपूरार्द्र-गण्डम् । भोगीन्द्राबद्ध-भूषं भजत गणपति रक्त-वस्त्राङ्गरागम् ॥ अर्थात् सिन्दूर के समान रक्त-वर्ण, त्रिनेत्र, अत्यन्त स्थूल उदर, चार कर-कमलों में शङ्ख, पाश, अंकुश और वर धारण करनेवाले, वारुणी से भरे हुए कुम्भ से शोभायमान विशाल सूंड, नवीन चन्द्र-कला द्वारा प्रदीप्त मस्तकवाले, गजराज के मुख वाले, बीजपूर के समान आर्द्र दोनों गण्ड-स्थल, सर्पराज द्वारा विभूषित, रक्त-वस्त्र और रक्त अङ्गराग से युक्त गणपति का मैं भजन करता हूँ (११८)। इस प्रकार ध्यान कर मानसोपचारों से उनकी पूजा कर पीठ-शक्तियों की पूजा करे। तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, काम-रूपिणी, उग्रा, तेजस्वती और सत्या- इन आठ पीठ-शक्तियों की पूजा पूर्वादि-क्रम से करके मध्य में विघ्न-विनाशिनी की पूजा कर कमलासन की पूजा करे (११६-१२०)। फिर गणपति का पुनः