भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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[ १० ]

निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः । विषयः स हि बुद्धानां तत्साम्यमजमद्वयम् ॥ (४।८०)

अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातं भवति स्वयम् । सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥ (४।८१)

इस प्रकार उस निरालम्ब स्थितिका वर्णन कर भगवान् गौड-पादाचार्य कहते हैं कि जिस-जिस धर्मका आग्रह हो जानेसे वह सर्वविशेषशून्य परमार्थतत्त्व अनायास ही आच्छादित हो जाता है और फिर वह पर्दा बड़ी कठिनतासे हटता है। इसीसे यह भगवान् अत्यन्त दुर्दर्श है। इसे आच्छादित करनेवाली कौन-कौनसी कोटियाँ हैं—उनका दिग्दर्शन करानेके लिये वे कहते हैं—

अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्ति नास्तीति वा पुनः । चलस्थिरोभयाभावैरावृणोत्येव बालिशः ॥ (४।८३)

अर्थात् कोई कहते हैं भगवान् 'है', कोई कहते हैं 'नहीं है' किन्हींका मत है 'है और नहीं भी है' और कोई कहते हैं 'नहीं है, नहीं है'। इनमें अस्ति-भाव चल है, क्योंकि वह घटादि अनित्य पदार्थोंसे विलक्षण है; नास्तिभाव स्थिर है, कारण उसमें कोई विशेषता नहीं है; अस्ति-नास्तिभाव (सदसद्वाद) उभयरूप है और नास्ति-नास्तिभाव अभावरूप है। भगवान् इन सभी भावोंसे विलक्षण हैं, क्योंकि ये सभी व्यवहारकोटिके अन्तर्गत हैं। उस सर्वभावातीत भगवान्‌को जो जानता है वही सर्वज्ञ है—सर्वज्ञ इसलिये, कि वह सारे प्रपञ्चके अधिष्ठानको जानता है और जो अधिष्ठानको जानता है उसे अध्यस्तवर्गकी असलियतका ज्ञान है ही। जिसे ऐसा ज्ञान है उस अद्वयब्राह्मपदमें स्थित हुए महात्माके लिये फिर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहता। उसका शम-दम आदि सात्त्विक व्यवहार भी लोकसंग्रहके लिये केवल लीलामात्र होता है। वस्तुतः उनकी गहनगतिका अवगाहन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। उन्हींकी अलौकिक स्थितिको लक्ष्यमें रखकर भगवान्‌ने श्रीमद्भगवद्गीतामें कहा है—