भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८१


चित्तकाला हि येऽन्तस्तु द्वयकालाश्च ये बहिः ।

कल्पिता एव ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः ॥ १४ ॥

जो आन्तरिक पदार्थ केवल कल्पनाकालतक ही रहनेवाले हैं और जो बाह्य पदार्थ द्विकालिक [ अर्थात् अन्योन्यपरिच्छेद्य ] हैं वे सभी कल्पित हैं । उनकी विशेषताका [ अर्थात् आन्तरिक पदार्थ असत्य हैं और बाह्य सत्य हैं-इस प्रकारकी भेदकल्पनाका ] कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ १४ ॥

चित्तकाला हि येऽन्तस्तु चित्तपरिच्छेद्याः नान्यश्चित्तकालव्यतिरेकेण परिच्छेदकः कालो येषां ते चित्तकालाः । कल्पनाकाल एवोपलभ्यन्त इत्यर्थः । द्वयकालाश्च भेदकाला अन्योन्यपरिच्छेद्याः । यथा- गोदोहनमास्ते; यावदास्ते तावद्गां दोग्धि यावद्गां दोग्धि तावदास्ते । तावानयमेतावान्स इति परस्परपरिच्छेद्यपरिच्छेदकत्वं बाह्यानां भेदानां ते द्वयकालाः । अन्तश्चित्तकाला बाह्याश्च द्वयकालाः कल्पिता एव ते सर्वे । न बाह्यो द्वयकालत्वविशेषः कल्पितत्व-जो आन्तरिक हैं अर्थात् चित्तपरिच्छेद्य हैं वे चित्तकाल हैं; जिनका चित्तकालके सिवा और कोई काल परिच्छेदक न हो उन्हें चित्तकाल कहते हैं। अर्थात् वे केवल कल्पनाके समय ही उपलब्ध होते हैं। तथा बाह्य पदार्थ दो कालवाले-भेदकालिक यानी अन्योन्यपरिच्छेद्य हैं। जैसे गोदोहनपर्यन्त बैठता है; यानी जबतक बैठता है तबतक गौ दुहता है और जबतक गौ दुहता है तबतक बैठता है। उतने समयतक यह रहता है और इतने समयतक वह रहता है- इस प्रकार बाह्य पदार्थोंका परस्पर परिच्छेद्य-परिच्छेदकत्व है; अतः वे दो कालवाले हैं। किन्तु आन्तरिक चित्तकालिक और बाह्य द्विकालिक- ये सब कल्पित ही हैं। बाह्य पदार्थोंकी जो द्विकालिकत्वरूप विशेषता है

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