भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 99

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७९


इनकी कल्पना करनेवाला और इनका साक्षी आत्मा ही है

कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मा देवः स्वमायया ।
स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥ १२ ॥

स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी मायासे स्वयं ही कल्पना करता है और वही सब भेदोंको जानता है—यही वेदान्तका निश्चय है ॥ १२ ॥

स्वयं स्वमायया स्वमात्मानमात्मा देव आत्मन्येव वक्ष्यमाणं भेदाकारं कल्पयति रज्ज्वादाविव सर्पादीन् स्वयमेव च तान्बुध्यते भेदांस्तद्वद्देवेत्येवं वेदान्तनिश्चयः। नान्योऽस्ति ज्ञानस्मृत्याश्रयः । न च निरास्पदे एव ज्ञानस्मृती वैनाशिकानामिवेत्यभिप्रायः।१२।स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी मायासे रज्जुमें सर्पादिके समान अपनेमें आपहीको आगे बतलाये जानेवाले भेदरूपसे कल्पना करता है और स्वयं ही उन भेदोंको जानता है—इस प्रकार यही वेदान्तका निश्चय है । उसके सिवा स्मृति और ज्ञानका कोई और आश्रय नहीं है । तात्पर्य यह कि वैनाशिकों (बौद्धों) के कथनके समान ये ज्ञान और स्मृति निराधार नहीं हैं ॥ १२ ॥

पदार्थकल्पनाकी विधि

सङ्कल्पयन्केन प्रकारेण कल्पयतीत्युच्यते—वह संकल्प करते हुए किस प्रकार कल्पना करता है ? सो बतलाया जाता है—

विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्ते व्यवस्थितान् ।
नियतांश्च बहिश्चिन्त एवं कल्पयते प्रभुः ॥ १३ ॥