भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

८४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कालिका के पूजा-स्थल में उक्त विधान के अनुसार बलिदान और होम करे। अन्त में कौलिक व्यक्ति की अर्चना और दक्षिणा देकर कर्म समाप्त करे (१०२)। गङ्गा, विष्णु, शिव, सूर्य और ब्रह्मा को पूजा कर उद्दिष्ट देवता की पूजा करे—यह सामान्य विधि कही है (१०३) । कौलिक ही परम धर्म, कौलिक ही परम देवता, कौलिक ही परम तीर्थ है, अतएव सदा कौलिक साधक की अर्चना करे (१०४) । साढ़े तीन कोटि तीर्थ एवं ब्रह्मादि सभी देवता कौलिक शरीर में वास करते हैं, अतः कौलिक साधक की पूजा करने से क्या नहीं होता (१०५)? पूर्णाभिषिक्त सत्कौलिक जिस देश में विराजता है, वही धन्य-मान्य-पुण्यतम और देवताओं द्वारा प्रार्थनीय होता है (१०६) । साक्षात् शिव-स्वरूप, पाप-पुण्य-रहित पूर्णाभिषिक्त साधक का प्रभाव पृथ्वी पर कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता (१०७)। कौल व्यक्ति नर- रूप में सारे जगत् के उद्धार का निमित्त है और लोक-यात्रा की शिक्षा देने के लिए भूमण्डल पर विहार करता है (१०८) । श्री देवी ने कहा- हे प्रभो ! पूर्णाभिषिक्त कौल साधक की महिमा आपने कही। अब आप कृपा कर मुझे उक्त 'अभिषेक' का विधान सुनाइए (१०६)। श्री सदाशिव ने कहा—सत्य, त्रेता और द्वापर युगों में यह विधान गुप्त रहा। पूर्व-काल में गुप्त भाव से इसका अनुष्ठान कर लोगों ने मोक्ष प्राप्त किया है (११०)। प्रबल कलि-काल में कुलाचारी लोग रात्रि-काल में या दिन में प्रकट रूप से 'अभिषेक' करें (१११) । बिना अभिषेक केवल मद्य-सेवन करने से ही कौल नहीं होता। जिसका 'पूर्णाभिषेक' हुआ है, वही कौल, कुलार्चक और चक्राधीश्वर होता है (११२) । अभिषेक के पूर्व-दिन में गुरुदेव सब विघ्नों की शान्ति के लिए यथा-शक्ति उपचारों के द्वारा विघ्न-राज अर्थात् गणपति की पूजा करें (११३) । हे प्रिये ! यदि गुरुदेव शुभ 'पूर्णाभिषेक' में अधिकारी न हों, तो पूर्णा- भिषिक्त कौल द्वारा उक्त संस्कार कराए (११४)। 'ख' वर्ण के बाद के वर्ण ('ग') को अनुस्वार-युक्त करने से बना 'गं' ही गणपति का बीज है (११५) । इस गणपति-मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निवृत्, देवता गणपति और विनियोग कर्त्तव्य कर्म के विघ्न की शान्ति के निमित्त है (११६) । छः दीर्घ स्वरों से युक्त मूल-मन्त्र ('गां गीं' इत्यादि) द्वारा षडङ्ग-न्यास करे। हे शिवे ! फिर प्राणायाम कर गणपति का ध्यान करे (११७) -- सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतर-जठरं हस्त-पद्मैर्दधानं । शङ्खं पाशांकुशेष्टान्युरु-कर-विलसद्-वारुणी-पूर्ण-कुम्भं ॥ बालेन्दूद्दोप्त-मौलिं करि-पति-वदनं बीजपूरार्द्र-गण्डम् । भोगीन्द्राबद्ध-भूषं भजत गणपति रक्त-वस्त्राङ्गरागम् ॥ अर्थात् सिन्दूर के समान रक्त-वर्ण, त्रिनेत्र, अत्यन्त स्थूल उदर, चार कर-कमलों में शङ्ख, पाश, अंकुश और वर धारण करनेवाले, वारुणी से भरे हुए कुम्भ से शोभायमान विशाल सूंड, नवीन चन्द्र-कला द्वारा प्रदीप्त मस्तकवाले, गजराज के मुख वाले, बीजपूर के समान आर्द्र दोनों गण्ड-स्थल, सर्पराज द्वारा विभूषित, रक्त-वस्त्र और रक्त अङ्गराग से युक्त गणपति का मैं भजन करता हूँ (११८)। इस प्रकार ध्यान कर मानसोपचारों से उनकी पूजा कर पीठ-शक्तियों की पूजा करे। तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, काम-रूपिणी, उग्रा, तेजस्वती और सत्या- इन आठ पीठ-शक्तियों की पूजा पूर्वादि-क्रम से करके मध्य में विघ्न-विनाशिनी की पूजा कर कमलासन की पूजा करे (११६-१२०)। फिर गणपति का पुनः

दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन | ८५ ध्यान कर मन्त्र-शोधित पञ्च-तत्व-रूप उपचारों द्वारा उनकी पूजा कर उनके चारों ओर गणेश, गण-नायक, गण-नाथ, गण-क्रीड़, एक-दन्त, रक्त-तुण्ड, लम्बोदर, गजानन, महोदर, विकट, धूम्राभ और विघ्न-नाशन की पूजा करे (१२१-१२३)। तब ब्राह्मी आदि अष्ट-शक्तियों एवं दश दिक्पालों की पूजा करके उनके अस्त्रों की पूजा कर विघ्नराज को विसर्जित करे (१२४)। इसी प्रकार विघ्नराज की पञ्च-तत्वों द्वारा पूजा कर अधिवास करे और ब्रह्मज्ञ कुल-साधकों को भोजन कराए (१०५)। अगले दिन स्नान और नित्य-क्रिया कर जन्म से अब तक के किए पापों के नाश के लिए तिल-काञ्चन का दान करे। हे प्रिये ! कौलों को तृप्ति के लिए एक भोज भी प्रदान करे (१२६)। तब सूर्य को अर्घ्य देकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, नव-ग्रह, मातृकाओं को पूजा कर 'वसुधारा' दे (१२७)। फिर कर्म के अभ्युदय की कामना से वृद्धि-श्राद्ध करे। उसके बाद गुरु के पास जाकर प्रणाम कर प्रार्थना करे (१२८)--- त्राहि नाथ ! कुलाचार-नलिनो-कुल-वल्लभ ! त्वत्-पादाम्भोरुहच्छायां देहि मूर्ध्नि कृपा-निधे ॥ आज्ञां देहि महा-भाग ! शुभ-पूर्णाभिषेचने । निर्विघ्नं कर्मणः सिद्धिमुपैमि त्वत्-प्रसादतः ॥ अर्थात् हे नाथ ! हे कुलाचार-रूप कमलिनी-समूह के प्रियतम ! हे दया-सागर ! मेरे मस्तक पर अपने चरण-कमलों की छाया प्रदान करें ( २६)। हे महानुभाव ! मेरे शुभ पूर्णाभिषेक के लिए आज्ञा दें। आपकी कृपा से मैं बिना किसी विघ्न के कार्य की सफलता पाऊँ (१३०)। इस प्रार्थना के उत्तर में गुरुदेव कहें- शिव-शक्त्याज्ञया वत्स ! कुरु पूर्णाभिषेचनम् । मनोरथ-मयी-सिद्धिर्जायतां शिव-शासनात् ॥ अर्थात् हे पुत्र ! शिव-शक्ति की आज्ञानुसार 'पूर्णाभिषेक' करो। शिव के आदेश से तुम्हें इच्छानुरूप सिद्धि प्राप्त हो (१३१) गुरुदेव से इस प्रकार आज्ञा प्राप्त कर समस्त उपद्रवों की शान्ति के लिए और आयु, लक्ष्मी, बल तथा आरोग्य की प्राप्ति के लिए 'सङ्कल्प' करे (१३२)। तब सङ्कल्प लेकर वस्त्र, अलङ्कार, भूषण और शुद्धि-सहित कारण द्वारा गुरुदेव की पूजाकर उनका 'वरण' करे (१३३)। गुरुदेव गैरिकादि रंगों से चित्रित, सुन्दर ध्वज-पताकाओं से युक्त, फल-पत्तों से सुसज्जित, मालाकार किङ्किणियों से शोभित, रंग-बिरंगी चाँदनी से अलंकृत, जलते हुए घृत-दीपकों की पंक्तियों से लेश मात्र भी अंधेरे से रहित, कर्पूर-सहित धूप और यक्ष-धूप (धूना) द्वारा सुगन्धित, ताल-वृन्त, चामर, मोर-पङ्ख और दर्प- णादि से सुसज्जित, मनोहर गृह में चार अंगुल ऊँची, डेढ़ हाथ चौड़ी मिट्टी की वेदी बनाएँ। फिर उक्त गृह में पीले, लाल, काले, सफेद, साँवले रंग के अक्षत-चूर्ण द्वारा सुन्दर 'सर्वतोभद्र-मण्डल' की रचना करें (१३४-३८)। तब अपने कल्प में बताई विधि के अनुसार मानस-पूजा तक के कर्म करके पूर्वोक्त मन्त्रों से पञ्च-तत्त्वों का शोधन करें (१३६)। फिर अस्त्र (फट्) मन्त्र द्वारा प्रक्षालित दही और अक्षत से लिप्त सोने या चांदी या ताँबे अथवा मिट्टी के बने ' घट' को प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए पूर्व-निर्मित 'सर्वतोभद्र-मण्डल' के ऊपर स्थापित करें। श्री-बीज अर्थात् 'श्रीं' का जप करते हुए उसे सिन्दूर से अङ्कित करें (१४०-४१)। तब अनुस्वार- युक्त 'क्ष' से लेकर 'अ' तक के पचास वर्णों के सहित मूल-मन्त्र का तीन बार जप कर 'कारण' (मदिरा) या तीर्थ-जल अथवा शुद्ध जल द्वारा उस 'घट' को पूर्ण कर उसमें नव-रत्न या स्वर्ण छोड़ें (१४२-४३)। फिर वाग्भव बीज 'ऐं' का जप करते हुए 'घट' के मुख पर कटहल, गूलर, पीपल, मौलसिरी और आम के पत्तों को स्थापित करें (१४४)। तब रमा-माया अर्थात् 'श्रीं ह्रीं' इस मन्त्र का जप करते हुए फल और अक्षत से युक्त सोने, चाँदी,

८६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तांबे या मिट्टी का 'शराब' (प्याला) उक्त पत्तों के ऊपर रखें (१४५)। हे वरानने ! दो वस्त्रों द्वारा इस घट के गले को बाँधें। शक्ति-मन्त्र हो तो लाल और विष्णु-मन्त्र हो तो सफेद वस्त्र की विधि है (१४६)। फिर निम्न मन्त्र से 'घट' को स्थिर करें— स्थां स्थों ह्रीं श्रीं स्थिरीभव । इस प्रकार स्थिर किए गए घट में 'पञ्च-तत्त्व' छोड़ें और तब नौ पात्रों की स्थापना करें (१४७) । 'शक्ति-पात्र' चाँदी का, 'गुरु-पात्र' सोने का, महा-शङ्ख (नर-कपाल) या नारिकेल का 'श्रीपात्र' और तांबे के अन्य पात्र होने चाहिए (१४८)। महा-देवी की पूजा में पत्थर, लकड़ी और लोहे के पात्र का उपयोग न करें। सामर्थ्य के अनुसार अन्य पदार्थों के ही पात्र रखें (१४६) । पात्रों की स्थापना कर गुरुओं और भगवती (आनन्दभैरवादि) का तर्पण करने के बाद गुरुदेव अमृत-पूर्ण 'घट' की पूजा करें (१५०)। तब धूप, दीप दिखा- कर सर्व-भूत को बलि प्रदान करें। उसके बाद पीठ-देवतादि की पूजाकर षडङ्ग-न्यास करें (१५१)। फिर प्राणा- याम कर महेश्वरी का ध्यान और आवाहन कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार इष्ट-देवता की पूजा करें। पूजा के समय वित्त-शास्र (अर्थात् अपनी सामर्थ्य के अनुरूप खर्च न कर कंजूसों से कार्य करना) अनुचित है (१५२) । हे शिवे ! गुरुदेव होम तक के कर्म करने के बाद पुष्प, चन्दन और वस्त्र द्वारा क्रमशः कुमारी, शक्ति और साधकों की पूजा करें (१५३)। तब गुरुदेव उपस्थित कौल-साधकों से अपने शिष्य का 'पूर्णाभिषेक' करने की अनुमति माँगें— अनुगृह्णन्तु कौला मे शिष्यं प्रति कुल-व्रताः । पूर्णाभिषेक-संस्कारे भवद्भिरनुमन्यताम् ।। अर्थात् हे कुल-व्रत-परायण कौल-गण ! आप लोग मेरे शिष्य पर अनुग्रह करें और पूर्णाभिषेक-संस्कार को अनुमति दें। चक्रेश्वर के इस प्रकार कहने पर कौल लोग आदर-सहित चक्रेश्वर गुरुदेव से कहें कि— महा-माया-प्रसादेन प्रभावात् परमात्मनः । शिष्यो भवतु पूर्णस्ते पर-तत्त्व-परायणः ।। अर्थात् महा-माया के प्रसाद और परमात्मा के प्रभाव से आपका शिष्य परंब्रह्म में तत्पर होकर पूर्ण होवे (१५४-५५) । तदनन्तर गुरुदेव शिष्य द्वारा देवी की पूजा करायें और पूजित 'घट' के ऊपर 'काम-माया-रमा' अर्थात् 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र का जप कर उस निर्मल 'घट' को निम्न मन्त्र से हिलावें— उत्तिष्ठ ब्रह्म-कलश ! देवात्मक ! सिद्धिद ! त्वत्-तोय-पल्लवैः सिक्तः शिष्यो ब्रह्म-रतोऽस्तु मे ।। अर्थात् हे सिद्धि-दायक, देवता-स्वरूप, ब्रह्म-कलश ! तुम उठो। तुम्हारे जल और पल्लव द्वारा सिक्त होकर मेरा शिष्य ब्रह्म में रत होवे (१५६-५७)। तब शिष्य को गुरुदेव उत्तर की ओर मुख करके बैठाएँ और निम्न मन्त्रों से घटस्थ जल से पञ्च-पल्लवों के गुच्छे द्वारा उसका अभिषेक करें (१५८)— ॐ शुभ-पूर्णाभिषेकस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आद्या देवता, ॐ वीजं, शुभ- पूर्णाभिषेकार्थे विनियोगः । गुरवस्त्वाभिषिञ्चन्तु ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । दुर्गा-लक्ष्मी-भवान्यस्त्वामभिषिञ्चन्तु मातरः ।।१

दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८७ षोडशी तारिणी नित्या स्वाहा महिष-मर्दिनी । एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु मन्त्र-पूतेन वारिणा ॥२ जय-दुर्गा विशालाक्षी ब्रह्माणी च सरस्वती । एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु बगला वरदा शिवा ॥३ नारसिंही च वाराही वैष्णवी वन-मालिनी । इन्द्राणी वारुणी रौद्री त्वामभिषिञ्चन्तु शक्तयः ॥४ भैरवी भद्रकाली च तुष्टिः पुष्टिरुमा क्षमा । श्रद्धा कान्तिर्दया शान्तिरभिषिञ्चन्तु ते सदा ॥५ महा-काली महा-लक्ष्मीर्महा-नील-सरस्वती । उग्र-चण्डा प्रचण्डा त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वदा ॥६ मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नृसिंहो वामनस्तथा । रामो भार्गव-रामस्त्वामभिषिञ्चन्तु वारिणा ॥७ असिताङ्गो रुरुश्चण्डः क्रोधोन्मत्तो भयङ्करः । कपाली भीषणश्च त्वामभिषिञ्चन्तु वारिणा ॥८ काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी । विप्रचित्ता महोग्रा त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वदा ॥६ इन्द्रोऽग्निः शमनो रक्षो वरुणः पवनस्तथा । धनदश्च महेशानः सिञ्चन्तु त्वां दिगीश्वराः ॥१० रविः सोमो मङ्गलश्च बुधो जीवः सितः शनिः । राहुः केतुः स-नक्षत्रा अभिषिञ्चन्तु ते ग्रहाः ॥११ नक्षत्रं करणं योगो वाराः पक्षौ दिनानि च । ऋतुर्मासो हायनस्त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वदा ॥१२ लवणेक्षु-सुरा-सर्पिर्दधि-दुग्ध-जलान्तकाः । समुद्रास्त्वाभिषिञ्चन्तु मन्त्र-पूतेन वारिणा ॥१३ गङ्गा सूर्य-सुता रेवा चन्द्र-भागा सरस्वती । सरयूर्गण्डकी कुम्भी श्वेत-गङ्गा च कौशिकी । एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु मन्त्र-पूतेन वारिणा ॥१४ अनन्ताद्या महा-नागाः सुपर्णाद्याः पतत्रिणः । तरवः कल्प-वृक्षाद्याः सिञ्चन्तु त्वां महीधराः ॥१५ पाताल-भूतल-व्योम-चारिणः क्षेम-कारिणः । पूर्णाभिषेक-सन्तुष्टास्त्वाभिषिञ्चन्तु पाथसा ॥१६ दौर्भाग्यं दुर्यशो रोगा दौर्मनस्यं तथा शुचः । विनश्यन्त्वभिषेकेण परम-ब्रह्म-तेजसा ॥५७ अलक्ष्मी काल-कर्णी च डाकिन्यो योगिनी-गणाः । विनश्यन्त्वभिषेकेण काली-बीजेन ताडिताः ॥१८ भूताः प्रेताः पिशाचाश्च ग्रहा येऽरिष्ट-कारकाः । विद्रुतास्ते विनश्यन्तु रमा-बीजेन ताडिताः ॥१९ अभिचार-कृता दोषा वैरि-मन्त्रोद्भवाश्च ये । मनो-वाक्कायजा दोषाः विनश्यन्त्वभिषेचनात् ॥२० नश्यन्तु विपदः सर्वाः सम्पदः सन्तु सुस्थिराः । अभिषेकेन पूर्णेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः ॥२१ इन इक्कीस मन्त्रों से अभिषिक्त साधक ने यदि पहले पशु द्वारा दीक्षा ली हो, तो इस समय कौल गुरुदेव पुनः उसे वही मन्त्र सुनावें (१५६-८१) । फिर कौलिक गुरुदेव पूर्वोक्त नाम द्वारा शिष्य को सम्बोधन कर सभी शक्ति-साधकों को सूचित करते हुए उसे 'आनन्द-नाथान्त' नाम प्रदान करें (१८२) । गुरुदेव से मन्त्र प्राप्त कर शिष्य यन्त्र-राज में अपने देवता की पूजा कर पञ्च-तत्त्वोपचारों से गुरुदेव की पूजा करे (१८३) । फिर शिष्य गुरुदेव को भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, पान (सुधा), अलंकार-यह सब दक्षिणा में देकर शिव-स्वरूप कौलों की पूजा करे (१८४) । तब वह शान्त और विनम्र भाव से भक्तिपूर्वक श्रीगुरुदेव के चरण छूकर प्रणाम करे और यह प्रार्थना करे कि- श्रीनाथ ! जगतां नाथ !, मन्नाथ ! करुणा-निधे ! । परामृत-प्रदानेन, पूरयास्मन्मनोरथम् ।।

८८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे श्रीनाथ ! हे जगत् के नाथ ! हे मेरे नाथ ! हे दया-निधे ! परमामृत देकर मेरे मनोरथ को पूरा करें (१८५-८६) । इस पर गुरुदेव कौलों से अनुमति-प्राप्त्यर्थ उनसे कहें कि— आज्ञा मे दीयतां कौलाः प्रत्यक्ष-शिव-रूपिणः । सच्छिष्याय विनीताय ददामि परमामृतम् ॥ अर्थात् हे शिव-स्वरूप कौल-गण ! अपने विनम्र सच्छिष्य को मैं परमामृत देता हूँ। आप लोग मुझे आज्ञा दें (१८७) । उत्तर में कौल-जन कहें कि— चक्रेश ! परमेशान ! कौल-पङ्कज-भास्कर ! कृतार्थं कुरु सच्छिष्यं देह्यमुष्मै कुलामृतम् ॥ अर्थात् हे चक्रेश्वर ! हे परमेशान ! हे कौल-कमल-भानु ! आप इस सच्छिष्य को कुलामृत देकर कृतार्थ करें (१८८) । तब कौलों की अनुमति पाकर गुरुदेव शुद्धि के सहित परमामृत से पूर्ण पात्र शिष्य के हाथ में प्रदान करें (१८६) । फिर गुरुदेव हृदय में देवी का ध्यान कर स्रुव में लगी भस्म से शिष्य और कौल साधकों के भ्रू-मध्य में तिलक लगायें (१६०) । इसके बाद सभी कौलों को समस्त प्रसाद-तत्त्व अर्पित कर 'चक्रानुष्ठान' की विधि के अनुसार पान और भोजन करें (१६१)। हे देवि ! यह मैंने तुमसे ब्रह्म-ज्ञान का एकमात्र कारण और शिवत्व-प्राप्ति का उपाय — शुभ 'पूर्णाभिषेक' बताया है (१६२)। नौ, सात, पाँच, तीन या एक रात्रि में 'पूर्णाभिषेक' करे (१६३)। हे कुलेश्वरि ! इस संस्कार के ये पांच 'कल्प' बताए गए हैं। नौ रात्रि के अभिषेक में 'सर्वतोभद्र मण्डल', सात रात्रि के अभिषेक में 'नव-नाभ-मण्डल', पाँच रात्रि के अभिषेक में 'पञ्चाब्ज-मण्डल', तीन और एक रात्रि के अभिषेक में 'अष्ट- दल-कमल' की रचना करे (१६४-६५) । 'सर्वतोभद्र' और 'नव-नाभ' मण्डल में नौ घटों तथा 'पञ्चाब्ज' मण्डल में पाँच घटों की स्थापना करे (१६६) । हे देवि ! 'अष्ट-दल कमल' में केवल एक घट की विधि बताई है । केशरादि में अङ्ग-देवता और आवरण-देवताओं की पूजा करे (१६७) । 'पूर्णाभिषेक' से सिद्ध निर्मल-चित्त कौलों के देखने, छूने और सूंघने से ही द्रव्यों की शुद्धि हो जाती है (१६८) । शाक्त, वैष्णव, शैव, सौर या गाणपत—सभी उपासकों द्वारा कुल-धर्माश्रित साधु यत्नपूर्वक पूजनीय है (१६६) । शाक्तों के लिए शाक्त गुरु, शैवों के लिए शैव गुरु, वैष्णवों के लिये वैष्णव गुरु, सोरों के लिये सौर गुरु और गाणपत के लिये गाणपत गुरु ही प्रशस्त है। 'कौल' सभी के लिए प्रशस्त गुरु है। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति सब प्रकार से 'कौल' से दीक्षा ग्रहण करे (२००-२०१) । जो लोग यत्न करके भक्ति-पूर्वक पञ्च-तत्त्वों के द्वारा कौलों की पूजा करते हैं, वे अपने सभी पूर्वजों का उद्धार करके स्वयं परम गति को प्राप्त होते हैं (२०२) । पशु के मुख से मन्त्र प्राप्त करनेवाला पशु ही होता है, इसमें सन्देह नहीं । जो वीर से मन्त्र लेता है, वह वीर और जो 'कौल' से मन्त्र ग्रहण करता है, वह 'ब्रह्मज्ञ' होता है (२०३) । जिसका 'शाक्ताभिषेक' हुआ है, वही 'वीर' है। अपनो इष्ट-देवता की पूजा-विधि से वह पञ्च-तत्त्वों का शोधन कर सकता है किन्तु 'चक्रेश्वर' नहीं बन सकता (२०४) । वीर की हत्या करनेवाला वृथा अर्थात् अवैध मद्य पीनेवाला, वीर-पत्नी-गामी और चोर अर्थात् विप्र का धन, जिसका मूल्य अस्सी रत्ती स्वर्ण तक हो, उसे चुरानेवाला — ये 'महापापी' हैं और इन चार के सम्पर्क में रहनेवाला व्यक्ति पाँचवाँ 'महा-पापी' है (२०५) ।

ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन । ८६ जो पापी लोग कुल-मार्ग, कुल-द्रव्य और कुल-साधक की निन्दा करते हैं, वे अधोगति को पाते हैं (२०६) । रुद्र डाकिनियाँ और रुद्र भैरव देव कौल-द्वेषी मनुष्यों के मांसास्थि का चर्वण कर आनन्दित हो नृत्य करते हैं (२०७) । दयालु, सत्य-निष्ठ और सदा पर-हितैषी व्यक्ति भी कौलों की निन्दा करके किसी भी प्रकार नरक जाने से बच नहीं सकते (२०८) । बहुत प्रकार के प्रयोग और बहुत से कर्म कहे हैं किन्तु एक-मात्र ब्रह्म-परायण 'कौल' का 'कर्म-त्याग' और 'कर्मानुष्ठान'-दोनों समान फल-दायक होते हैं (२०६) । एकमात्र परम ब्रह्म ही त्रिभुवन में व्याप्त होकर अवस्थित है, अतः विश्व की पूजा करने से वह ब्रह्म की ही पूजा होती है क्योंकि सभी वस्तुएँ ब्रह्म से अन्वित हैं अर्थात् अभिन्न हैं (२१०) । हे प्रिये ! फल में आसक्त, काम-परायण और कर्म-काण्ड में लगे हुए व्यक्ति अलग- अलग भावों से अन्य देवताओं की पूजा करने पर भी ब्रह्म का ज्ञान पाते हैं और ब्रह्म में लय हो जाते हैं (२११) । जो सभी वस्तुओं को ब्रह्म में और सभी वस्तुओं में ब्रह्म को देखते हैं, उन्हें ही 'सत्कौल' और जीवन्मुक्त जाने, इसमें सन्देह नहीं (२१२) ।


ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन अपर्णा देवी वर्णाश्रम-भेद के अनुसार धर्म का विवरण सुनकर बड़ी प्रसन्न हुईं और उन्होंने शङ्कर से पूछा (१) । श्री देवी ने कहा-हे प्रभो ! आप सर्वज्ञ हैं । संसार-यात्रा में सफलता हेतु आपने वर्ण और आश्रम के आचार, धर्म और संस्कारों को बताया है (२) । किन्तु कलि-काल के मनुष्य काम-क्रोधादि से बुद्धि-हीन, नास्तिक, श्रद्धालु और सदा इन्द्रिय-सुख चाहनेवाले होंगे (३) । हे ईशान ! मूर्ख लोग आपके बताए अनुष्ठान को न करेंगे, उनकी क्या गति होगी ? इसे विशेष रूप से बतायें (४) । श्री सदाशिव ने कहा-हे देवि ! तुमने उत्तम प्रश्न किया है। तुम जगत् की जननी, जन्म और संसार- बन्धन से छुड़ानेवाली दुर्गा हो (५) । इस चराचर जगत् को तुम्हीं बनाए रहती हो (६) । तुम्हीं पृथ्वी, तुम्हीं जल, तुम्हीं वायु, तुम्हीं अग्नि, तुम्हीं आकाश, तुम्हीं अहङ्कार और तुम्हीं महत्-तत्त्व-स्वरूपा हो (७) । इस संसार में तुम्हीं समस्त जीव, तुम्हीं विद्या, तुम्हीं परम-देवता, तुम्हीं इन्द्रिय-समूह, तुम्हीं मन, तुम्हीं बुद्धि, तुम्हीं जगत् को गति और स्थिति हो (८) । तुम्हीं समस्त वेद, तुम्हीं प्रणव, तुम्हीं समस्त स्मृतियाँ, तुम्हीं महा-भारतादि समस्त संहिता, तुम्हीं निगम, तुम्हीं आगम, तुम्हीं तन्त्र, तुम्हीं सर्व-शास्त्र-मयी, तुम्हीं शिवा (६), तुम्हीं महा- काली, महा-लक्ष्मी, महा-नील-सरस्वती, महोदरी, महा-माया, महा-रौद्री एवं महेश्वरी हो (१०) । तुम्हीं सर्वज्ञा, ज्ञान-मयी हो, अतः तुमसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। हे प्राज्ञे ! फिर भी इस समय तुम जो पूछती हो, उसे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए बताता हूँ (११) । हे देवि ! कलियुग के मनुष्यों का आचरण तुमने ठीक ही बताया है। अपने हित की बात जानकर भी तुरन्त सुख देनेवाले पाप में मस्त होकर हिताहित की विवेचना से रहित हो वे सत्पथ पर नहीं चलते। उन लोगों की मुक्ति के लिए जो कर्त्तव्य है, उसे कहता हूँ (१२-१३) । निषिद्ध कर्म करना और विहित कर्म को छोड़ फा०-१२

६० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र देना—ये दोनों बातें ही मनुष्य के दुःख और रोगादि देनेवाले पाप को उत्पन्न करती हैं (१४)। हे कुल-नायिके ! यह पाप दो प्रकार का है—१. केवल अपना अनिष्ट करनेवाला, जैसे सन्ध्यादि दैनिक कर्म न करने से और २. दूसरों का भी अनिष्ट करनेवाला, जैसे ब्रह्म-हत्यादि से (१५) । राज-दण्ड द्वारा दूसरों का अनिष्ट-दायक पाप से मुक्ति पा सकते हैं। प्रायश्चित्त और समाधि द्वारा अन्य प्रकार के पाप से मुक्ति मिलती है (१६) । जो पापी प्रायश्चित्त या राज-दण्ड से पवित्र नहीं होते, वे इस लोक में निन्दित होकर परलोक में नरक से छुटकारा नहीं पाते अर्थात् चिर काल तक नरक में रहते हैं (१७) । हे आद्ये ! पहले राज-शासन का निर्णय बताता हूँ। हे महेश्वरि ! इस शासन के न करने से राजा अधम गति को पाता है (१८) । शासन में राजा भृत्य, पुत्र, प्रिय या अप्रिय—सभी को समान दृष्टि से देखे (१६) । यदि राजा स्वयं पापाचार करता है, तो वह उपवास और दान द्वारा अपने को शुद्ध करे। यदि निर्दोष व्यक्तियों को वह दण्ड दे जाय, तो दान द्वारा उन सभी निर्दोषियों को सन्तुष्ट कर उपवास द्वारा शुद्ध हो (२०) । राजा यदि ऐसा पाप करे, जिसके लिए वह मृत्यु-दण्ड का पात्र बनता हो, तो वह राज्य को छोड़कर वन में जाए और तपस्या द्वारा अपना उद्धार करे (२१) । राजा बड़े पाप के लिए छोटा और छोटे पाप के लिए बड़ा दण्ड न दे (२२) । जिसे बहु-संख्यक् कुमार्गी व्यक्तियों पर शासन करना पड़े, उसे पाप से न डरनेवाले व्यक्ति के छोटे अपराध के लिए बड़ा दण्ड देना भी उचित है (२३) । केवल एक बार अपराध के लिए लज्जा युक्त, प्रतिष्ठित एवं पाप से डरनेवाले व्यक्ति के बड़े पाप के लिए छोटा ही दण्ड देना उचित है (२४) । यदि बहु-मान्य कौल व्यक्ति छोटे अपराध का अपराधी हो या उसी प्रकार का ब्राह्मण व्यक्ति छोटा पाप करे, तो राजा उन्हें वाग्- दण्ड दे (२५) । जो राजा मन्त्रियों के साथ विचार कर न्याय-दण्ड और पुरस्कार का निर्णय नहीं करता, वह महा-पापी होता है (२६) । पुत्र पिता-माता का त्याग न करे, प्रजा राजा का त्याग न करे और विनय-सम्पन्ना पत्नी पति का त्याग न करे; वे अति पापी हों, तभी त्याज्य हैं (२७) । प्रजा के लोग धार्मिक राजा के राज्य, धन और जीवन की यत्न से रक्षा करें अन्यथा उन्हें अधोगति मिलती है (२८ । हे शिवे ! जो जान-बूझकर माता, बहन, पुत्री गमन करते हैं या जान कर बहुत बड़ी हत्या करते हैं या कुल-धर्म का आश्रय लेकर पुनः कुल-कर्मों का अनुष्ठान छोड़ देते हैं और विश्वास-घाती हैं, वे अति-पापी हैं (२६-३०) । माता, बहिन या पुत्री गमन करनेवाले के लिए मृत्यु-दण्ड विहित है; इस कार्य में इच्छा रखनेवाले माता, बहिन या पुत्री के लिए भी यही दण्ड है (३१) । विमाता, बुआ, बहू, सास, गुरु-पत्नी, पितामही, नानी, चाचा की पुत्री, ममेरी बहन, चाची, मामी, भाभी, भतीजी, भांजे की पत्नी, स्वामी की पत्नी, स्वामी की पुत्री या कुमारी गमन करनेवाले पापियों के लिए लिङ्गच्छेद का दण्ड विहित है। इस दुष्कार्य में इच्छा रखनेवाली इन सभी स्त्रियों के पाप-मोचन के लिए नासिका-छेदन और घर से निष्कासन ही दण्ड है (३२-३४) । सपिण्ड की पत्नी या पुत्री और विश्वासी व्यक्ति की पत्नी गमन करनेवाले का सर्वस्व-हरण और मस्तक-मुण्डन ही दण्ड है (३५) । यदि अज्ञानवश पूर्वोक्त किसी नारी के साथ ब्राह्म या शैव विधि से विवाह हुआ हो, तो इस अकार्य का ज्ञान होते ही उस स्त्री का त्याग कर दे (३६) । जो व्यक्ति सजातीय पर-पत्नी गमन करे या जो अपनी अपेक्षा हीन जाति की पर-स्त्री अर्थात् चाण्डालादि अपकृष्ट जाति से भिन्न हीन-वर्ण की पर-स्त्री से गमन करे, उसे पर्याप्त अर्थ-दण्ड और एक मास तक कण-भोजन का दण्ड दे (३७) हे वरानने ! जानकर ब्राह्मणी-गमन करने- वाले क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या सामान्य जाति के व्यक्ति का लिङ्गच्छेद-रूप दण्ड कहा है (३८) । इस कर्म में इच्छा रखनेवाली ब्राह्मणी को विकृत अर्थात् अङ्ग-हीना कर राजा देश से निकाल दे और जो वीराचारियों की पत्नी से गमन करे, उसका लिङ्गच्छेद और इस कुक्रिया में आसक्त वीर-पत्नी आदि को विकृता कर देश से निकालना

ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन । ६१ ही दण्ड है (३६) । जो पापी प्रतिलोम अर्थात् उच्च-जातीय पर-स्त्री के साथ कुक्रिया करे, उसका सर्वस्व-हरण कर उसे तीन मास तक कण-भोजन का दण्ड दे (४०)। इस दुष्कर्म में इच्छा रखनेवाली सभी स्त्रियों के लिए भी ऐसा ही दण्ड है। यदि पत्नी पर अन्य बलात्कार करे, तो स्वामी उस पत्नी का त्याग करे किन्तु उसका पालन-पोषण उसे करना होगा (४१) ब्राह्मी या शैवी भार्या यदि इच्छा या अनिच्छा से एक बार पर-पुरुष-गता हो, तो उसका त्याग सर्वथा उचित है (४२)। हे देवेशि ! वाराङ्गना (वेश्या) या गो आदि पशु-योनि से गमन करनेवाले की शुद्धि तीन रात्रि कण-भोजन से होती है (४३) । जो पापी स्त्रियों के गुह्य में गमन करते हैं, उन्हें राजा मृत्यु-दण्ड दे (४४)। यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से चाण्डाल-कन्या भी गमन करे, तो उसे मृत्यु-दण्ड दे (४५)। जो कन्याएँ ब्राह्म या शैव विवाह द्वारा परिणीता हैं, वे ही भार्यायें हैं। उनसे भिन्न स्त्रियाँ पर-स्त्रियाँ हैं (४६)। जो व्यक्ति सकाम होकर पर-स्त्री का दर्शन करे, वह एक दिन उपवास कर शुद्ध होता है। जो व्यक्ति सकाम होकर पर-स्त्री से एकान्त में बातें करता है, वह दो दिन उपवास करके और जो पर-स्त्री को छूता है, वह चार दिन उपवास करके तथा जो पर-स्त्री का आलिङ्गन करता है, वह आठ दिन उपवास कर शुद्ध हो सकता है (४७) । जो कुलाङ्गना सकामा होकर पर-पुरुष के साथ यह सब करती है, वह भी उक्त अनुसार अपने को शुद्ध कर सकती है (४८) । स्त्रियों को कुत्सित बात कहने, उनके गुप्त स्थान को देखने, उन्हें देखकर हँसने पर दो दिन के उपवास द्वारा शुद्धि होती है (४६) । जो व्यक्ति अपने को नङ्गा दिखाता है और जो दूसरे को नंगा करता है, वह तीन रात्रि तक आहार छोड़ने से शुद्ध होता है (५०) । यदि पति अपनी पत्नी के पर-पुरुष- संसर्ग को प्रमाणित कर दे, तो राजा उस व्यभिचारिणी स्त्री और उसके उप-पति को शास्त्रानुसार दण्ड दे (५१)। यदि स्वामी पत्नी के उप-पति-संसर्ग को प्रमाणित करने में असमर्थ हो, तो उस स्त्री का परित्याग कर उसका भरण-पोषण करता रहे, यदि वह स्त्री पति के आदेश में रहे (५२)। स्वामी पत्नी को उप-पति से रत देखकर यदि तुरन्त स्त्री-सहित उपपति को मार डाले, तो राजा उसे कोई दण्ड न दे (५३) । जहाँ जाने या जिससे बात करने को पति ने मना किया है, वहाँ यदि कुल-स्त्री जाती है या बात करती है, तो वह पति द्वारा त्याज्या है (५४) । स्वामी की मृत्यु होने पर पति के बन्धुओं के पास या उनके अभाव में पितृ-कुल के अधीन रह कर अपने धर्म का पालन करनेवाली स्त्री पति की सारी सम्पत्ति पाती है (५५)। विधवा दो बार भोजन, परान्न-भोजन, मैथुन, आमिष-भोजन, भूषण, पलंग पर सोना, रक्त वस्त्र पहनना छोड़ दे (५६) । वैधव्य धर्म स्वीकार कर सुगन्धि-द्रव्य शरीर में न लगाए, ग्राम्य आलाप छोड़ दे, सदा देव-पूजा में लगी रहकर समय बिताए (५७) । जिस बालक के पिता, माता या पितामह नहीं हैं, उसके पालन के लिए मातृ-कुल के मातृ-बन्धु प्रशस्त हैं (५८) । नानी, नाना, मामा, ममेरे भाई और नाना के भाई—ये सब मातृ-बन्धु हैं (५६) । आजी, बाबा, चाचा, चचेरे भाई, बाबा के भाई—ये सब पितृ-बन्धु हैं (६०) । सास, ससुर, देवर, देवर-पुत्र, पति की बहन के पुत्र, ससुर के भाई—ये सब पति-बान्धव हैं (६१) । पिता, माता, बाबा, आजी, पत्नी, पुत्र-हीन नाना- नानी—इन सबके दरिद्र होने पर राजा यथा-शक्ति इन्हें अन्न-वस्त्र प्रदान करे (६२-६३) । अपनी पत्नी को दुर्वाक्य कहने पर एक दिन, पत्नी को पीटने पर तीन रात्रि और पीटने से यदि पत्नी का खून गिरे तो सात रात्रि तक भोजन का त्याग करे (६४) । क्रोध या मोह-वश भार्या को माता, बहन या बेटी कहे, तो सात रात्रि उपवास करने से शुद्धि होती है (६५) । कन्या का विवाह नपुंसक से हो और बहुत समय बीतने पर भी यह बात मालूम हो तो राजा उस कन्या का पुनः विवाह कराए, यही शिवोक्त विधि है (६६) । यदि कन्या विवाहिता होकर पति के सहवास के पूर्व

