भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 106
८६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
रज्जुरेवेति निश्चये सर्ववि-<br>कल्पनिवृत्तौ रज्जुरेवेति चाद्वैतं<br>यथा तथा "नेति नेति" (बृ०<br>उ० ४।४।२२) इति सर्व-<br>संसारधर्मशून्यप्रतिपादकशास्त्रज-<br>नितविज्ञानसूर्यालोककृतात्मवि-<br>निश्चयः "आत्मैवेदं सर्वम्"<br>(छा० उ० ७।२५।२)<br>"अपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्"<br>(बृ० उ० २।५।१९)<br>"सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः" (मु०<br>उ० २।१।२) "अजरोऽमरो-<br>ऽमृतोऽभयः" (बृ० उ० ४।४।<br>२५) "एक एवाद्वयः" इति॥१८॥'यह रज्जु ही है' ऐसा निश्चय<br>होनेसे सर्पादि विकल्पकी निवृत्ति<br>हो जानेपर जिस प्रकार 'यह रज्जु<br>ही है' ऐसा अद्वैत-भाव हो जाता<br>है उसी प्रकार "नेति-नेति" इस<br>सर्वसंसारधर्मशून्य आत्माका प्रति-<br>पादन करनेवाले शास्त्रसे उत्पन्न हुए<br>विज्ञानरूप सूर्यके प्रकाशसे आत्माका<br>ऐसा निश्चय होता है कि "यह सब<br>आत्मा ही है" "वह कारण-कार्यसे<br>रहित और अन्तर्बाह्यशून्य है""बाहर-<br>भीतरसे (कार्य-कारण दोनों दृष्टियों-<br>से) अजन्मा है" "वह जराशून्य,<br>अमर, अमृत और अभय है" तथा "वह<br>एक अद्वितीय ही है" ॥ १८ ॥
यद्यात्मैक एवेति निश्चयः<br>कथं प्राणादिभिरनन्तैर्भावैरैतैः<br>संसारलक्षणैर्विकल्पित इति,<br>उच्यते, शृणु—यदि यह बात निश्चित है कि<br>आत्मा एक ही है तो वह इन<br>संसाररूप प्राणादि अनन्त भावोंसे<br>कैसे विकल्पित हो रहा है ?<br>सो इस विषयमें कहा जाता<br>है, सुनो—

विकल्पकी मूल माया है

प्राणादिभिरनन्तैश्च भावैरेतैर्विकल्पितः ।
मायैषा तस्य देवस्य यया संमोहितः स्वयम् ॥ १९ ॥

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