माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८५
| न्धकारे किं सर्प उदकधारा दण्ड इति वानेकधा विकल्पिता भवति पूर्वं स्वरूपानिश्चयनिमित्तम्। यदि हि पूर्वमेव रज्जुः स्वरूपेण निश्चिता स्यात्; न सर्पादिविकल्पोऽभविष्यद् यथा स्वहस्ताङ्गुल्यादिषु, एष दृष्टान्तः। तद्वद्धेतुफलादिसंसारधर्मानर्थविलक्षणतया स्वेन विशुद्धविज्ञप्तिमात्रसत्ताद्वयरूपेणानिश्चितत्वाज्जीवप्राणाद्यनन्तभावभेदैरात्मा विकल्पित इत्येष सर्वोपनिषदां सिद्धान्तः ॥ १७ ॥ | इस प्रकार निर्धारण न की हुई रज्जु मन्द अन्धकारमें 'यह सर्प है?' 'जलकी धारा है?' अथवा 'दण्ड है?' इस प्रकार—पहलेसे स्वरूपका निश्चय न होनेके कारण—अनेक प्रकारसे कल्पना की जाती है; यदि रज्जु पहले ही अपने स्वरूपसे निश्चित हो तो उसमें सर्पादिका विकल्प नहीं हो सकता, जैसे कि अपने हाथकी अँगुली आदिमें [ ऐसा कोई विकल्प नहीं होता ]। यह एक दृष्टान्त है। इसी तरह हेतु-फलादि सांसारिक धर्मरूप अनर्थसे विलक्षण अपने विशुद्ध विज्ञप्तिमात्र अद्वितीय सत्तारूपसे निश्चित न होनेके कारण ही आत्मा जीव एवं प्राण आदि अनन्त विभिन्न भावोंसे विकल्पित हो रहा है—यही सम्पूर्ण उपनिषदोंका सिद्धान्त है १७ |
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अज्ञाननिवृत्ति ही आत्मज्ञान है
निश्चितायां यथा रज्ज्वां विकल्पो विनिवर्तते ।
रज्जुरेवेति चाद्वैतं तद्वदात्मविनिश्चयः ॥ १८ ॥
जिस प्रकार रज्जुका निश्चय हो जानेपर उसमें [ सर्पादिका ] विकल्प निवृत्त हो जाता है तथा 'यह रज्जु ही है' ऐसा अद्वैत निश्चय होता है उसी प्रकार आत्माका निश्चय है ॥ १८ ॥