६२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र विधवा हो जाय, तो पिता उसका पुनर्विवाह करे। शैव धर्म में ऐसी ही विधि है (६७)। विवाह के बाद बारह पक्ष अर्थात् छः मास में या स्वामी की मृत्यु के एक वर्ष बाद जो स्त्री परिपुष्ट सन्तान को जन्म दे, वह उस स्वामी की पत्नी नहीं और वह पुत्र भी उसका पुत्र नहीं (६८) । गर्भाधान से पाँचवें महीने के बीच में जो स्त्री जानकर गर्भपात करे, उस स्त्री को और जो व्यक्ति उस गर्भपात का उपाय करे, उसको राजा तीव्र ताड़न द्वारा पीड़ित करे (६६)। पाँचवें मास के बाद जो स्त्री गर्भपात करे, उसे और जो व्यक्ति उसका उपाय करे, उसे हत्या-जन्य पाप होता है (७०) जो क्रूर-कर्मा मनुष्य जानकर नर-हत्या करे, उसे राजा अवश्य मृत्यु-दण्ड दे (७१)। प्रमाद या भ्रम-वश अनजान में मनुष्य-हत्या करनेवाले व्यक्ति को राजा अर्थ-दण्ड एवं कठिन ताड़ना द्वारा शुद्ध करे (७२)। जो स्वयं या अन्य द्वारा वध का उपाय करे, उस पापी को भी अज्ञानपूर्वक हत्या करनेवाले के समान ही दण्ड विहित है (७३)। हे परमेश्वरि ! परस्पर युद्ध करते समय एक को दूसरा मार डाले या आततायी मनुष्य को मारनेवाला पाप-भागी नहीं होता (७४) । पाप करने की इच्छावाला व्यक्ति अन्य का अङ्गच्छेद करे, तो राजा उसका भी अङ्गच्छेदन करे और अन्य पर प्रहार करे, तो उस पर भी प्रहार करे (७५)। जो पापी ब्राह्मण या गुरु के प्रति प्रहार के लिए डण्डा आदि उठाए, उसे राजा क्रमशः उसकी धन-सम्पत्ति जप्त करके या हस्त-दाहन द्वारा विशुद्ध करे (७६) । शस्त्र द्वारा घायल व्यक्ति की छः मास तक मृत्यु हो जाने पर प्रहार-कर्ता दण्डनीय होता है किन्तु मृत्यु-दण्ड का भागी नहीं होता (७७) । राज्य-विद्रोही, राज्य-हरण का इच्छुक, गुप्त रूप से राज-शत्रुओं का हित चाहनेवाला, राजा-सहित सैन्य का भेद लेनेवाला, राजा से युद्ध करने का इच्छुक, शस्त्र धारण कर प्रजा और पथिकों को पीड़ित करने- वाला—इन सबका विनाश करने से राजा पाप-भागी नहीं होता (७८-७६)। जो व्यक्ति स्वामी की अनिवार्य आज्ञा से नर-हत्या करता है, उसके स्थान पर स्वामी ही मृत्यु-दण्ड का भागी है—हत्या करनेवाला बध्य नहीं है (८०) । असावधान पुरुष के अस्त्र या पशु द्वारा किसी की मृत्यु होने पर अर्थ-दण्ड या शारीरिक दण्ड द्वारा उसकी शुद्धि होती है (८१)। राजा की आज्ञा न माननेवाला, राजा के सामने विवाद करनेवाला, कुल-धर्म की निन्दा करनेवाला—राजा इन सभी गर्हित व्यक्तियों को दण्डित करे (८२)। पथिकों का धन हरण करने- वाले, क्रूर, ठग, भेदिया और लोगों में झगड़ा बढ़ानेवाले दुष्टों को राजा देश से निकाल दे (८३)। जो शुल्क लेकर कन्या या पुत्र का दान करें या जो जानकर नपुंसक को कन्या दें, उन पापियों को राजा देश से निकाल दे (८४)। मिथ्यापवाद द्वारा अन्य का अनिष्ट करने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों को धर्मज्ञ राजा अपवाद के अनुरूप दण्डित करे (८५)। जो व्यक्ति जिस परिमाण में अनिष्ट करे, उतना ही उस पर अर्थदण्ड कर अनिष्ट- भागी व्यक्ति को राजा धन प्रदान करे (८६)। मणि-मुक्ता या सुवर्णादि धातु के मूल्य का विचार कर चोर के हाथ या दोनों बाहु कटवा दे (८७) । बलपूर्वक भैंस, घोड़ा, गाय आदि पशु, रत्नादि या शिशु-सन्तान के अप- हरण करनेवालों के लिए भी चोर के ही समान दण्ड विहित है (८८)। अन्न या कम मूल्य के द्रव्य के चोर को राजा एक पक्ष या सप्ताह कण-भोजन कराकर शोधित करे (८६) । हे सुर-पूजिते ! विश्वास-घातक या कृतघ्न की निवृत्ति यज्ञ, व्रत, तपस्या या दान आदि किसी प्रायश्चित्त द्वारा नहीं होती (६०)। जो लोग कूट-साक्षी हैं अर्थात् मध्यस्थ होकर जो पक्षपात करते हैं, राजा उन्हें तीव्र दण्ड द्वारा शासित करे और देश से बाहर निकाल दे (६१) । छः, चार या तीन लोगों को साक्षी का प्रमाण है। अभाव में एक व्यक्ति को साक्षी मान्य है, जो प्रसिद्ध और धार्मिक हो (६२)। हे प्रिये ! देश, काल और विषय-विशेष में जो परस्पर-विरुद्ध वाक्य बोलें, उन साक्षियों की बात अग्राह्य है (६३) । अन्धे और बहरे लोगों

ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६३ की बात प्रमाण होती है। मूक (गंगे) और हकलानेवाले का सिर हिलाना स्वीकृति तथा प्रमाण के लिए उनकी लिपि ग्रहण करे (६४) सभी स्थानों में सभी के लिए लिपि ही प्रशस्त प्रमाण है, विशेष कर व्यवहार के स्थान में क्योंकि बहुत समय तक यह नष्ट नहीं होती (६५)। जो व्यक्ति अपने लिए या दूसरे के लिए जाली लिपि करते हैं, उन्हें कूट-साक्षी का दण्ड दूना करके दे (६६) । भ्रम और प्रमाद-रहित व्यक्ति अपने विषय में मात्र एक बार स्वीकार करे, तो बहु साक्षियों के होने पर भी, प्रमाण है (६७)। हे पार्वति ! जिस प्रकार सत्य का आश्रय लेकर सभी पुण्य रहते हैं, उसी प्रकार एकमात्र मिथ्या का आश्रय लेकर सभी पाप रहते हैं (६८) । अतः जो व्यक्ति सत्य-हीन है, वह सब पापों का आश्रय है। ऐसे पापात्मा का ताड़न और दमन करने से राजा पाप का भागी नहीं होता (६६) । 'मैं जो कहूँगा, वह सत्य है,' इस प्रकार संकल्प कर कौल गुरु, ब्राह्मण, गङ्गा-जल, देव-मूर्ति, कुल-शास्त्र, कुलामृत, देव-निर्माल्य—इन सबको स्पर्श कर जो कहा जाता है, उसका नाम 'शपथ' है। यह 'शपथ' लेकर जो मिथ्या बोलता है, वह एक कल्प तक नरक में रहता है (१००-१०१)। जो कार्य पाप-जनक नहीं है, उसका त्याग या ग्रहण, जो 'शपथ' के साथ स्वीकृत हो, वह अवश्य कर्तव्य है (१०२)। स्वीकृत बात का जानकर उल्लंघन करने से एक पक्ष निराहार द्वारा शुद्धि होती है। भ्रम-वश उल्लंघन हो, तो बारह दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होती है (१०३) यदि कुल-धर्म का पालन सत्य विधि से न करे, तो वह मोक्ष और मंगल-दायक नहीं होता, उस कौल-व्यक्ति के लिए केवल पाप-जनक ही होता है (१०४) । 'सुरा' द्रव-मयी तारा है अर्थात् द्रव-पदार्थ के रूप में परिणता 'तारा' है। अतः जीवों के लिए मोक्षदा, भोग और मुक्ति की कारण तथा रोग व विपत्ति की नाशिनी है (१०५) । हे प्रिये ! 'सुरा' सभी पापों को भस्म करती है; 'सुरा' द्वारा जगत् पवित्र है, 'सुरा' सब प्रकार की सिद्धि देती है और 'सुरा' ज्ञान, बुद्धि व विद्या को बढ़ाती है (१०६)। हे आद्ये ! मुक्त, मुमुक्षु, सिद्ध गण, साधक-जन, राजा और देव लोग अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए इसी 'सुरा' का सदा सेवन करते हैं (१०७) । जो शास्त्र में निर्दिष्ट नियम का और सावधान- चित्त से 'सुरा' पान करते हैं, वे पृथिवी पर मर्त्य होकर भी अमर्त्य (अर्थात् देव-समान) होते हैं (१०८)। पञ्च- तत्त्वों में से प्रत्येक तत्त्व विधि-पूर्वक सेवन करने से मनुष्य शिव-स्वरूप होता है और पाँचों तत्त्वों का सेवन करने का क्या फल होता है, उसे मैं नहीं जानता अर्थात् ज्ञान से परे फल होता है (१०६) । यदि विधि को छोड़कर कोई इस वारुणी देवी का पान करता है, तो वह पान करनेवाले की बुद्धि, आयु, यश, धन-सब कुछ नष्ट कर देती है (११०)। जो प्रमत्त चित्त से अत्यधिक 'सुरा' सेवन करता है, उसका धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-साधक ज्ञान नष्ट हो जाता है (१११)। अति 'मद्य' पीनेवाला कार्याकार्य-विचार-हीन, विभ्रान्त-बुद्धि मनुष्य पग-पग पर अपना और दूसरे का अनिष्ट करता है (११२)। अतः 'मद्य' या मादक वस्तु में अत्यन्त आसक्त व्यक्तियों को राजा या चक्रेश्वर शारीरिक दण्ड या अर्थ-दण्ड द्वारा शुद्ध करे (११३) । 'सुरा' अधिक मात्रा में पी हो या थोड़ी ही मात्रा में, वह 'सुरा'-भेद से, व्यक्ति-भेद से, देश-भेद से और काल-भेद से बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है (११४) । अतः लड़खड़ाती वाणी, काँपते हाथों, डगमगाते पैरों और अस्थिर दृष्टि द्वारा अतिरिक्त पान का निर्णय करे क्योंकि 'सुरा' के परिमाण से अति-पान को नहीं जान सकते (११५) । राजा अवशेन्द्रिय, मद से व्याकुल चित्तवाले और देवता व गुरु की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले, भय-प्रद, सभी प्रकार के अनर्थ को तैयार, शिव-घाती पापी की जीभ जलवा दे, उसका धन छीन ले और उसे ताड़ना दे (११६-१७)। जिसके पैर, वचन और हाथ विचलित हों; जो भ्रमित, उन्मत्त, उद्धत हो, उस उग्र व्यक्ति को राजा दण्ड देकर उसका धन छीन ले (११८) । जो व्यक्ति मत्त होकर अश्लील वाक्य बोले, लज्जा और भय

