भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 104
८४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| स इति । अतो हेतुकल्पना- | इस प्रकार [अन्नभक्षणादि] हेतुकी | | विज्ञानात्फलविज्ञानं ततो हेतुफल- | कल्पनाके विज्ञानसे ही [तृप्ति आदि] | | | फलका विज्ञान होता है; उससे [दूसरे | | | दिन भी] उन हेतु और फलकी स्मृति | | स्मृतिस्ततस्तद्विज्ञानं तदर्थक्रिया- | होती है और उस स्मृतिसे उनका ज्ञान | | | तथा उनके लिये होनेवाले [पाकादि] | | कारकतत्फलभेदविज्ञानानि । | कर्म, [तण्डुलादि] कारक और उनके | | | [तृप्ति आदि] फलभेदके ज्ञान होते हैं। | | तेभ्यस्तत्स्मृतिस्तत्स्मृतेश्च पुन- | उनसे उनकी स्मृति होती है तथा उस | | स्तद्विज्ञानानीत्येवं बाह्यानाध्या- | स्मृतिसे फिर उन [हेतु आदि] के | | | विज्ञान होते हैं। इस प्रकार यह जीव | | त्मिकांश्चेतरेतरनिमित्तनैमित्तिक- | बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी | | | पारस्परिक निमित्त-नैमित्तिकभावसे | | भावेनानेकधा कल्पयते ॥१६॥ | अनेक प्रकार कल्पना करता है ॥१६॥ |

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जीवकल्पनाका हेतु अज्ञान है

| तत्र जीवकल्पना सर्वकल्पना- | यहाँतक जीवकल्पना ही सब | | मूलमित्युक्तं सैव जीवकल्पना | कल्पनाओंका मूल है—यह कहा गया; | | किंनिमित्तेति दृष्टान्तेन प्रति- | किन्तु वह जीव-कल्पना है किस | | पादयति— | निमित्तसे ?—इस बातका दृष्टान्तसे | | | प्रतिपादन करते हैं— |

अनिश्चिता यथा रज्जुरन्धकारे विकल्पिता ।
सर्पधारादिभिर्भावैस्तद्वदात्मा विकल्पितः ॥ १७ ॥

जिस प्रकार [अपने स्वरूपसे] निश्चय न की हुई रज्जु अन्धकारमें सर्प-धारा आदि भावोंसे कल्पना की जाती है उसी प्रकार आत्मामें भी तरह-तरहकी कल्पनाएँ हो रही हैं ॥ १७ ॥

| यथा लोके स्वेन रूपेणानिश्चि- | जिस प्रकार अपने स्वरूपसे | | तानवधारितैवंमेवेति रज्जुर्मन्दा- | अनिश्चित अर्थात् यह ऐसी ही है— |