भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 108
८८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

पादवेत्ता कहते हैं—‘विश्व आदि पाद ही सम्पूर्ण व्यवहारके हेतु हैं।’ [ वात्स्यायनादि ] विषयज्ञ कहते हैं—‘शब्दादि विषय ही सत्य वस्तु हैं।’ लोकवेत्ताओं ( पौराणिकों ) का कथन है—‘लोक ही सत्य हैं।’ तथा देवोपासक कहते हैं—‘इन्द्रादि देवता ही सृष्टिके सञ्चालक हैं’ ॥ २१ ॥

वेदा इति वेदविदो यज्ञा इति च तद्विदः ।
भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः ॥ २२ ॥

वेदज्ञ कहते हैं—‘ऋगादि चार वेद ही परमार्थ हैं।’ याज्ञिक कहते हैं—‘यज्ञ ही संसारके आदिकारण हैं।’ भोक्ताको जाननेवाले भोक्ताकी ही प्रधानता बतलाते हैं तथा भोज्यके मर्मज्ञ ( सूपकारादि ) भोज्यपदार्थोंकी ही सारवत्ताका प्रतिपादन करते हैं ॥ २२ ॥

सूक्ष्म इति सूक्ष्मविदः स्थूल इति च तद्विदः ।
मूर्त इति मूर्तविदोऽमूर्त इति च तद्विदः ॥ २३ ॥

सूक्ष्मवेत्ता कहते हैं—‘आत्मा सूक्ष्म (अणु-परिमाण) है।’ स्थूलवादी ( चार्वाकादि ) कहते हैं—‘वह स्थूल है।’ मूर्त्तवादी ( साकारोपासक ) कहते हैं—‘परमार्थ वस्तु मूर्तिमान् है।’ तथा अमूर्त्तवादियों ( शून्यवादियों ) का कथन है कि वह मूर्तिहीन है ॥ २३ ॥

काल इति कालविदो दिश इति च तद्विदः ।
वादा इति वादविदो भुवनानीति तद्विदः ॥ २४ ॥

कालज्ञ ( ज्योतिषी लोग ) कहते हैं—‘काल ही परमार्थ है।’ दिशाओंके जाननेवाले ( स्वरोदयशास्त्री ) कहते हैं—‘दिशाएँ ही सत्य वस्तु हैं।’ वादवेत्ता कहते हैं—‘[ धातुवाद, मन्त्रवाद आदि ] वाद ही सत्य वस्तु है।’ तथा भुवनकोषके ज्ञाताओंका कथन है कि भुवन ही परमार्थ हैं ॥ २४ ॥