६४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र से हीन हो, राजा उसका धन छीनकर उसे दण्डित करे (११६) । हे कुलेश्वरि ! सौ बार अभिषिक्त कौल यदि अति-पान करे, तो उसे कुल-धर्म-बहिष्कृत और पशु ही माना जाता है (१२०) । 'मद्य' शोधित हो या अशोधित, जो व्यक्ति उसे अति पान करता है, वह कौल-गण द्वारा त्याज्य और राजा द्वारा दण्डनीय है (१२१) । यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य मत्त होकर ब्राह्म-धर्म की विधि के अनुसार परिणीता पत्नी को 'मद्य'-पान कराए, तो उस भार्या के सहित पाँच दिन कण-भोजन करने से शुद्धि होतो है (१२२)। असंस्कृत 'सुरा' पीनेवाला तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है। यदि कोई व्यक्ति अशोधित 'मांस' खाता है, तो उसे दो दिन उपवास करना होगा (१२३) । यदि कोई व्यक्ति असंस्कृत 'मत्स्य' और 'मुद्रा' खाता है, तो उसे एक दिन उपवास करना चाहिए। यदि कोई विधि का उल्लंघन कर पञ्चम तत्त्व की सेवा करे, तो वह व्यक्ति राज-दण्ड द्वारा शुद्ध होता है (१२४) । हे शिवे ! यदि कोई व्यक्ति जानकर मनुष्य या गाय का मांस खाता है, तो वह एक पक्ष उपवास द्वारा शुद्ध होता है, यही उसका प्रायश्चित्त है (१२५) । जो मनुष्याकृति वाले पशु या मांस खानेवाले जीव का मांस खाता है, वह तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१२६) । जो म्लेच्छ, यवन, चाण्डाल या कुलाचार-विरोधी पशु का अन्न खाता है, उसको शुद्धि एक पक्ष के उपवास से होती है (१२७) । हे कुलेश्वरि ! जो अनजान में पूर्वोक्त व्यक्तियों का जूठा खा लेता है, वह एक पक्ष के उपवास से और जो जानकर खाता है, वह एक मास के उपवास से शुद्ध होता है (१२८) । जो व्यक्ति एक बार अनुलोम जाति अर्थात् क्रमशः नीच जाति का अन्न खाता है—यथा ब्राह्मण क्षत्रिय का अन्न खाए, क्षत्रिय वैश्य का अन्न खाए इत्यादि तो वह तीन दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१२६) । यदि पशु, चाण्डाल या म्लेच्छ का अन्न 'चक्र' में अर्पित हो या 'वीर' व्यक्ति के हाथ द्वारा दिया जाय, तो उसे खाने में कोई पाप-भागी नहीं होता (१३०) । अन्नाभाव, दुर्भिक्ष, विपत्-काल या प्राण-संकट के समय निषिद्ध भोजन करके प्राण-रक्षा करनेवाला पाप-भागी नहीं होता (१३१) । हाथी की पीठ पर, अनेक लोगों द्वारा वहनीय प्रस्तर या काष्ठासन पर और दूषित पदार्थ का यदि लक्ष्य न हो तो भक्ष्य- दोष नहीं होता (१३२) । हे प्रिये ! जिन पशुओं का मांस अभक्ष्य है, जो पशु रोगी हैं, उन्हें देवता के लिए न मारे, मारने से पाप होता है (१३३) । जानकर गो-हत्या हो, तो 'कृच्छ्र-व्रत' करे। अनजान में गो-हत्या हो जाय, तो आधा 'कृच्छ्र-व्रत' करे (१३४) । जब तक इस व्रत को न कर ले, तब तक क्षौर-कर्म, नाखून काटना, वस्त्र धोना आदि न करे (१३५) । एक मास उपवास में बिताकर, एक मास कण खाकर व एक मास भिक्षान्न खाकर बिताना ही 'कृच्छ्र-व्रत' है (१३६) । व्रत पूरा होने पर कौलों को जातिवालों को और बन्धु-बान्धवों को भोजन कराने से जान कर की गई गो-हत्या के पाप से मुक्ति मिलती है (१३७) । हे शिवे ! ठीक से पालन न करने से हुई गो-हत्या का पाप आठ दिन के उपवास से दूर होता है किन्तु क्षत्रिय छः दिन, वैश्य चार दिन, शूद्र दो दिन, उपवास कर इस पाप से छूट जाता है (१३८) । इच्छा करके हाथी, ऊँट, भैंसे और घोड़े की हत्या करनेवाला पापी मनुष्य तीन दिन के उप- वास से शुद्ध होता है (१३६) । हिरण, भेंड़, बकरे और बिल्ली की हत्या करने पर एक दिन का उपवास करे । मोर, तोते या हंस की हत्या करने पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास करे (१४०) । अस्थि-युक्त जीव की हत्या करने पर एक रात्रि निरामिष भोजन करे। अस्थि-हीन जीव की हत्या करने पर दुःख करने से ही शुद्धि होती है (१४१) । हे देवि ! शिकार करते समय पशु, मछली या अण्डज जीव की हत्या करने से राजा पापी नहीं होता क्योंकि यह उसका नित्य-धर्म है (१४२) हे भद्रे ! देवता के लिए जो कर्म हैं, उन्हें छोड़कर अन्य सभी कर्मों में हिंसा वर्जित है। वैध हिंसा करने से मनुष्य पाप से लिप्त नहीं होता है (१४३) । सङ्कल्पित व्रत पूरा न कर सके, देव-निर्माल्य को लांघ जाय, अशौच-काल में देव-प्रतिमा को छू ले, तो

ग्यारहवाँ उल्लास : पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन | ६५ गायत्री का जप करे (१४४)। माता, पिता और ब्रह्म-दाता—ये महा-गुरु हैं। जो इनकी निन्दा करता है या इन्हें कठोर बात कहता है, वह पाँच दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१४५)। जो इसी प्रकार किसी अन्य गुरु, कौल या ब्राह्मण की निन्दा करता है या कटु बात करता है, वह ढाई दिन के उपवास से पाप-मुक्त होता है (१४६)। धनार्थी मनुष्य सभी देशों में जा सकते हैं किन्तु जिस देश या शास्त्र में कौलाचार निषिद्ध हो, उस देश और शास्त्र को छोड़ दे (१४७)। जिस देश में कौलाचार निषिद्ध है, उसमें इच्छानुसार जाने से कुल-धर्म से गिरना पड़ता है और तब पुनः पूर्णाभिषेक द्वारा ही वह शुद्ध हो पाता है (१४८)। सूर्योदय से आठ पहर तक निराहार रहना ही 'उपवास' है। प्रायश्चित्त में यही विहित है (१४६)। प्राण-धारण के लिए एक अञ्जलि जल पीने या हवा खाने से 'उपवास' से भ्रष्ट नहीं होता (१५०)। वृद्धावस्था या शारीरिक पीड़ा से 'उपवास' में असमर्थ हो, तो प्रत्येक 'उपवास' के अनुकल्प में बारह ब्राह्मणों को भोजन कराए (१५१)। दूसरे की निन्दा, अपनी प्रशंसा या दुःखदायी अनुचित बात कहने या अवैध कार्य करने पर केवल परिताप से शुद्धि होती है (१५२)। इनके सिवा जान या अनजान में किए सभी पाप गायत्री देवी की उपासना और कौल भोजन द्वारा नष्ट होते हैं (१५३)। पुरुषों के लिए जो साधारण नियम विहित हैं, वही स्त्रियों और नपुंसक लोगों के प्रति भी प्रयोग करे किन्तु स्त्रियों के सम्बन्ध में यह विशेष बात है कि उनके पति ही महा-गुरु हैं (१५४)। महा-व्याधि से ग्रस्त चिर- रोगी लोग स्वर्ण-दान से पवित्र होकर देव और पितृ-कर्म में अधिकारी होते हैं (१५५)। अपमृत्यु या विद्युदग्नि से दूषित घर को 'भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा, स्वः स्वाहा'—इन शत-संख्यक व्याहृतियों द्वारा होम कर शुद्ध करे (१५६)। बावली, कुएँ, तालाब आदि में अस्थि-युक्त शव दिखने पर उस शव को बाहर निकालकर उन्हें शुद्ध करे (१५७)। उनके शोधन की विधि यह है कि इक्कीस घड़े विशुद्ध जल को पूर्णाभिषेक-मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर उस जल को उक्त बावली आदि में छोड़ दे (१५८)। यदि उक्त बावली आदि में जल थोड़ा ही हो और वह शव की दुर्गन्ध से दूषित हो गया हो, तो कीचड़ सहित वह सारा जल बाहर करने के बाद उक्त विधि से मन्त्रित जल उसमें छोड़े (१५६)। उक्त जलाशय में यदि हाथी बराबर बहुत जल हो, तो एक सौ घड़े जल उससे बाहर निकालकर पूर्वोक्त अभिषेक मन्त्रों से पवित्र इक्कीस घड़े जल को उसमें छोड़कर उसे शुद्ध करें (१६०)। शव से छुआ जलाशय यदि इस विधि से शोधित न हो, तो उसका जल न पिए और वैसे जलाशय की प्रतिष्ठा भी न करे (१६१)। उसके जल में स्नान या उसके द्वारा किया गया कोई भी कर्म वृथा होता है। यदि स्नान या कोई कर्म कर ले, तो एक दिन निराहार रहकर पञ्चामृत पीने से शुद्धि होती है (१६२)। जो धनी होकर याचना करता है, वीर होकर युद्ध से मुख मोड़ता है, जो कुल-धर्म को दोष लगाता है, जो कुल-स्त्री होकर सुरा-पान करती है, जो मित्र से द्रोह करता है, जो पण्डित होकर स्वयं पापाचार करता है—ऐसे पापी व्यक्ति को जो देख ले, वह सूर्य का दर्शन कर विष्णु का स्मरण करे और पहने हुए वस्त्रों सहित स्नान करे, तो उन्हें देखने से हुए पाप से मुक्त होगा (१६३-६४)। जो द्विजाति होकर गधे, मुर्गे या सुअर का बेचता है या किसी अन्य नीच कर्म को करता है, वह तीन दिन के व्रतानुष्ठान से शुद्ध होता है (१६५)। हे अम्बिके ! तीन दिन व्रत की विधि यह है कि एक दिन निराहार, एक दिन कण-भोजन और एक दिन जल-पान करे (१६६)। बन्द द्वार वाले घर में यदि कोई बिना बुलाए प्रवेश करता है या जो बात बताने से मना की गई है, उसे कोई कह दे, तो पाँच दिन आहार छोड़ना पड़ता है (१६७)। जो अहंकार-युक्त होकर आनेवाले गुरु-

६६ । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जन को देखकर खड़ा नहीं होता, वह एक दिन के उपवास से शुद्ध होता है (१६८) । अच्छी तरह से स्पष्ट अर्थ- वाले इस शिव-प्रणीत शास्त्र का जो लोग कूट अर्थ करेंगे, वे पतित होकर अधोगति को प्राप्त करेंगे (१६६) । हे देवि ! तुमसे जो कहा है, वह सार का भी सार है और उत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट धर्म है, पवित्र करनेवाला है, कल्याणकारी है और इह-लोक तथा परलोक में परमार्थ देनेवाला है (१७०) । बारह्वाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन श्री सदाशिव ने कहा—हे आद्ये ! मैं तुम्हें पुनः सनातन व्यवहार बताता हूँ । इस व्यवहार की रक्षा करने से राजा स्वच्छन्द होकर प्रजा का पालन कर सकता है (१) । राजा के नियम को न मानने से मनुष्य धन-लोलुप होकर गुरुजनों, स्वजनों और बन्धु-बान्धवों के साथ झगड़ा करने लगेंगे (२) । हे देवि ! धन के लिए एक दूसरे पर चोट करेंगे और हिंसा, धन चुराने की इच्छा के कारण पापी होंगे (३) । अतः मनुष्य के कल्याण के लिये मैं धर्म-सम्मत राज-नियम बनाता हूँ। इन नियमों के मानने से मनुष्यों का कभी अमंगल न होगा (४) । राजा पापों के निवारण के लिए जिस प्रकार पापियों के दण्ड का विधान करे, उसी प्रकार मनुष्यों के सम्बन्ध-भेद के अनुसार दाय (संपत्ति) का भी विभाजन करे (५) । विवाह और जन्म के भेद से संबंध दो प्रकार के होते हैं, जिनमें से जन्माधीन संबंध अत्यन्त बली होता है (६) । हे शिवे ! धन के अधिकार के विषय में ऊर्ध्व- तन संबंध की अपेक्षा अधस्तन संबंध श्रेष्ठ है । इसी प्रकार अधः-ऊर्ध्व-क्रम से स्त्री-जाति की अपेक्षा पुरुष-जाति ही श्रेष्ठ है (७) । इनके बीच अधिकतर निकट संबंध के क्रम से दाय (संपत्ति) का अधिकारी होता है । पण्डित लोग इसी विधि के अनुसार यथा-क्रम धन का विभाग करते हैं (८) । मृत व्यक्ति के यदि पुत्र, पौत्र, कन्या, पिता और पत्नी आदि जीवित हैं, तो पुत्र ही धन का अधिकारी होगा, अन्य कोई नहीं (६) । जहाँ सन्तान बहुत हैं, वहाँ सभी पुत्र समान अंश प्राप्त करेंगे, किन्तु वंशानुक्रम से 'ज्येष्ठ पुत्र' ही राज्याधिकारी होगा (१०) । यदि पैतृक ऋण है, तो पैतृक धन में से ही उसे चुकाना होगा क्योंकि ऋण के रहते पैतृक धन का विभाग करना उचित नहीं है (११) । यदि ऋण के रहते पुत्रों में पैतृक धन बँट गया हो, तो राजा उनसे वह धन लेकर पैतृक ऋण को चुकाये (१२) जिस प्रकार पाप करने से अपने को ही नरक में जाना होता है, उसी प्रकार अपने ऋण से अपने को ही बँधना पड़ता है, दूसरा कोई नहीं बँधता (१३) । स्थावर या अस्थावर जो कुछ सामान्य धन हो, उसमें से अधिकारियों को उनके विभाग के अनुसार अपना-अपना अंश मिलता है (१४) । अधिकारियों में सहमति होने से विभाजन सिद्ध होता है, यदि उनमें सहमति न हो, तो राजा पक्षपात-हीन दृष्टि से अंश बाँट दे (१५) । जिस स्थावर या अस्थावर को बाँटा न जा सके, राजा उसका मूल्य या उप-स्वामित्व अधिकारियों में विभाजित कर दे (१६) । धन के बँट जाने पर भी यदि कोई व्यक्ति किसी धन में अपना अंश प्रमाणित करे, तो राजा उस धन को पुनः बाँट कर अंश न पानेवाले व्यक्ति को उसका भाग दिला दे (१७) । हे शिवे ! सभी अधिकारियों की संमति से धन बँट जाने के बाद उस विभाजन के संबंध में विवाद करनेवाला व्यक्ति राजा द्वारा दण्डनीय होगा (१८) । मृत व्यक्ति के पौत्र, पत्नी और पिता यदि विद्यमान हैं, तो पौत्र ही अधस्तनत्व-रूप से गौरव पाकर धन

बारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन । ३६७ का अधिकारी होगा (१९)। पुत्र-हीन मृत व्यक्ति के पिता के भाई और पितामह यदि विद्यमान हैं, तो जन्म के अनुसार निकटता होने के कारण पिता ही उसके धन के अधिकारी होंगे (२०)। हे प्रिये ! कन्या के अति सन्नि- कृष्ट होने पर भी मृत व्यक्ति की कन्या यदि विद्यमान है, तो पौत्र धन का अधिकारी होगा क्योंकि स्त्री की अपेक्षा पुरुष ही मुख्य है (२१)। मृत पुत्र को सोपान मानकर धन पितामह से पौत्र को जाता है। संसार में प्रसिद्ध है कि स्वयं पिता ही पुत्र-स्वरूप होता है (२२)। विवाह-सम्बन्ध में ब्राह्म-विधि से विवाहिता पत्नी ही श्रेष्ठ है। पति की अर्द्धाङ्ग-स्वरूपा वह ब्राह्मी पत्नी ही पुत्र-हीन पति के धन की अधिकारिणी होती है (२३)। पति-पुत्र-हीना नारी पति के धन को पाकर भी उसे दान या विक्रय नहीं कर सकती, केवल स्त्री-धन को ही वह दान या विक्रय कर सकती है (२४)। पितृ-कुल या श्वसुर-कुल से दिया गया या अपने द्वारा कमाया धन 'स्त्री-धन' कहा गया है (२५)। उक्त नारी की मृत्यु होने पर पति के प्राप्त धन की स्थिति पूर्ववत् हो जायगी अर्थात् पति के निकटवर्ती व्यक्ति को वह धन मिलेगा (२६)। स्वामी की मृत्यु होने पर स्त्री स्व-धर्म के अनुसार पति के बन्धुओं के अधीन या उनके अभाव में पिता के बन्धुओं के अधीन रहकर धन की अधिकारिणी होगी (२७)। जिस स्त्री के प्रति व्यभिचार की शंका है, वह पति के धन को नहीं पाएगी; जो व्यक्ति उसके पति के धन का अधिकारी होगा, उससे वह जीविका मात्र पाएगी (२८)। हे शुचि-स्मिते ! यदि स्वर्गीय व्यक्ति के अनेक पत्नियां हैं, तो उन सबको पति का धन बराबर बाँटकर मिलेगा (२६)। स्वामी के धन की अधिकारिणी पत्नी की मृत्यु होने और पति की कन्या के विद्यमान होने पर वह धन पुनः पति का होकर दुहितृ-गामी होगा (३०)। इसी प्रकार कन्या के रहने पर पुत्र-वधू को मिला धन उसकी मृत्यु होने पर पुनः स्वामी को जाकर श्वसुर के अधीन होकर उस कन्या को मिलेगा (३१)। हे शिवे ! इसी प्रकार पितामह के विद्यमान होने पर यदि धन माता को मिला है, तो माता की मृत्यु होने पर वह धन माता के पति अर्थात् पितामह के पुत्र का धन होकर पितामह को मिलेगा (३२) मृत व्यक्ति का ऊर्ध्व- गत धन जैसे पिता को मिलता है, वैसे ही पति-हीना माता को भी मिलता है (३३)। जननी के रहते विमाता धन की अधिकारिणी नहीं होती। जननी की मृत्यु होने पर पुत्र का आश्रय कर पिता द्वारा विमाता भी धन- भागिनी होती है (३४)। अधस्तन अधिकारी का अभाव हो, तो धन अधोगामी नहीं होता, परन्तु वही धन जिस क्रम से वैसा होता, उसी क्रम से वह ऊर्ध्वगामी होगा (३५)। अतः चाचा के रहने पर बहन को मिला धन भी कन्या-पुत्र-हीना उस बहन की मृत्यु होने पर, बहन के पति के रहने पर भी, लौट कर चाचा को ही मिलेगा (३६)। धन ऊर्ध्व से अधोगामी होकर पहले पुरुष को मिलता है। अतः सहोदरा बहन के रहने पर भी सौतेला भाई धन का अधिकारी होता है (३७)। सहोदरा बहन और सौतेले भाई की सन्तान के रहने पर सौतेले भाई को प्राप्त धन को सौतेले भाई की सन्तान ही पाएगी (३८)। हे शिवे ! मृत व्यक्ति के धन को सहोदर और सौतेले भाई दोनों बराबर बाँट लें क्योंकि यह धन मृत व्यक्ति के पितृ-धन के समक्ष है (३६)। कन्या जीवित है, तो उसका पुत्र धनाधिकारी नहीं होगा। जहाँ जो धनाधिकार का बाधक है, वहाँ उसकी मृत्यु के बाद दूसरे का धन मिलेगा। यहाँ कन्या दौहित्र के धनाधिकार में बाधक है, अतः कन्या की मृत्यु के बाद दौहित्र को अधिकार मिलेगा (४०)। अविवाहिता बहन का विवाह सामान्य पैतृक धन से करने पर पुत्र न होने पर कन्या के पितृ-धन को बाँटकर ले (४१) सन्तति-हीना मृत स्त्री का स्त्री-धन स्वामी को मिलता है। स्त्री-धन से भिन्न अन्य धन जिसे उत्तराधिकार-सूत्र से प्राप्य है, उसी को मिलेगा (४२)। उत्तराधिकार के संबंध से जो सम्पत्ति नारी को मिलती है, उससे वह अपना भरण-पोषण और पुण्य कर्म कर सकती है किन्तु उसे दान या विक्रय नहीं कर सकती १३

६८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र (४३) । चाचा और पिता की विमाता विद्यमान हों, तो धन पितामह-गामी होकर बाद में चाचा द्वारा चाची को ही मिलता है (४४) । पितामह, चाचा और भाई जीवित हों, तो अधस्तन पुरुष की प्रधानता होने से भाई ही धन का अधिकारी होगा (४५) । चाचा की अपेक्षा भाई और पितामह दोनों ही समान रूप से सन्निकृष्ट हैं, ऐसे स्थल पर मृत व्यक्ति का धन पितृधन होकर भाई को मिलेगा (४६) । मृत व्यक्ति के दौहित्र और पिता विद्यमान हों, तो दौहित्र ही धनाधिकारी होगा क्योंकि धन स्वभावतः अधोगामी होता है (४७) । हे कालिके ! स्वर्गीय व्यक्ति के पिता व माता विद्यमान हों, तो पुरुष की मुख्यता होने से पिता ही धनाधिकारी होगा (४८) । मृत व्यक्ति के मातुल के जीवित होने पर भी पितृ-संबंध की गुरुता होने से पितृ-सपिंड व्यक्ति ही धन पाएगा (४६) । हे शिवे ! धन यदि अधोगामी न हो सकेगा, तो वह ऊर्ध्वतन पुरुष को मिलेगा। पुरुष की प्रधानता होने से पहले धन पितृ-कुल को मिलेगा। इसी कारण से मातुल के सन्निकृष्ट होने से वह धनभागी नहीं है (५०) । हे पार्वति ! मृत-पितृक पौत्र पितामह के धन से पिता के प्राप्य अंश को पाएगा (५१) । पौत्री यदि भ्रातृ-हीना, पितृ-मातृ- विहीना और स्व-धर्मिणी है, तो पितामह के धन में पितृव्य के साथ बराबर भाग पाएगी (५२) । हे देवि ! पौत्रों को पितामही और पितृ-भगिनी यदि जीवित हों, तो पितृ-गत धन में पौत्री ही अधिकारिणी होगी अर्थात् धनी की कन्या, माता, बहन के बीच कन्या ही उत्तराधिकारिणी है (५३) । अधोगामी धन में अधस्तन पुरुष की ही प्रधानता है और ऊर्ध्वगामी धन में ऊर्ध्वतन पुरुष की (५४) । हे प्रिये ! इसी से पुत्र-वधू, पौत्री या कन्या के जीवित होने पर मृत व्यक्ति का धन उसके पिता नहीं ले सकते (५५) । यदि मृत व्यक्ति के पितृ-कुल में कोई उत्तराधिकारी नहीं है, तो पूर्वोक्त विधि के अनुसार वह धन मातामह-कुल को मिलेगा (५६) । मातामह-कुल को प्राप्त धन मामा, मामा के पुत्र आदि के द्वारा पहले अधस्तन, उसके अभाव में ऊर्ध्वतन एवं पुरुष को और उसके अभाव में नारी को मिलेगा (५७) । ब्राह्म विवाह से विवाहिता पत्नी की सन्तान के होने पर और पितृ-सपिण्ड के रहने पर शैव विवाह से विवाहिता स्त्री की सन्तान मृत व्यक्ति के धन को नहीं पाएगी (५८) । हे भद्रे ! शैव विवाह से विवाहिता पत्नी और उसके पुत्र धनाधिकारी से मृत व्यक्ति की सम्पत्ति के अनुसार भोजन-वस्त्र पा सकेंगे (५६) । हे प्रिये ! शैव विवाह से विवाहिता पत्नी का पालन शैव पति ही करता है, यदि वह व्यभिचारिणी न हो। यह शैवी पत्नी पिता-माता आदि के धन की अधिकारिणी नहीं है (६०) । पिता क्रोध या लोभ से सत्कुलोत्पन्ना कन्या को यदि शैव विवाह में देता है, तो वह लोक-समाज में निन्दित होता है (६१) । शैवी पत्नी और उसका वंश न होने पर शिव-शासन से क्रमशः अर्थात् पूर्व-पूर्वाभाव में समानोदक, आचार्य और राजा मृत व्यक्ति के धन को पाएँगे (६२) । हे प्रिये ! पिण्ड-दाता से सातवें पुरुष तक 'सपिण्ड' और आठवें से दसवें पुरुष तक 'समानोदक' कहलाते हैं। फिर केवल 'गोत्रज' कहलाते हैं (६३) । जो धन एक बार बाँटकर बाद में स्वेच्छा से मिश्रित कर लिया गया हो, उसे बिना बँटा मानकर पुनः बाँटा जायगा (६४) । बँटे हुए या न बँटे हुए धन में जिसका जितना अंश निर्दिष्ट है, उस व्यक्ति के मरने पर उसके उत्तराधिकारी उसी के अनुसार अंश प्राप्त करेंगे (६५) । जो जिसके धन का अधिकारी है, वह उसे अपने जीवन भर पिण्डदान करेगा, शैव पत्नी के पुत्र को छोड़कर (६६) । इस लोक में जन्म-संबंध के कारण जिस प्रकार 'अशौच' विहित है, उसी प्रकार उत्तराधिकारी को भी तीन रात्रि का अशौच विहित है (६७) । पूर्णाशौच या खंडाशौच निर्दिष्ट अशौच-काल के बीच में सुनने पर अशौच-काल के जो कुछ दिन शेष हों, द्विजादि आदि सभी वर्ण उन्हीं कुछ दिनों में शुद्ध होंगे (६८) । अशौच-काल के बीत जाने पर खंडाशौच सुनने पर अशौच नहीं होता किन्तु पूर्णाशौच सुनने पर तीन दिन का अशौच होगा, यदि एक वर्ष से अधिक न हो गया हो (६६) । एक वर्ष

