भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 13

[ ११ ]

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
(२।६९)

जो संसार संसारी पुरुषोंकी दृष्टिमें ध्रुवसत्य है उसका वे अत्यन्ताभाव देखते हैं और जिस अखण्ड चिद्धनसत्तामें उनकी अविचल स्थिति रहती है उसतक बहिर्दशीं अविवेकियोंकी दृष्टि नहीं पहुँच सकती। इसीसे उनकी दृष्टिमें दिन-रातका अन्तर बतलाया गया है।

इस प्रकार समस्त वादियोंकी कुदृष्टियोंका खण्डन कर आचार्य-ने एक अद्वय अखण्ड तत्त्वको स्थापित किया है, और अन्तमें उसी-की वन्दना करते हुए ग्रन्थका उपसंहार किया है। वहाँ वे कहते हैं—

दुर्दर्शमतिगम्भीरमजं साम्यं विशारदम् ।
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥
(४।१००)

इन कारिकाओंके द्वारा भगवान् गौडपादाचार्यने अजातवादकी स्थापना की है। इस सिद्धान्तको ग्रहण करनेके लिये बहुत ऊँचे अधिकारकी आवश्यकता है। जो सब प्रकार साधनसम्पन्न हैं वे उच्चाधिकारी ही इसे ठीक-ठीक हृदयंगम कर सकते हैं। जिनके चित्त कुछ भी विषयप्रवण हैं वे इससे अधिक लाभ न उठा सकेंगे—इतना ही नहीं, अपि तु उन्हें हानि होनेकी भी सम्भावना है। यह तत्त्व अत्यन्त दुर्बोध है—ऐसा तो स्वयं आचार्यचरणने ही कह दिया है—'दुर्दर्शमतिगम्भीरम्'। किन्तु जिस महाभाग महापुरुष-की दृष्टि इस परमतत्त्वतक पहुँच जाती है उसके लिये फिर कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता। वह स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है और दूसरे अधिकारी पुरुषोंको भी भवबन्धनसे मुक्त कर देता है। वह महामुनि सबका वन्दनीय है, सबका गुरु है और सभीका परम सुहृद् है। भगवान् हमें ऐसे महापुरुषोंके चरणकमलोंका आश्रय देकर हमारे संसारतापसन्तप्त अन्तःकरणोंको शान्ति प्रदान करें।

—अनुवादक