माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ७८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| सदसतोर्वैतथ्यं युक्तम्, अन्तर्बहिश्चेतःकल्पितत्वाविशेषादिति व्याख्यातमन्यत् ॥१०॥ | इन सत् और असत् पदार्थोंका मिथ्यात्व ठीक ही है, क्योंकि हृदयके भीतर या बाहर कल्पित होनेसे उनमें कोई विशेषता नहीं होती । शेष सबकी व्याख्या हो चुकी है ॥१०॥ |
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इन मिथ्या पदार्थोंकी कल्पना करनेवाला कौन है ?
| चोदक आह— | [ इसपर ] पूर्वपक्षी कहता है- |
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उभयोरपि वैतथ्यं भेदानां स्थानयोर्यदि ।
क एतान्बुध्यते भेदान्को वै तेषां विकल्पकः ॥ ११ ॥
यदि [ जागरित और स्वप्न ] दोनों ही स्थानोंके पदार्थोंका मिथ्यात्व है तो इन पदार्थोंको जानता कौन है और कौन इनकी कल्पना करनेवाला है ? ॥ ११ ॥
| स्वप्नजाग्रत्स्थानयोर्भेदानां यदि वैतथ्यं क एतानन्तर्बहिश्चेतःकल्पितान्बुध्यते । को वै तेषां विकल्पकः । स्मृतिज्ञानयोः क आलम्बनमित्यभिप्रायः, न चेन्निरात्मवाद इष्टः ॥ ११ ॥ | यदि स्वप्न और जागरित [ दोनों ही स्थानों ] के पदार्थोंका मिथ्यात्व है तो चित्तके भीतर या बाहर कल्पना किये हुए इन पदार्थोंको जानता कौन है ? और कौन उनकी कल्पना करनेवाला है ? तात्पर्य यह है कि यदि निरात्मवाद अभीष्ट नहीं है तो [ यह बताना चाहिये कि ] उक्त स्मरण ( स्वप्न ) और ज्ञान ( जागरित ) का आलम्बन कौन है ? ॥ ११ ॥ |
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