बारहवाँ उल्लास : सनातन व्यवहार का कथन | ६६ बीत जाने पर पुत्र पिता या माता का और पतिव्रता पत्नी पति का मरण सुनने पर तीन रात्रि का अशौच मानें (७०)। जब एक अशौच के बीच एक अन्य अशौच होता है, तब गुरु अशौच द्वारा मनुष्यों की शुद्धि होती है (७१)। दीर्घ-काल तक होने से अशौच व्याप्य होता है, उससे व्यापक अशौच गुरुतर होता है (७२)। यदि मरणाशौच या जननाशौच के शेष दिनों में कोई दूसरा मरण-जनित या जन्म-जनित खंडाशौच उपस्थित हो, तो पूर्व अशौच द्वारा ही वह छूट जायगा अर्थात् खंडाशौच को ग्रहण नहीं किया जायगा। यदि पूर्णाशौच हो, तो पूर्व अशौच के बाद दो दिन अशौच बढ़ जायगा (७३)। स्त्रियों का जब तक विवाह नहीं होता, तब तक पितृ-कुल में अशौच होगा। विवाह होने पर पिता-माता की मृत्यु पर तीन रात का अशौच होगा (७४)। विवाह के बाद स्त्री पति-गोत्र को पाती है। इसी प्रकार दत्तक पुत्र दत्तक लेनेवाले के गोत्र को पाता है (७५)। जननी और जनक दोनों की सम्मति से पुत्र ग्रहण कर ग्रहण-कर्त्ता अपने गोत्र और नाम का उल्लेख कर दत्तक पुत्र का संस्कार करे (७६)। जिस प्रकार औरस पुत्र को पिता-माता के धन और पिंड का अधिकार होता है, उसी प्रकार दत्तक पुत्र को भी दत्तक लेनेवाले स्त्री-पुरुष के धन और पिंड का अधिकार है क्योंकि वे ही दत्तक के पिता-माता हैं (७७)। पाँच वर्षीय बालक को सवर्ण से लेकर उसका प्रतिपालन करे। दत्तक लेने में पाँच वर्ष से अधिक आयु का बालक प्रशस्त नहीं है (७८)। हे कालिके ! भाई का पुत्र भी यदि दत्तक हो, तो दत्तक लेनेवाला ही उसका पिता होगा और उसका जन्मदाता सभी कार्यों में उसका पितृव्य (चाचा) होगा (७९)। जो व्यक्ति जिसके धन का अधिकारी होगा, वही व्यक्ति उसके धर्म का पालन करेगा और नियम मानेगा तथा उसके बन्धुओं को सन्तुष्ट करेगा (८०)। कानीन (कन्या-काल में उत्पन्न पुत्र), गोलक (उप-पति द्वारा विधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) और कुंड (उप-पति द्वारा सधवा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र) अति पापी हैं, उनके मरने पर अशौच नहीं होता और उन्हें धनाधिकार भी नहीं होता (८१)। जिन पुरुषों को लिङ्गच्छेद का दंड मिला है या जिन स्त्रियों की नाक राज- दंड द्वारा काटी गई है या जो महा-पापी हैं उनके मरने पर अशौच नहीं माना जाता (८२)। जो व्यक्ति निरुद्देश हों, उनके परिवार और धन की रक्षा राजा बारह वर्ष तक करे (८३)। बारह वर्ष बीतने पर उक्त अनुद्दिष्ट व्यक्ति की कुश-मय देह का दाह कराए। तीन रात्रि के बाद उस व्यक्ति के पुत्रादि द्वारा प्रेतत्व-मोचन कराए (८४)। फिर राजा उस अनुद्दिष्ट व्यक्ति के धन को उसके पुत्रादि के क्रम से यथा-सम्भव उसके परिवार के लोगों में बाँट दे अन्यथा वह पापी होगा (८५)। जिसका रक्षक कोई नहीं है, उनका और दीन, विपत्ति-ग्रस्तादि लोगों का रक्षक राजा ही है क्योंकि राजा प्रजा-गण का प्रभु है (८६)। हे कालिके ! अनुद्दिष्ट व्यक्ति यदि धन बँटने के बाद भी आ जाय, तो स्त्री-पुत्र, धन उसी के होंगे (८७)। अंशी-गण की सम्मति के बिना पुरुष भी पैतृक स्थावर धन को स्वजन को या अन्य व्यक्ति को दान नहीं कर सकते (८८)। जो स्थावर, अस्थावर धन अपना उपार्जित है, उसे और पैतृक अस्थावर संपत्ति को स्वेच्छा- नुसार दान कर सकते हैं (८९)। पुत्र या पत्नी अथवा कन्या, दौहित्र या जनक, जननी किम्वा भाई या बहन के रहते भी जो स्थावर और अस्थावर धन अपना उपार्जित है तथा पैतृक सारा अस्थावर धन दान में दे सकता है (९०-९१)। इस प्रकार का धन पुरुष ऐसे दान में या अन्य किसी धर्म-कार्य में व्यय करे, तो उसके पुत्रादि उसे अन्यथा नहीं कर सकते (९२)। धर्मार्थ में लगाई संपत्ति की रक्षा धन-दाता ही करेगा, किन्तु उसे वह पुनः नहीं ले सकता क्योंकि धर्म ही उस धन का स्वामी है (९३)। हे अम्बिके ! स्वयं या प्रतिनिधि द्वारा सङ्कल्प के अनुसार मूल-धन या उप-स्वत्व को धर्मार्थ में लगाए (९४)। धनी व्यक्ति यदि स्नेह-वश किसी उत्तराधिकारी को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो उसे कोई अन्य व्यक्ति अन्यथा नहीं कर सकता (९५)। यदि उत्तराधिकारियों में से एक ही व्यक्ति को अपने उपार्जित धन का आधा दे, तो अन्य उत्तराधिकारी उसे रोक नहीं सकते (९६)। जहाँ

  • १०० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र बहुत भाइयों में से एक भाई पैतृक धन द्वारा धन पैदा करता है, वहाँ उक्त पैतृक धन में ही सब भाइयों का अधिकार है; उपार्जित धन उपार्जन करनेवाले के सिवा अन्य किसी को नहीं मिलेगा (६७)। जो भाई पैतृक नष्ट द्रव्य का उद्धार करता है, वह उत्तराधिकारियों के बीच दो भाग पाएगा (६८)। शरीर-शून्य व्यक्ति को पुण्य, धन और विद्या नहीं मिलती। यह शरीर पितृ-संबंधी है, अतः कौन धन पैतृक नहीं है (६६) ? मानव-गण पृथक् अन्न, पृथक् धन वाले होकर भी जो कुछ उपार्जित करते हैं, वह सब पितृ-संक्रान्त है, अतः अपना उपार्जित , धन कैसे सम्भव है (१००) ? अतः हे महेश्वरि ! जो व्यक्ति अपने परिश्रम से जो धन उपार्जित करता है, वही - उसका उपार्जित है, वही उस धन का स्वामी है, अन्य कोई नहीं (१०१) । हे देवि ! माता, पिता, गुरु, पितामह या मातामह को हाथ से भी मारनेवाला व्यक्ति उनके धन का अधि- कारी नहीं होता (१०२)। अन्य किसी सम्बन्धी व्यक्ति का भी प्राण नाश करने पर वह विनष्ट व्यक्ति के धन को नहीं पाएगा, कोई अन्य उत्तराधिकारी उस व्यक्ति के धन का अधिकारी होगा (१०३)। हे अम्बिके ! नपुंसक और पंगु जीवन भर अन्न-वस्त्र पाएगा, धन का अधिकारी नहीं होगा (१०४) । मार्ग में या अन्य किसी स्थान पर किसी सस्वामिक धन के मिलने पर राजा विचार कर उस धन को पानेवाले के द्वारा धन-स्वामी को प्रदान करे (१०५) । अस्वामिक जीव या धन के मिलने पर, पानेवाला व्यक्ति ही उसका अधिकारी होगा, राजा को उसका दशमांश अर्पित करे (१०६) । योग्य क्रेता यदि पास में है, तो स्वामी स्थावर धन अन्य व्यक्ति को नहीं बेच सकता (१०७)। पास रहने- वाले क्रेताओं के बीच जाति या सवर्ण प्रशस्त है ; उनके अभाव में बन्धु । बहुत बन्धु यदि खरीदने के इच्छुक हों, तो विक्रेता की इच्छा ही मान्य है अर्थात् इच्छानुसार जिसे चाहे, उसे बेच सकता है (१०८) । दूसरा व्यक्ति यदि स्थावर धन का मूल्य निश्चित कर उसे खरीदने को तैयार हो और निकटस्थ व्यक्ति यदि वही मूल्य दे, तो वही खरीदार होगा, दूसरा व्यक्ति नहीं (१०६) । यदि निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देने में असमर्थ है या अन्य को बेचे जाने में सहमत है, तो गृहस्थ दूसरे व्यक्ति को भी बेच सकता है (११०) । हे देवि ! प्रवासी व्यक्ति के अज्ञातवास में यदि स्थावर संपत्ति कोई अन्य खरीद ले, तो सुनने पर वही मूल्य देकर प्रवासी उसे पुनः पा सकता है (१११) । किन्तु यदि क्रेता ने उसमें गृह, उपवन बना लिया हो या उसे भग्न किया हो, तो निकटस्थ व्यक्ति मूल्य देकर भी स्थावर धन का नहीं पा सकता (११२) । जल या वन से निकाली हुई, अति दुर्गम, अनिवारित, भोग एवं राजस्व- शून्य भूमि को राजाज्ञा के बिना भी उपजाऊ बना सकते हैं (११३)। वह भूमि बहुत परिश्रम से भी तैयार की गई हो, तो भी उसमें उत्पन्न वस्तु का दशमांश राजा को देकर उसका भोग करे क्योंकि राजा ही सारी भूमि का स्वामी है (११४) । जिस स्थान में दूसरे का अनिष्ट हो सकता हो, वहाँ बावली, कुआँ, तालाब खोदना; वृक्ष लगाना या घर बनवाना निषिद्ध है (११५) । देवोद्देश से बने कुएँ और नदी का जल सभी पी सकते हैं और इन जलाशयों के निकट रहनेवाले उनसे सिंचाई करने के अधिकारी हैं (११६) । जिस जलाशय से सिंचाई करने से लोगों को जल की कमी अनुभव हो, उससे निकट के लोग भी सिंचाई नहीं कर सकते (११७) । अंशी लोगों की सम्मति के बिना अविभक्त सम्पत्ति को रेहन रखना या बेचना अवैध है। इसी प्रकार जिस सम्पत्ति का स्वामित्व या परि- माण निर्दिष्ट नहीं है, उसका बेचना या बन्धक रखना अप्रामाणिक होता है (११८) । बन्धक वस्तु को जानकर नष्ट करने पर राजा उस नष्ट करनेवाले व्यक्ति से उस वस्तु के स्वामी को उसका मूल्य दिलाए (११६)। बन्धक करनेवाले की सम्मति से बन्धक पशु आदि वस्तु को उपयोग में लानेवाला व्यक्ति ही उस पशु का पोषण करेगा (१२०) । जब कोई काल और लाभ के नियम की उपेक्षा कर लाभ के लिए स्थावर-अस्थावर सम्पत्ति को लगाएगा,

तेरहवां उल्लास : 'देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०१ तो वह लाभ अन्यथा होगा (१२१) । पिता की मृत्यु होने पर सभी भागीदारों की सम्मति के बिना सामान्य संपत्ति को नहीं लगाया जा सकता (१२२) । हे पार्वति ! यदि बहुमूल्य वस्तु कम मूल्य में या कम मूल्य की वस्तु बहुत मूल्य में बिके, तो राजा उसे अन्यथा करने में समर्थ है (१२३) । जिस प्रकार शरीर का जन्म और मरण एक ही बार होता है, उसी प्रकार दान और कन्या का ब्राह्म विवाह एक ही बार होता है (१२४) । जिसके एक ही पुत्र है, वह पुत्र का दान नहीं कर सकता ; जिसके एक ही स्त्री है, वह स्त्री का दान करने में समर्थ नहीं होता। जो पितरों का हित चाहता है, वह एक ही कन्या होने पर उसे शैव विवाह में नहीं दे सकता (१२५) । देव कार्य में, पितृ-कार्य में, वाणिज्य में—विशेषतः राज-द्वार में प्रतिनिधि जो कुछ करेगा, वह उसके नियुक्त करनेवाले का ही किया माना जायगा (१२६)। हे सुव्रते ! प्रतिनिधि को नियुक्त करनेवाले के दोष के लिए प्रतिनिधि या दूत दंडनीय नहीं है, यह नित्य विधि है (१२७) । ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में धर्म-सम्मत जो कुछ स्वीकार किया गया है, उसे करना होगा (१२८) । जगदीश्वर जगत् की रक्षा करते हैं। जो इस जगत् को नष्ट करना चाहते हैं, वे स्वयं विनष्ट हो जाते हैं। ईश्वर द्वारा पालित जगत् के रक्षकों की रक्षा जगदीश्वर करते हैं। अतः सदैव जगत् के हित में लगे रहना चाहिए (१२६) । ☸ ☸ ☸ तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि सभी निगमों के सार एवं स्वर्ग और मोक्ष के एकमात्र कारण-स्वरूप बातों के बतानेवाले देवदेव महेश्वर से कलि द्वारा मलीन जीवों की पवित्रता के लिए एकाग्र-चित्त त्रिभुवन-जननी पार्वती ने भक्ति-पूर्वक कहा (१) —महद्-योनि अर्थात् महत्-तत्त्व की उत्पादिका आदि-शक्ति अर्थात् मूल प्रकृति महा-द्युति एवं सूक्ष्म से भी सूक्ष्मा अर्थात् सर्वथा दुर्ज्ञेया 'महा-काली' का रूप-निरूपण किस प्रकार होगा (२) ? हे देव ! प्रकृति के कार्य का अर्थात् घट-पट आदि का ही रूप होता है, किन्तु 'महा-काली' साक्षात् परात्परा अर्थात् प्रकृति-रूपा है, अतः रूप होना असम्भव है। इस विषय में मुझे विशेष सन्देह है। हे देव ! आप मेरे इस संदेह को विशेष रूप से दूर करें (३) । श्रीसदाशिव ने कहा—हे प्रिये ! पहले ही बताया है कि उपासकों के कार्य के लिए गुण व क्रिया के अनुसार देवी का रूप कल्पित होता है (४) । हे शैलजे ! सफेद, पीले आदि रङ्ग जैसे काले रङ्ग में लुप्त हो जाते हैं, वैसे ही सभी भूत 'काली' में प्रविष्ट हैं (५) । इसी से उस निर्गुणा, निराकारा, योगियों की हित-कारिणी, काल-शक्ति का रङ्ग काला कहा गया है (६) । नित्या, काल-रूपा, अव्यया और कल्याण-रूपा इस 'काली' के मस्तक पर चन्द्र-कला का चिह्न अमृत को सूचित करता है (७) । नित्य-स्वरूप चन्द्र, सूर्य और अग्नि द्वारा काल- सम्भूत सारा जगत् दिखाई देता है, इसी से 'काली' के तीन नेत्र कल्पित हुए हैं (८) । सभी प्राणियों को ग्रास करने और काल-दंड द्वारा चबाने से सब प्राणियों का रक्त ही महेश्वरी के लाल वस्त्र से ज्ञात होता है (६) । हे शिवे ! समय-समय पर विपत्ति से जीवों की रक्षा करने और अपने-अपने कार्य में जीवों को प्रेरित करने की बात

