माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ८२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| व्यतिरेकेणान्यहेतुकः । अत्रापि हि स्वप्नदृष्टान्तो भवतीत्येव ॥१४॥ | वह कल्पितत्वके सिवा किसी अन्य कारणसे नहीं है। इस विषयमें भी स्वप्नका दृष्टान्त* है ही ॥ १४ ॥ |
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आन्तरिक और बाह्य पदार्थोंका भेद केवल इन्द्रियजनित हैं
अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु स्फुटा एव च ये बहिः ।
कल्पिता एव ते सर्वे विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे ॥ १५ ॥
जो आन्तरिक पदार्थ हैं वे अव्यक्त ही हैं और जो बाह्य हैं वे स्पष्ट प्रतीत होनेवाले हैं । किन्तु वे सब हैं कल्पित ही । उनकी विशेषता तो केवल इन्द्रियोंके ही भेदमें है ॥ १५ ॥
| यदप्यन्तरव्यक्तत्वं भावानां मनोवासनामात्राभिव्यक्तानां स्फुटत्वं वा बहिश्चक्षुरादीन्द्रियान्तरे विशेषो नासौ भेदानामस्तित्वकृतः स्वप्नेऽपि तथा दर्शनात् । किं तर्हि ? इन्द्रियान्तरकृत एव । अतः कल्पिता एव जाग्रद्भावा अपि स्वप्नभाववदिति सिद्धम् ॥ १५ ॥ | चित्तकी वासनामात्रासे अभिव्यक्त हुए पदार्थोंका जो अन्तःकरणमें अव्यक्तत्व ( अस्फुटत्व ) और बाह्य चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंमें जो उनका स्फुटत्व है वह विशेषता पदार्थोंकी सत्ताके कारण नहीं है, क्योंकि ऐसा ही स्वप्नमें भी देखा जाता है । तो फिर इसका क्या कारण है ? यह इन्द्रियोंके भेदके ही कारण है । अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्नके पदार्थोंके समान जाग्रत्कालीन पदार्थ भी कल्पित ही हैं ॥१५॥ |
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* अर्थात् जाग्रत्के समान स्वप्नके भी चित्तपरिकल्पित पदार्थ कल्पनाकालिक और बाह्य पदार्थ द्विकालिक ही होते हैं; परन्तु वे होते दोनों ही मिथ्या हैं। इसी प्रकार जाग्रत्में भी समझो ।