माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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का खण्डन करके अजातवादकी स्थापना की है। वे एक ही कारिका- में सारे पक्षोंकी अनुपपत्ति दिखलाते हुए कहते हैं—
स्वतो वा परतो वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते । सदसत्सदसद्वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते । ( ४ । २२ )
अर्थात् कोई भी वस्तु न तो अपनेसे उत्पन्न हो सकती है और न किसी अन्यसे ही। जो घट अभीतक तैयार नहीं हुआ उससे वही घट कैसे उत्पन्न होगा ? तथा तैयार हुए घटसे भी कोई अन्य घट अथवा पट कैसे उत्पन्न होगा ? यही नहीं, सत् असत् अथवा सदसत्-रूपसे भी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती। जो वस्तु है उसकी उत्पत्ति क्या होगी और जिसका अत्यन्ताभाव है उसकी भी कहाँसे उत्पत्ति होगी ? तथा जो है और नहीं भी है ऐसी तो कोई वस्तु ही होनी सम्भव नहीं है। अतः किसी भी प्रकार किसी वस्तुकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती । इसी प्रकार, कुछ आगे चलकर वे सब प्रकारके कार्य- कारणभावकी अनुपपत्ति दिखलानेके लिये कहते हैं—
नास्त्यसद्धेतुकमसत्सत्सदसद्धेतुकं तथा । सच्च सद्धेतुकं नास्ति सद्धेतुकमसत्कुतः ॥ ( ४ । ४० )
अर्थात् न तो आकाशकुसुमादि असत् कारणवाला कोई आकाशकुसुमादिरूप असत् पदार्थ हो सकता है और न ऐसे असत्कारणसे कोई सद्वस्तु ही उत्पन्न हो सकती है । इसी प्रकार घटादि सत्पदार्थ भी किसी अन्य सत्पदार्थके कारण नहीं हो सकते; फिर उनसे कोई असत्पदार्थ उत्पन्न होगा—ऐसी तो सम्भावना ही कहाँ है ?
इस प्रकार अनेकों युक्तियोंसे जिसे जन्मके निमित्तभूत द्वैतका अत्यन्ताभाव अनुभव हो गया है और जिसने कार्य-कारणभावशून्य परमार्थतत्त्वको जान लिया है वही सब प्रकारके शोक और संकल्प- से मुक्त होकर अभयपद प्राप्त करता है । उसकी स्थितिका वर्णन करते हुए आचार्य कहते हैं—