माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८७
यह जो इन प्राणादि अनन्त भावोंसे विकल्पित हो रहा है सो यह उस प्रकाशमय आत्मदेवकी माया ही है, जिससे कि वह स्वयं ही मोहित हो रहा है ॥ १९ ॥
| मायैषा तस्यात्मनो देवस्य । यथा मायाविना विहिता माया गगनमतिविमलं कुसुमितैः सपलाशैस्तरुभिराकीर्णमिव करोति तथेयमपि देवस्य माया ययायं स्वयमपि मोहित इव मोहितो भवति । "मम माया दुरत्यया" (गीता ७ । १४) इत्युक्तम् ॥ १९ ॥ | यह उस आत्मदेवकी माया है। जिस प्रकार मायावीद्वारा प्रयोग की हुई माया अति निर्मल आकाशको पल्लवयुक्त पुष्पित पादपोंसे परिपूर्ण कर देती है उसी प्रकार यह भी उस देवकी माया है जिससे कि यह स्वयं भी मोहित हुएके समान मोह-ग्रस्त हो रहा है। "मेरी मायाका पार पाना कठिन है" ऐसा [भगवान्ने] कहा भी है ॥ १९ ॥ |
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मूलतत्त्वसम्बन्धी विभिन्न मतवाद
प्राण इति प्राणविदो भूतानीति च तद्विदः ।
गुणा इति गुणविदस्तत्त्वानीति च तद्विदः ॥ २० ॥
प्राणोपासक कहते हैं—'प्राण ही जगत्का कारण है।' भूतज्ञों (प्रत्यक्षवादी चार्वाकादि) का कथन है—'[पृथिवी आदि] चार भूत ही परमार्थ हैं।' गुणोंको जाननेवाले [सांख्यवादी] कहते हैं—'गुण ही सृष्टिके हेतु हैं।' तथा तत्त्वज्ञ (शैव) कहते हैं—'[आत्मा, अविद्या और शिव—ये तीन] तत्त्व ही जगत्के प्रवर्तक हैं' ॥ २० ॥
पादा इति पादविदो विषया इति तद्विदः ।
लोका इति लोकविदो देवा इति च तद्विदः ॥ २१ ॥