१०२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र उनके वर और अभय से स्पष्ट होती है (१०) । हे भद्रे ! वे रजो गुण से उत्पन्न विश्व में रहती हैं, इसी से कहा है कि वे लाल कमल के आसन पर बैठी हैं (११) । ज्ञान-स्वरूपा, सब लोगों की साक्षि-स्वरूपिणी वे देवी मोह-मयी सुरा को पीकर क्रीडा करनेवाले काल से उत्पन्न जगत् को देखती हैं (१२) । अल्पबुद्धि भक्तों के हित के लिए उक्त प्रकार गुणानुसार उन भगवती के अनेक प्रकार के रूप कल्पित हुए हैं (१३) । श्री देवी ने कहा—जीवों के उद्धार के लिये आपने 'आद्या कालिका' का जो ध्यान बताया है, यदि उसी के अनुसार मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या धातु की मूर्ति बनाकर साधक व्यक्ति उसे वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कर सुन्दर घर बनाकर उसमें देवेशी को उस मूर्ति को स्थापित करे, तो उसका क्या फल होगा ? हे प्रभो ! किस विधि से उस मूर्ति की 'प्रतिष्ठा' करनी होगी, यह कृपया मुझे बताइए (१४-१६) । आपने पहले बावली, कुएँ, घर, उद्यान और देव-प्रतिमा की प्रतिष्ठा का उल्लेख किया है, किन्तु विशेष रूप से नहीं बताया है (१७) । हे परमेश्वर ! मैं आपके मुख से उनका विधान भी सुनना चाहती हूँ। यदि आपकी रुचि हो, तो कृपया बताइए (१८) । श्री सदाशिव ने कहा—हे परमेश्वरि ! तुमने जो जानना चाहा है, वह बहुत गोपनीय है। तुम्हारे स्नेह से मैं उसे बताता हूँ। तुम एकाग्र होकर सुनो (१६) । इस भू-मण्डल पर मनुष्य दो प्रकार के हैं—१. सकाम, २. निष्काम । निष्काम लोगों को मोक्ष-पद और कामी लोगों को जैसा फल मिलता है, वह कहता हूँ (२०) । हे प्रिये ! जो व्यक्ति जिस देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा करता है, वह उसी देवता के लोक को और उस लोक को भोग्य वस्तुओं को पाता है (२१) । मृण्मयी (मिट्टी की) प्रतिमा प्रतिष्ठित करनेवाला दस हजार कल्पों तक स्वर्ग में रहता है। लकड़ी, पत्थर और धातु की प्रतिमा का फल क्रमशः दस-दस गुना अधिक है अर्थात् लकड़ी की प्रतिमा से एक लाख कल्प तक स्वर्ग में रहता है इत्यादि (२२) । जो व्यक्ति देवता की प्रसन्नता के लिए या किसी कामना से ध्वज और वाहन के साथ तृण-काष्ठादि का घर बनाकर उत्सर्ग करता है या इस प्रकार के उत्कृष्ट घर का संस्कार कराता है, उसका पुण्य सुनो (२३) । हे परमेश्वरि ! जो व्यक्ति तृणादि से बने घर को दान करता है, वह बहुत हजार कोटि वर्षों तक देवलोक में रहता है (२४) । ईंट का बना गृह दान करने से इससे सौ गुना अधिक फल होता है । पत्थर के गृह-दान का फल इससे दस हजार गुना अधिक है (२५) । हे आद्ये ! सेतु और संक्रम (विशेष प्रकार का सेतु) बनानेवाले को यम-लोक नहीं देखना पड़ता । वह सुखपूर्ण देवलोक को पाकर स्वर्ग-वासियों के साथ आनन्द करता है (२६) । वृक्ष और उपवन की प्रतिष्ठा करने- वाला देव-लोक में जाकर कल्प-वृक्षों से युक्त दिव्य घर में रहता हुआ अपनी मनचाही सभी सुन्दर भोग्य वस्तुओं का उपभोग करता है (२७) । सब प्राणियों को प्रसन्नता के लिए जो जलाशय दान करता है, वह पापों से छूट- कर ब्रह्म-लोक को जाता है और उस जलाशय में जितनी बूँदें होती हैं, उतने सौ वर्षों तक वहाँ रहता है (२८) । हे देवि ! जो व्यक्ति देवता की प्रीति के लिए कोई वाहन देता है, वह उस देवता से रक्षित होकर उसी के लोक में चिरकाल तक रहता है (२६) । इस भू-मण्डल पर मिट्टी के वाहन देने का जो फल है, उसका दस गुना फल लकड़ी का वाहन दान करने से और प्रस्तर-वाहन के दान से उसका भी दस गुना अधिक फल होता है (३०) । पीतल, कांसे, ताम्बे आदि धातु से बने देव-वाहन के दान से क्रमशः सौ गुना अधिक फल होता है (३१) । श्रेष्ठ साधक भगवती के मन्दिर में 'महा-सिंह', शिव-मन्दिर में 'वृषभ' और विष्णु-मन्दिर में 'गरुड़' का निर्माण कराकर दान में देता है (३२) । जिसके सभी दाँत तीक्ष्ण हैं, मुख-मण्डल भीषण है, कन्धे केशरों से सुशोभित हैं, चार पैर हैं, नाखून वज्र के समान हैं—वह 'महा-सिंह' कहा जाता है (३३) । दो सींगें ही जिसके अस्त्र हैं, शरीर श्वेत वर्ण का है, चार पैर हैं, खुर काले रंग के हैं, बड़ा भारी ककुद है, पूंछ काली है, कन्धे

तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०३ श्याम रंग के हैं—वह 'वृषभ' कहलाता है (३४)। जिसकी जाँघ पक्षी के समान, मुख मनुष्य के समान, नाक लम्बी है और दो पंखों से युक्त अञ्जलि बनाकर जो दोनों पैरों को सिकोड़कर बैठा है—उसे 'गरुड़' कहते हैं (३५) । देवालय को ध्वज, पताका का दान करने से देवता को सौ वर्ष तक रहनेवाली प्रसन्नता होती है। बत्तीस हाथ ऊँचे रङ्ग-बिरंगे, सुदृढ़, छिद्र-रहित, देखने में सुन्दर, लाल वस्त्र से लपेटे हुए और आगे के भाग में विष्णु के चक्र से युक्त ध्वज-दण्ड का निर्माण करे (३६-३७)। ऐसे ध्वज-दण्ड के अगले भाग में सम्बन्धित देवता के वाहन के चिह्न से युक्त पताका लगाए। जिसका मूल-भाग प्रशस्त और अगला भाग सूक्ष्म है; जो सुन्दर वस्त्र से बनी ध्वज के आगे शोभा पाती है—वही 'पताका' कही जाती है (३८) । जो वस्त्र, अलङ्कार, पर्यङ्क, यान, सिंहासन, पान-पात्र, भोजन-पात्र, ताम्बूल-पात्र, पीकदान, मणि-मुक्ता- प्रवाल आदि रत्न और अन्य दूसरी अपनी प्रिय वस्तुएँ देवता को श्रद्धा-भक्ति के साथ दान करता है, वह उस देवता के लोक में पहुँचकर उन्हीं वस्तुओं का कोटि गुना फल पाता है (३६-४०) ! कामियों का फल स्वप्न में प्राप्त राज्य के समान क्षय होनेवाला होता है। निष्कामियों को पुनर्जन्म-रहित निर्वाण-मुक्ति मिलती है (४१) । जलाशय, गृह, आराम, सेतु, संक्रम, वृक्ष और देव-प्रतिष्ठा के समय 'वास्तु-दैत्य की पूजा' करे। जो वास्तु-पूजा न करके देव-प्रतिष्ठा आदि कर्म करता है, उसके उस कर्म में वास्तु-देव अपने गणों के साथ विघ्न डालते हैं। (४२-४३) । १. कपिलास्य, २. पिङ्ग-केश, ३. भीषण, ४. रक्त-लोचन, ५. कोटराक्ष, ६. लम्ब-कर्ण, ७. दीर्घ-जङ्घ, ८. महोदर, ६. अश्व-तुण्ड, १० काक-कण्ठ, ११. वज्र-बाहु, १२. वृतान्तक—इन सभी वास्तु- देव के गणों का यत्न-पूर्वक पूजन करे (४४-४५) । जिस मण्डल में वास्तुदेव की पूजा करनी चाहिए, उसे कहता हूँ, सुनो (४६) — वेदी या पानी से लिपी हुई किसी सम-तल भूमि पर वायु-कोण से ईशान-कोण तक एक हाथ लम्बी रेखा सूत्र-पात द्वारा बनाए (४७) । ईशान-कोण से अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण तक ऐसी ही एक रेखा और बनाए। फिर अग्नि-कोण से नैर्ऋत-कोण तक और नैर्ऋत-कोण से वायु-कोण तक एक-एक रेखा बनाकर एक चतुष्कोण मण्डल बनाए (४८-४६) । हे देवि ! इस मण्डल के एक कोने से दूसरे कोने तक दो रेखाएँ खींचकर मण्डल को चार भागों में इस प्रकार बाँटे कि उस स्थल पर मछली के पूंछ के चार आकार बन जायँ (५०) । उक्त पुच्छ-मूल के भेद कर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा तक और उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा तक दो रेखाएँ खींचे (५१) । फिर कोण-रेखा-युक्त चतुष्कोणों में कर्णाकर्णि चार रेखाएँ और मध्य स्थल में पश्चिम से पूर्व तक और उत्तर से दक्षिण तक दो रेखाएँ खींचे (५२) । इस प्रकार उक्त मण्डल के सोलह कोष्ठ बनाकर पञ्च-वर्णों के चूर्ण द्वारा उत्तम यन्त्र की रचना करे (५३) । फिर मध्य के चतुष्कोण में एक सुन्दर चतु- र्दल-पद्म अङ्कित करे, जिसकी कर्णिका पीले और लाल रंग की तथा केशर लाल रंग की हो (५४) । तब पद्म के सभी दलों को सफेद या पीले रंग का करे। फिर पद्म के सन्धि-स्थानों को इच्छानुसार रंगों से भरे (५५) । तब ईशान कोण के कोष्ठक से आरम्भ कर बारह कोष्ठ क्रमशः श्वेत, कृष्ण, पीत, रक्त-इन चार रंगों से पूरे (५६) । हे प्रिये ! दक्षिणावर्त्त-क्रम से इन सभी कोष्ठों को पूरे। फिर वामावर्त्त-क्रम से उसमें देव-गण की पूजा करे (५७) । पहले विघ्न की शान्ति के लिए पद्म में वास्तु-दैत्य की और ईशान कोण से आरम्भ कर (वामावर्त-क्रम से) बारह कोष्ठों में कपिलास्य आदि दानवों की पूजा करे (५८) । तब कुशाण्डिकोक्त विधि से अग्नि का संस्कार कर यथा-शक्ति आहुतियाँ देकर 'वास्तु-यज्ञ' समाप्त करे (५६) । हे देवि ! तुमसे यह मंगल-दायिनी 'वास्तु-पूजा' कही गई। इसके करने से मनुष्य वास्तु के विघ्नों से पीड़ित नहीं होता (६०) ।