भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन | ८५ ध्यान कर मन्त्र-शोधित पञ्च-तत्व-रूप उपचारों द्वारा उनकी पूजा कर उनके चारों ओर गणेश, गण-नायक, गण-नाथ, गण-क्रीड़, एक-दन्त, रक्त-तुण्ड, लम्बोदर, गजानन, महोदर, विकट, धूम्राभ और विघ्न-नाशन की पूजा करे (१२१-१२३)। तब ब्राह्मी आदि अष्ट-शक्तियों एवं दश दिक्पालों की पूजा करके उनके अस्त्रों की पूजा कर विघ्नराज को विसर्जित करे (१२४)। इसी प्रकार विघ्नराज की पञ्च-तत्वों द्वारा पूजा कर अधिवास करे और ब्रह्मज्ञ कुल-साधकों को भोजन कराए (१०५)। अगले दिन स्नान और नित्य-क्रिया कर जन्म से अब तक के किए पापों के नाश के लिए तिल-काञ्चन का दान करे। हे प्रिये ! कौलों को तृप्ति के लिए एक भोज भी प्रदान करे (१२६)। तब सूर्य को अर्घ्य देकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, नव-ग्रह, मातृकाओं को पूजा कर 'वसुधारा' दे (१२७)। फिर कर्म के अभ्युदय की कामना से वृद्धि-श्राद्ध करे। उसके बाद गुरु के पास जाकर प्रणाम कर प्रार्थना करे (१२८)--- त्राहि नाथ ! कुलाचार-नलिनो-कुल-वल्लभ ! त्वत्-पादाम्भोरुहच्छायां देहि मूर्ध्नि कृपा-निधे ॥ आज्ञां देहि महा-भाग ! शुभ-पूर्णाभिषेचने । निर्विघ्नं कर्मणः सिद्धिमुपैमि त्वत्-प्रसादतः ॥ अर्थात् हे नाथ ! हे कुलाचार-रूप कमलिनी-समूह के प्रियतम ! हे दया-सागर ! मेरे मस्तक पर अपने चरण-कमलों की छाया प्रदान करें ( २६)। हे महानुभाव ! मेरे शुभ पूर्णाभिषेक के लिए आज्ञा दें। आपकी कृपा से मैं बिना किसी विघ्न के कार्य की सफलता पाऊँ (१३०)। इस प्रार्थना के उत्तर में गुरुदेव कहें- शिव-शक्त्याज्ञया वत्स ! कुरु पूर्णाभिषेचनम् । मनोरथ-मयी-सिद्धिर्जायतां शिव-शासनात् ॥ अर्थात् हे पुत्र ! शिव-शक्ति की आज्ञानुसार 'पूर्णाभिषेक' करो। शिव के आदेश से तुम्हें इच्छानुरूप सिद्धि प्राप्त हो (१३१) गुरुदेव से इस प्रकार आज्ञा प्राप्त कर समस्त उपद्रवों की शान्ति के लिए और आयु, लक्ष्मी, बल तथा आरोग्य की प्राप्ति के लिए 'सङ्कल्प' करे (१३२)। तब सङ्कल्प लेकर वस्त्र, अलङ्कार, भूषण और शुद्धि-सहित कारण द्वारा गुरुदेव की पूजाकर उनका 'वरण' करे (१३३)। गुरुदेव गैरिकादि रंगों से चित्रित, सुन्दर ध्वज-पताकाओं से युक्त, फल-पत्तों से सुसज्जित, मालाकार किङ्किणियों से शोभित, रंग-बिरंगी चाँदनी से अलंकृत, जलते हुए घृत-दीपकों की पंक्तियों से लेश मात्र भी अंधेरे से रहित, कर्पूर-सहित धूप और यक्ष-धूप (धूना) द्वारा सुगन्धित, ताल-वृन्त, चामर, मोर-पङ्ख और दर्प- णादि से सुसज्जित, मनोहर गृह में चार अंगुल ऊँची, डेढ़ हाथ चौड़ी मिट्टी की वेदी बनाएँ। फिर उक्त गृह में पीले, लाल, काले, सफेद, साँवले रंग के अक्षत-चूर्ण द्वारा सुन्दर 'सर्वतोभद्र-मण्डल' की रचना करें (१३४-३८)। तब अपने कल्प में बताई विधि के अनुसार मानस-पूजा तक के कर्म करके पूर्वोक्त मन्त्रों से पञ्च-तत्त्वों का शोधन करें (१३६)। फिर अस्त्र (फट्) मन्त्र द्वारा प्रक्षालित दही और अक्षत से लिप्त सोने या चांदी या ताँबे अथवा मिट्टी के बने ' घट' को प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए पूर्व-निर्मित 'सर्वतोभद्र-मण्डल' के ऊपर स्थापित करें। श्री-बीज अर्थात् 'श्रीं' का जप करते हुए उसे सिन्दूर से अङ्कित करें (१४०-४१)। तब अनुस्वार- युक्त 'क्ष' से लेकर 'अ' तक के पचास वर्णों के सहित मूल-मन्त्र का तीन बार जप कर 'कारण' (मदिरा) या तीर्थ-जल अथवा शुद्ध जल द्वारा उस 'घट' को पूर्ण कर उसमें नव-रत्न या स्वर्ण छोड़ें (१४२-४३)। फिर वाग्भव बीज 'ऐं' का जप करते हुए 'घट' के मुख पर कटहल, गूलर, पीपल, मौलसिरी और आम के पत्तों को स्थापित करें (१४४)। तब रमा-माया अर्थात् 'श्रीं ह्रीं' इस मन्त्र का जप करते हुए फल और अक्षत से युक्त सोने, चाँदी,