भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 109, कुल 301 में से

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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८९


मन इति मनोविदो बुद्धिरिति च तद्विदः ।
चित्तमिति चित्तविदो धर्माधर्मौ च तद्विदः ॥ २५ ॥

मनोविद् कहते हैं—'मन ही आत्मा है', बौद्धोंका कथन है—'बुद्धि ही आत्मा है', चित्तज्ञोंका विचार है—'चित्त ही सत्यवस्तु है;' तथा धर्माधर्मवेत्ता (मीमांसक) 'धर्माधर्मको ही परमार्थ मानते हैं' ॥ २५ ॥

पञ्चविंशक इत्येके षड्िंवश इति चापरे ।
एकत्रिंशक इत्याहुरनन्त इति चापरे ॥ २६ ॥

कोई (सांख्यवादी) पच्चीस तत्त्वोंको, कोई (पातञ्जलमतावलम्बी) छब्बीसोंको और कोई (पाशुपत) इकतीस तत्त्वोंको सत्य मानते हैं* तथा अन्य मतावलम्बी परमार्थको अनन्त भेदोंवाला मानते हैं ॥ २६ ॥

लोकाँल्लोकविदः प्राहुराश्रमा इति तद्विदः ।
स्त्रीपुंनपुंसकं लैङ्गाः परापरमथापरे ॥ २७ ॥

लौकिक पुरुष लोकानुरञ्जनको और आश्रमवादी आश्रमोंको ही प्रधान बतलाते हैं। लिङ्गवादी स्त्रीलिङ्ग, पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिखोंको तथा दूसरे लोग पर और अपर ब्रह्मको ही परमार्थ मानते हैं ॥ २७ ॥

सृष्टिरिति सृष्टिविदो लय इति च तद्विदः ।
स्थितिरिति स्थितिविदः सर्वे चेह तु सर्वदा ॥ २८ ॥

सृष्टिवेत्ता कहते हैं—'सृष्टि ही सत्य है', लयवादी कहते हैं—'लय ही परमार्थ वस्तु है' तथा स्थितिवेत्ता कहते हैं—'स्थिति ही सत्य है।' इस प्रकार ये [कहे हुए और बिना कहे हुए] सभी वाद इस आत्मतत्त्वमें सर्वदा कल्पित हैं ॥ २८ ॥


* प्रधान, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और मन—ये सांख्यवादियोंके पच्चीस तत्त्व हैं; योगी इनके सिवा छब्बीसवाँ तत्त्व ईश्वर मानते हैं और पाशुपतोंके मतमें इन पच्चीस तत्त्वोंके अतिरिक्त राग, अविद्या, नियति, काल, कला और माया—ये छः तत्त्व और हैं।

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