माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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८० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
प्रभु आत्मा अपने अन्तःकरणमें [ वासनारूपसे ] स्थित अन्य (लौकिक) भावोंको नानारूप करता है तथा बहिश्चित्त होकर पृथिवी आदि नियत और अनियत पदार्थोंकी भी इसी प्रकार कल्पना करता है ॥१३॥
| विकरोति नाना करोत्यपरान् लौकिकान् भावान् पदार्थान् शब्दादीनन्यांश्चान्तश्चित्ते वासनारूपेण व्यवस्थितानव्याकृतान् नियतांश्च पृथ्व्यादीननियतांश्च कल्पनाकालान्यहिश्चित्तःसंस्तथान्तश्चित्तो मनोरथादिलक्षणानित्येवं कल्पयति प्रभुरीश्वर आत्मेत्यर्थः ॥ १३ ॥ | वह चित्तके भीतर वासनारूपसे स्थित अव्याकृत लौकिक भावों—शब्दादि पदार्थोंको तथा अन्य पृथिवी आदि नियत और कल्पनाकालमें ही उत्पन्न होनेवाले अनियत पदार्थोंको बहिश्चित्त होकर एवं मनोरथादिरूप पदार्थोंको अन्तश्चित्त होकर विकृत करता अर्थात् नाना करता है—इस प्रकार प्रभु—ईश्वर अर्थात् आत्मा कल्पना करता है ॥ १३ ॥ |
आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं
| स्वप्नवच्चित्तपरिकल्पितं सर्वमित्येतदाशङ्क्यते। यस्माच्चित्तपरिकल्पितैर्मनोरथादिलक्षणैश्चित्तपरिच्छेद्यैर्वैलक्षण्यं बाह्यानामन्योन्यपरिच्छेद्यत्वमिति। | स्वप्नके समान सब कुछ चित्तका ही कल्पना किया हुआ है—इस विषयमें यह शंका होती है—क्योंकि केवल चित्तपरिकल्पित और चित्तसे ही परिच्छेद्य मनोरथादिसे बाह्य पदार्थोंकी अन्योन्यपरिच्छेद्यत्वरूप विलक्षणता है [अतः स्वप्नके समान ये मिथ्या नहीं हो सकते]। |
| सा न युक्ताशङ्का। | समाधान—यह शंका ठीक नहीं है, [क्योंकि—] |