भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

[ ८ ]

भी बड़े धीर-वीरका काम है उसके लिये अत्यन्त उत्साह, अनवरत अध्यवसाय और परम धैर्यकी आवश्यकता है। उसमें नाना प्रकारके विघ्न आते हैं। भगवान् कारिकाकारने बयालीससे लेकर पैंतालीसवीं कारिकातक उन विघ्नोंकी निवृत्तिके उपाय बतलाये हैं। उनके अनुसार साधन करते-करते जब चित्त निरुद्ध हो जाता है तो बोधका उदय होता है। उस स्थितिका वर्णन आचार्यने श्लोक ४६ और ४७ में किया है। इस प्रकार अद्वैततत्त्व और उसकी उपलब्धिके साधनोंका विवेचन कर उन्होंने निम्नलिखित श्लोकसे इस प्रकरणका उपसंहार करते हुए अपना सिद्धान्त स्थापित किया है—

न कश्चिज्जायते जीवः सम्भवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥
(३।४८)

इसके पश्चात् अलातशान्ति नामक चौथे प्रकरणमें आचार्यने अन्य मतालम्बियोंके पारस्परिक मतभेद दिखलाते हुए उन्हींकी युक्तियोंसे उनका खण्डन किया है। 'अलात' शब्दका अर्थ उल्का या मसाल है। मसालको घुमानेपर अग्निकी तरह-तरहकी आकृतियाँ दिखायी देती हैं और उसका घुमाना बन्द करते ही उनका दिखायी देना बन्द हो जाता है। यदि विचार किया जाय तो वस्तुतः वे मसालसे न तो निकलती हैं, न उसमें लीन होती हैं और न कहीं अन्यत्रसे ही उनका आना-जाना होता है। उनकी प्रतीति केवल मसालके स्पन्दनका ही फल है, वस्तुतः उनकी सत्ता नहीं है। इसी प्रकार यह दृश्य प्रपञ्च केवल मनके स्पन्दनके कारण प्रतीत होता है और मनके अमनीभावको प्राप्त होते ही न जाने कहाँ चला जाता है। किन्तु ये प्रपञ्चकी प्रतीति और अप्रतीति दोनों ही भ्रान्तिजनित हैं; परमार्थदृष्टिसे न उसकी उत्पत्ति होती है और न लय। इस भ्रान्तिका आधार परब्रह्म है, क्योंकि कोई भी भ्रान्ति निराधार नहीं हो सकती। अतः रज्जुमें सर्प अथवा शुक्तिमें रजतके समान परब्रह्ममें ही इस प्रपञ्चभ्रमकी प्रतीति हो रही है। यही इस प्रकरणका संक्षिप्त तात्पर्य है। इस प्रकरणमें आचार्यने सद्वाद, असद्वाद, बीजाङ्कुरसन्ततिवाद, विज्ञानवाद एवं शून्यवाद आदि सभी विपक्षी मतों-